नाम नहीं आचरण मायने रखता है: 2006 के अपहरण और दुष्कर्म मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने आरोपी को किया बरी

दिल्ली हाईकोर्ट ने 2006 के अपहरण और दुष्कर्म के एक मामले में निचली अदालत से सात साल की कैद की सजा पाए व्यक्ति को बरी कर दिया है। अदालत ने पाया कि घटना के समय युवती बालिग थी और अपनी मर्जी से व्यक्ति के साथ गई थी। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस विमल कुमार यादव ने प्रसिद्ध अंग्रेजी नाटककार विलियम शेक्सपियर की पंक्ति “नाम में क्या रखा है” का उल्लेख करते हुए टिप्पणी की कि नाम से किसी व्यक्ति का चरित्र या व्यवहार तय नहीं होता।

शेक्सपियर के कथन का उल्लेख और नाम पर अदालत की टिप्पणी

जस्टिस विमल कुमार यादव ने 22 जुलाई को दिए गए अपने फैसले में कहा कि हर धर्म में बच्चों के नाम देवी-देवताओं या धार्मिक-पौराणिक पात्रों के नाम पर रखने का चलन है। हालांकि, नाम से किसी व्यक्ति की शख्सियत, आचरण या व्यवहार का निर्धारण नहीं होता। अदालत ने कहा कि यदि नाम से ही व्यक्तित्व तय होता, तो भारत का हर ‘रामचंद्र’ मर्यादा पुरुषोत्तम होता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नाम चाहे कितना भी सुंदर या आदर्श क्यों न हो, अंततः व्यक्ति का आचरण ही मायने रखता है।

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सहमति और घटनाक्रम की परिस्थितियां

अदालत ने आयु की गणना के आधार पर पाया कि अप्रैल 2006 में घटना के समय युवती की उम्र 18.4 वर्ष थी, जिससे अपहरण का मामला खारिज हो जाता है। हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि यह पूरी घटना दिन के उजाले में हुई थी। दोनों ने सार्वजनिक परिवहन से यात्रा की और नवरात्रि के दौरान एक ऐसे मंदिर गए जहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ थी और पुलिस की भी पर्याप्त मौजूदगी थी। अदालत का मानना था कि यदि युवती को उसकी मर्जी के बिना ले जाया जा रहा होता, तो उसके पास मदद मांगने या शोर मचाने के कई अवसर थे। आरोपी ने उसे न तो किसी हथियार से डराया था और न ही उस पर लगातार बल प्रयोग किया गया था।

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पीड़िता का बयान और वैज्ञानिक साक्ष्यों की कमी

अपील प्रक्रिया के दौरान युवती ने स्वयं अदालत में बयान दिया कि वह अपनी इच्छा से आरोपी के साथ गई थी। उसने आरोपी पर कोई आरोप लगाने से इनकार करते हुए उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई न करने का अनुरोध किया। हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि दुष्कर्म के आरोपों की पुष्टि के लिए कोई ठोस वैज्ञानिक या फोरेंसिक साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए, और न ही शरीर पर ऐसे कोई निशान मिले जो किसी प्रकार के विरोध या जबरदस्ती को दर्शाते हों।

मामले की पृष्ठभूमि और निचली अदालत का फैसला

यह कानूनी मामला 6 अप्रैल 2006 को तब शुरू हुआ जब एक महिला ने अपनी नाबालिग बेटी के दो दिन से लापता होने की पुलिस शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद 9 अप्रैल 2006 को युवती के भाई और चाचा की मौजूदगी में चलाए गए एक पुलिस अभियान के दौरान युवती और आरोपी को बरामद किया गया। युवती के शुरुआती बयानों के आधार पर पुलिस ने अपहरण और दुष्कर्म का आरोप पत्र दाखिल किया। निचली अदालत ने 15 गवाहों की गवाही के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराते हुए सात साल के कारावास की सजा सुनाई थी।

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अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें

अपील की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के अधिवक्ता हंस राज सिंह और गौरव नागर ने साक्ष्यों में परस्पर विरोधाभास की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि युवती बालिग थी और स्वेच्छा से गई थी। दूसरी ओर, राज्य सरकार का पक्ष रख रहे अधिवक्ता नवल किशोर झा, आस्था और मेघा सिंह ने फोरेंसिक निष्कर्षों का हवाला देते हुए दावा किया कि यौन उत्पीड़न हुआ था। हालांकि, हाईकोर्ट ने माना कि युवती के खुद साथ जाने और किसी भी तरह के दबाव का प्रमाण न होने के कारण अभियोजन पक्ष का दावा टिक नहीं पाता है।

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