धर्मांतरण पर अनुसूचित जाति दर्जा समाप्त होने के फैसले के खिलाफ समीक्षा याचिका सुप्रीम कोर्ट से खारिज

हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा कोई अन्य धर्म अपनाने पर अनुसूचित जाति (एससी) का दर्जा तत्काल समाप्त होने के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने फिर से मुहर लगा दी है। शीर्ष अदालत ने 24 मार्च के अपने निर्णय के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया है।

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने 15 जुलाई के अपने आदेश में कहा कि पूर्व में दिए गए फैसले के रिकॉर्ड में ऐसी कोई गलती या त्रुटि नजर नहीं आती जो पुनर्विचार का आधार बने। अदालत ने मामले पर मौखिक सुनवाई की मांग वाली अर्जी को भी अस्वीकार कर दिया।

इस फैसले से आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश की पुष्टि हुई है, जिसमें कहा गया था कि ईसाई धर्म अपनाने पर किसी व्यक्ति का अनुसूचित जाति का दर्जा जन्म के आधार पर मिलने के बावजूद तुरंत और पूरी तरह खत्म हो जाता है।

संवैधानिक प्रावधान और कानूनी दायरा

संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के क्लॉज 3 का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि इस कानून के तहत एससी वर्ग का दर्जा केवल उन्हीं लोगों को मिल सकता है जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म का पालन करते हैं। अदालत के अनुसार यह कानूनी रोक पूरी तरह स्पष्ट और अंतिम है। इसका सीधा अर्थ है कि इन तीन धर्मों से अलग कोई भी आस्था अपनाने पर आरक्षण, वैधानिक लाभ, संरक्षण और सरकारी प्राथमिकताओं की पात्रता उसी क्षण समाप्त हो जाती है।

READ ALSO  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 28 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट कि 74वी जयंती कार्यक्रम में शामिल होंगे

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि कोई भी व्यक्ति अपनी निजी, सामाजिक या आध्यात्मिक मान्यताओं के लिए किसी अन्य धर्म का पालन करते हुए कानूनन एससी वर्ग के लाभ का दावा नहीं कर सकता। ऐसा दर्जा प्राप्त करने के लिए आवेदक को यह साबित करना होगा कि वह संबंधित राष्ट्रपति आदेश के तहत अधिसूचित जाति से ही संबंध रखता है।

कानूनी इतिहास और ईसाई धर्म का रुख

वर्ष 1950 के मूल आदेश के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए अदालत ने बताया कि शुरुआत में यह प्रावधान केवल हिंदू धर्म के अनुयायियों तक सीमित था। बाद में संसद ने संशोधन करके 1956 में सिखों को और 1990 में बौद्ध धर्म के लोगों को इसमें शामिल किया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि ईसाई धर्म को इन संशोधनों में कभी शामिल नहीं किया गया। इसका कारण यह है कि ईसाई धर्म के मूल धार्मिक सिद्धांतों में जाति व्यवस्था का कोई स्थान या मान्यता नहीं है।

READ ALSO  धारा 138 एनआई अधिनियम| चेक बाउंस मामलों में कार्रवाई का कारण कब उत्पन्न होता है? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बताया

जनजातीय पहचान और रीति-रिवाज

अनुच्छेद 342 के क्लॉज 1 के तहत आने वाले अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के संदर्भ में अदालत ने कहा कि वैधानिक लाभ प्राप्त करने के लिए व्यक्ति का वास्तव में उस जनजाति से जुड़े रहना आवश्यक है।

अदालत के अनुसार, यदि कोई जनजातीय व्यक्ति दूसरा धर्म अपना लेता है और समय के साथ अपनी जनजाति की परंपराओं, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक प्रथाओं को छोड़ देता है, तो उसकी जनजातीय पहचान पर निर्णय ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा। यदि यह सिद्ध हो जाता है कि उसने पूरी तरह नए धर्म को अपना लिया है और पुरानी परंपराओं को त्याग दिया है, तो यह माना जा सकता है कि वह अब उस जनजाति का हिस्सा नहीं रहा।

घर वापसी पर दर्जा वापस पाने की शर्तें

READ ALSO  मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने नववर्ष की शुभकामनाएँ दीं, वकीलों से कहा- अर्जेंट मामलों की सुनवाई के लिए फिजिकल पत्र दें

सुप्रीम कोर्ट ने उन परिस्थितियों का भी उल्लेख किया जिनके तहत हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म में दोबारा लौटने पर एससी दर्जा पुनः प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए व्यक्ति को तीन अनिवार्य शर्तें पूरी करनी होंगी:

  1. 1950 के आदेश में अधिसूचित मूल जाति से संबंध होने का स्पष्ट और प्रामाणिक प्रमाण।
  2. मूल धर्म में वास्तविक और प्रामाणिक रूप से वापस लौटने के ठोस सबूत।
  3. मूल जाति और समाज के लोगों द्वारा व्यक्ति को पुनः स्वीकार किए जाने और समूह में शामिल करने के स्पष्ट साक्ष्य।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles