सुप्रीम कोर्ट ने खनन पट्टों (माइंनिग लीज) पर स्टाम्प ड्यूटी की गणना से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि वैधानिक फॉर्म-के (Form K) में निष्पादित खनन पट्टा समझौते पर स्टाम्प ड्यूटी की गणना केवल डेड रेंट के बजाय संभावित रॉयल्टी (Anticipated Royalty) के आधार पर की जानी चाहिए। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने मेसर्स बिड़ला कॉर्पोरेशन लिमिटेड द्वारा मध्य प्रदेश राज्य के खिलाफ दायर अपील को खारिज करते हुए कहा कि यदि किसी दस्तावेज के निष्पादन के समय उसकी विषय-वस्तु का मूल्य निर्धारित नहीं किया जा सकता है, तो वैधानिक ढांचा राज्य को उसके वैध राजस्व से वंचित होने से बचाने के लिए अनुमानित या संभावित रॉयल्टी के आधार पर स्टाम्प ड्यूटी की गणना की अनुमति देता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद तब शुरू हुआ जब मेसर्स बिड़ला कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने मध्य प्रदेश के सतना जिले की रघुराजनगर तहसील के बिरहौली गांव में 56.27 हेक्टेयर क्षेत्र में चूना पत्थर के खनन के लिए नए पट्टे हेतु आवेदन किया था। पट्टा मंजूर होने के बाद पक्षों के बीच एक समझौता निष्पादित किया गया। हालांकि, जिला कलेक्टर सतना ने 2 जुलाई 2004 के एक पत्र के जरिए कंपनी को संभावित रॉयल्टी के आधार पर गणना की गई 4,32,00,000 रुपये की स्टाम्प ड्यूटी का भुगतान करने का निर्देश दिया।
इस मांग से व्यथित होकर कंपनी ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ के समक्ष रिट याचिका दायर की। इसमें मांग नोटिस के साथ-साथ खनिज संसाधन विभाग द्वारा 15 मार्च 1993 को जारी उस परिपत्र (Circular) की वैधता को चुनौती दी गई थी, जिसमें संभावित रॉयल्टी के आधार पर ड्यूटी तय करने का निर्देश था। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने याचिका को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय स्टाम्प अधिनियम, 1899 की धारा 26 अनिर्धारित मूल्य वाले दस्तावेजों पर स्टाम्प ड्यूटी से संबंधित है और इसका परंतुक (Proviso) स्वतंत्र रूप से खनन पट्टों पर लागू होता है, जिससे यह स्पष्ट है कि स्टाम्प ड्यूटी रॉयल्टी के आधार पर ही ली जाएगी। हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
पक्षों की दलीलें
कंपनी की ओर से तर्क दिया गया कि भारतीय स्टाम्प अधिनियम की धारा 26 इस मामले में लागू नहीं होती, बल्कि मध्य प्रदेश संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा संशोधित अनुसूची 1ए का अनुच्छेद 33(ए) ही शासी प्रावधान है। कंपनी ने कहा कि 15 मार्च 1993 का परिपत्र केवल एक कार्यकारी आदेश था, जिसे कोई कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं था। कंपनी का तर्क था कि स्टाम्प ड्यूटी की गणना केवल ‘डेड रेंट’ के आधार पर होनी चाहिए, क्योंकि खान एवं खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 (MMDR एक्ट) की धारा 9ए, खनिज रियायत नियम, 1960 के नियम 27(1)(सी) और फॉर्म-के पट्टा विलेख के भाग V के तहत केवल यही एक निश्चित राशि है। कंपनी ने यह भी दावा किया कि धारा 26 का परंतुक मुख्य धारा के ही विपरीत है।
इसके विपरीत, मध्य प्रदेश राज्य सरकार ने दलील दी कि स्टाम्प अधिनियम की धारा 26 उन दस्तावेजों से निपटने के लिए एक व्यापक तंत्र प्रदान करती है जिनका मूल्य निष्पादन के समय तय नहीं किया जा सकता। राज्य ने कहा कि एमएमडीआर एक्ट और स्टाम्प एक्ट के बीच पूर्ण सामंजस्य है। एमएमडीआर एक्ट की धारा 9ए के तहत डेड रेंट केवल एक न्यूनतम गारंटीकृत राशि है, जबकि धारा 9 के तहत रॉयल्टी वास्तविक आर्थिक मूल्य को दर्शाती है जो खनन के उत्पादन से जुड़ी होती है। राज्य ने तर्क दिया कि निष्पादन के समय संभावित रॉयल्टी के आधार पर स्टाम्प ड्यूटी की गणना का नियम सार्वजनिक राजस्व की सुरक्षा के लिए बनाया गया है।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
