शहीद अग्निवीर के परिजनों को समान लाभ देने की मांग: बॉम्बे हाईकोर्ट ने केंद्र को दी चेतावनी, देरी पर लगेगा भारी जुर्माना

बॉम्बे हाईकोर्ट ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान शहीद हुए एक अग्निवीर की मां द्वारा दायर याचिका पर जवाब देने में विफल रहने के लिए केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। याचिका में मांग की गई है कि शहीद अग्निवीरों के परिवारों को भी नियमित सैनिकों की तरह ही मरणोपरांत लाभ दिए जाएं। मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि अगली सुनवाई तक हलफनामा दाखिल नहीं किया गया, तो केंद्र पर “भारी जुर्माना” (Heavy Costs) लगाया जाएगा।

यह याचिका अग्निवीर मुरली नाइक की माता ज्योतिबाई नाइक द्वारा दायर की गई है। मुरली नाइक जून 2023 में अग्निपथ योजना के तहत भारतीय सेना में भर्ती हुए थे। भर्ती के एक साल के भीतर ही, 9 मई 2024 को जम्मू-कश्मीर के पुंछ में सीमा पार से हुई गोलीबारी के दौरान वे शहीद हो गए। यह घटना ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान हुई थी, जो पहलगाम में हुए आतंकी हमले (जिसमें 26 लोग मारे गए थे) के जवाब में भारतीय सेना द्वारा शुरू की गई कार्रवाई थी।

ड्यूटी के दौरान सर्वोच्च बलिदान देने के बावजूद, याचिका में दावा किया गया है कि अग्निपथ योजना की संरचना शहीद अग्निवीर के परिवार को उन दीर्घकालिक पेंशन और कल्याणकारी लाभों से वंचित करती है, जो नियमित सैनिकों के परिवारों को मिलते हैं।

अधिवक्ता संदेश मोरे, हेमंत घाडीगांवकर और हितेंद्र गांधी के माध्यम से दायर इस याचिका में तर्क दिया गया है कि अग्निपथ योजना अग्निवीरों और नियमित सैनिकों के बीच एक “मनमाना” और “भेदभावपूर्ण” अंतर पैदा करती है। याचिका के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

  • जोखिम और कर्तव्य की समानता: याचिका में कहा गया है कि अग्निवीर भी वही कर्तव्य निभाते हैं और उन्हीं जानलेवा जोखिमों का सामना करते हैं जो नियमित सैनिक करते हैं, फिर भी उनके परिवारों को पेंशन लाभों से बाहर रखा गया है।
  • मौलिक अधिकारों का उल्लंघन: याचिका के अनुसार, यह योजना बिना किसी स्पष्ट आधार के दो श्रेणियों में वर्गीकरण करती है, जो संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है।
  • अपर्याप्त लाभ: हालांकि परिवार को लगभग 1 करोड़ रुपये की अनुग्रह राशि (Ex-gratia) मिली है, लेकिन उन्हें नियमित पारिवारिक पेंशन और अन्य संस्थागत कल्याणकारी सुविधाओं से वंचित कर दिया गया है।
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याचिकाकर्ता ने इससे पहले जुलाई 2023 में विभिन्न अधिकारियों को पत्र लिखकर समान लाभों की मांग की थी, लेकिन कोई जवाब न मिलने पर उन्हें कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।

जस्टिस रवींद्र घुगे और जस्टिस हितेन वेनगांवकर की बेंच ने केंद्र द्वारा की जा रही देरी पर गहरा असंतोष व्यक्त किया। कोर्ट ने नोट किया कि पिछले साल दिसंबर और फिर इस साल जनवरी में नोटिस जारी किए गए थे, लेकिन अभी तक सरकार का जवाब दाखिल नहीं हुआ है।

जस्टिस घुगे ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा, “यह याचिका पिछले साल से लंबित है। याचिकाकर्ता ने जुलाई में ही सरकार को पत्र लिखकर ये मुद्दे उठाए थे। इस मामले में तत्परता की आवश्यकता है।” कोर्ट ने आगे कहा कि जवाब दाखिल करने के लिए अब कोई और समय (Adjournment) नहीं दिया जाएगा।

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हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को 6 मई तक अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करने का अंतिम अवसर दिया है। मामले की अगली सुनवाई 18 जून को तय की गई है। याचिका में कोर्ट से मांग की गई है कि वह सरकार को निर्देश दे कि सेवा के दौरान जान गंवाने वाले अग्निवीरों के परिवारों को पेंशन, संस्थागत मान्यता और अन्य कल्याणकारी लाभों में समानता सुनिश्चित की जाए।

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