गुरुग्राम के ज़िला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने बीच सत्र में कोचिंग सेंटर का स्थान बदलने और छात्र को असुविधा पहुंचाने के मामले में ‘संजीव दत्ता पर्सनैलिटी स्कूल’ को सेवा में लापरवाही का दोषी पाया है। आयोग ने संस्थान को छात्र की आधी फीस यानी 38,645 रुपये ब्याज सहित लौटाने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही पीड़ित पक्ष को 15,000 रुपये का मानसिक उत्पीड़न मुआवजा और 11,000 रुपये कानूनी खर्च के रूप में भुगतान करने का भी आदेश दिया गया है।
अध्यक्ष संजीव जिंदल की पीठ का फैसला
अध्यक्ष संजीव जिंदल और सदस्य ज्योति सिवाच व खुशविंदर कौर की पीठ ने 13 जुलाई को यह फैसला सुनाया। आयोग ने स्पष्ट किया कि शिक्षण संस्थान सेवा की मुख्य शर्तों, जैसे कक्षाओं के स्थान, में एकतरफा बदलाव कर छात्रों या अभिभावकों को परेशान नहीं कर सकते। हालांकि, चूंकि छात्र लगभग छह महीने तक कक्षाएं ले चुका था, इसलिए पूरी फीस के बजाय आधी राशि वापस करने का निर्णय लिया गया।
सेक्टर-57 से गोल्फ कोर्स रोड स्थानांतरित किया गया था सेंटर
मामले के अनुसार, शिकायतकर्ता ने 24 दिसंबर 2018 को अपने बच्चे का दाखिला संजीव दत्ता पर्सनैलिटी स्कूल के पर्सनैलिटी डेवलपमेंट कोर्स में कराया था और 77,290 रुपये की पूरी फीस जमा की थी। दाखिले के समय कक्षाएं अभिभावक के घर के पास स्थित सेक्टर-57 केंद्र में चल रही थीं।
बाद में संस्थान ने कक्षाओं का स्थान बदलकर डीएलएफ फेज-1 स्थित गोल्फ कोर्स रोड सेंटर कर दिया। इससे छात्र के लिए आने-जाने की दूरी और समय काफी बढ़ गया। अभिभावक ने संस्थान से पिक-अप और ड्रॉप-ऑफ के लिए परिवहन सुविधा देने का अनुरोध किया, जिसे संस्थान ने खारिज कर दिया। इसके बाद अभिभावक ने दाखिला रद्द कर पूरी फीस वापस मांगी, लेकिन बार-बार अनुरोध और कानूनी नोटिस भेजने के बावजूद रकम नहीं लौटाई गई, जिसके बाद उन्होंने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया।
व्हाट्सएप संदेश से तय हुई समयावधि
संस्थान ने आयोग के समक्ष तर्क दिया कि स्थान परिवर्तन दाखिले के एक महीने के भीतर नहीं हुआ था। अपनी बात साबित करने के लिए संस्थान ने 21 जून 2019 का एक व्हाट्सएप संदेश पेश किया, जिसमें छात्रों को सूचित किया गया था कि भविष्य की कक्षाएं समय बदले बिना गोल्फ कोर्स रोड स्टूडियो में होंगी।
आयोग ने सबूतों की जांच के बाद माना कि दाखिले के लगभग छह महीने बाद स्थान बदला गया था और छात्र आधी अवधि की पढ़ाई पूरी कर चुका था। इसलिए पूरी फीस वापसी का दावा सही नहीं पाया गया।
असुविधा के दावों का नहीं मिला कोई जवाब
आयोग ने कहा कि शिकायतकर्ता ने अपने शपथ पत्र, फीस रसीद और कानूनी नोटिस के जरिए अपना पक्ष मजबूती से रखा, जबकि संस्थान असुविधा या परिवहन सुविधा से इनकार के आरोपों को खारिज करने वाला कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका।
आयोग ने अपने आदेश में कहा कि विरोधी पक्ष की ओर से ऐसा कोई सबूत रिकॉर्ड पर नहीं रखा गया जो शिकायतकर्ता के दावों की विश्वसनीयता को चुनौती दे सके या इसके विपरीत कुछ साबित कर सके। इसलिए शिकायतकर्ता के कथनों को स्वीकार करते हुए संस्थान को सेवा में कमी का दोषी ठहराया गया।