स्टाम्प ड्यूटी का आधार ‘डेड रेंट’ होना चाहिए या ‘संभावित रॉयल्टी’, यह तय करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने दोनों अवधारणाओं के बीच कानूनी अंतर की जांच की। डी.के. त्रिवेदी एंड संस बनाम गुजरात राज्य (1986) मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने नोट किया कि डेड रेंट पट्टे पर दिए गए क्षेत्र पर तय किया जाने वाला एक निश्चित किराया है जो खदान में काम हो या न हो, देय होता है। दूसरी ओर, रॉयल्टी निकाली गई खनिजों की मात्रा के अनुपात में बदलती रहती है।
पीठ ने रॉयल्टी की गणना से संबंधित सिद्धांतों के लिए मिनरल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाम सेल (2024) में 9 जजों की संविधान पीठ के फैसले और एच.आर.एस. मूर्ति बनाम कलेक्टर ऑफ चित्तूर (1965) का भी संदर्भ लिया।
वित्तीय कानूनों (Fiscal Statutes) की व्याख्या के संबंध में डिस्ट्रिक्ट रजिस्ट्रार एंड कलेक्टर बनाम केनरा बैंक (2005) का उल्लेख करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“स्टाम्प एक्ट एक वित्तीय कानून है। उपचारात्मक कानूनों और जनहित की स्थायी नीतियों के आधार पर बने कानूनों की आमतौर पर उदार व्याख्या की जाती है। हालांकि, वित्तीय कानूनों को इस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, क्योंकि वे जनता पर वित्तीय बोझ डालते हैं, इसलिए इनका कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए। वित्तीय कानून की व्याख्या करते समय कुछ सिद्धांत पूरी तरह स्थापित हैं। यदि कानून का अक्षरशः अर्थ स्पष्ट और असंदिग्ध है, तो उसमें समानता या विवेक का कोई औचित्य नहीं रह जाता। अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों में किसी भी अस्पष्टता या विरोधाभास का लाभ नागरिक को ही मिलेगा।”
अदालत ने यह भी माना कि स्टाम्प अधिनियम की धारा 26 का परंतुक मुख्य धारा से असंगत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की:
“चूंकि खनन के मामले में वास्तविक मूल्य का निर्धारण केवल खनन कार्य शुरू होने के बाद ही किया जा सकता है, इसलिए यह निर्विवाद है कि समझौते के निष्पादन की तिथि पर मूल्य वास्तव में अनिर्धारित होता है। यह एक स्पष्ट पठन और सामान्य समझ से साबित होता है। इसके विपरीत कुछ और सोचना कठिन है।”
कोर्ट ने खनिज रियायत नियम, 1960 के नियम 31 के तहत निर्धारित फॉर्म-के की भी गहन समीक्षा की। पीठ ने नोट किया कि फॉर्म-के के भाग IX की धारा 9 में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि स्टाम्प ड्यूटी के उद्देश्य के लिए पट्टे पर दी गई भूमि से संभावित रॉयल्टी ही निर्दिष्ट आंकड़ा होगी। मध्य प्रदेश स्टाम्प एक्ट की अनुसूची 1ए के अनुच्छेद 33 पर कंपनी की निर्भरता को खारिज करते हुए कोर्ट ने माना:
“पक्षों ने सचेत रूप से फॉर्म-के में निहित समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जो कि एक वैधानिक फॉर्म है। इसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि स्टाम्प ड्यूटी की गणना के उद्देश्य से संभावित रॉयल्टी ही मानक मापदंड होगा।”
वैधानिक योजना को रेखांकित करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“इससे यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि जो राशि अधिक हो, उसका भुगतान किया जाना है और वैधानिक नियमों के उद्देश्य के लिए स्टाम्प ड्यूटी की गणना का तरीका केवल संभावित रॉयल्टी के माध्यम से है। इस मामले के रिकॉर्ड के अवलोकन से पता चलता है कि पक्षों के बीच निष्पादित फॉर्म-के पट्टे में यह शर्त मौजूद है। हमारे विचार में, जब स्थिति ऐसी हो, तो स्टाम्प ड्यूटी की गणना के तरीके के बारे में किसी भी संदेह की गुंजाइश नहीं रह जाती है।”
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने मेसर्स बिड़ला कॉर्पोरेशन लिमिटेड द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया और निर्देश दिया कि सभी आवश्यक कानूनी परिणाम लागू होंगे। अदालत ने लागत (Costs) के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया और सभी लंबित आवेदनों को निपटा दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: मेसर्स बिड़ला कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 5313/2026 (एसएलपी (सिविल) संख्या 14468/2022 से उद्भूत)
पीठ: जस्टिस संजय करोल, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह
निर्णय की तिथि: 23 जुलाई, 2026

