ग्राहक की शिकायत के बाद भी ब्लॉक नहीं किया डेबिट कार्ड: उपभोक्ता आयोग ने बैंक को दिए 60 हजार रुपये लौटाने और 30 हजार हर्जाना भरने के निर्देश

बैंक की लापरवाही के चलते खाताधारक के साथ हुई वित्तीय धोखाधड़ी के एक मामले में उत्तरी जिला दिल्ली उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने कड़ा रुख अपनाया है। आयोग ने एक वाणिज्यिक बैंक को निर्देश दिया है कि वह अपने ग्राहक को अवैध निकासी के 60,000 रुपये तुरंत लौटाए और मानसिक प्रताड़ना के एवज में 30,000 रुपये का हर्जाना अदा करे। यह आदेश ग्राहक द्वारा कार्ड ब्लॉक कराने की गुहार लगाने के बावजूद बैंक की ओर से समय पर कार्रवाई न करने के मामले में सामने आया है।

आयोग के अध्यक्ष दिव्य ज्योति जयपुरियार तथा सदस्य हरप्रीत कौर चर्या और अश्वनी कुमार मेहता की पीठ ने 17 अगस्त को यह फैसला सुनाया। पीठ ने बैंक को सेवा में गंभीर कमी का दोषी ठहराते हुए कुल 90,000 रुपये का भुगतान 30 दिनों के भीतर करने का आदेश दिया।

आयोग ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि बैंक अपनी सेवा में विफल रहा क्योंकि उसने शिकायत मिलने पर भी कार्ड ब्लॉक नहीं किया, जिसके परिणामस्वरूप पीड़ित के खाते से 60,000 रुपये की अनधिकृत निकासी हो गई।

एटीएम केबिन में धोखे से बदला गया था कार्ड

यह पूरा घटनाक्रम 22 अक्टूबर 2018 को शुरू हुआ था। पीड़ित ग्राहक को बैंक से नया एटीएम कार्ड मिला था, जिसे सक्रिय करने और नया पिन बनाने के लिए वह बैंक शाखा के बाहर लगे एटीएम बूथ पर गया। मशीन को संचालित करने में असमर्थ होने पर केबिन में मौजूद दो अज्ञात व्यक्तियों ने उसकी मदद करने की पेशकश की।

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मदद के बहाने उन दोनों शातिरों ने ग्राहक का गुप्त पिन देख लिया और चालाकी से उसका मूल डेबिट कार्ड बदलकर दूसरा कार्ड थमा दिया। पीड़ित को इस धोखाधड़ी की भनक तब लगी जब अगली सुबह उसके मोबाइल पर 25,000 रुपये की निकासी का अलर्ट मैसेज आया।

हेल्पलाइन पर शिकायत और आश्वासन के बाद भी खाते से उड़े 60 हजार

पहला मैसेज मिलते ही उपभोक्ता ने बिना कोई समय गंवाए बैंक की कार्ड हेल्पलाइन पर कॉल करके घटना की जानकारी दी और कार्ड ब्लॉक करने का अनुरोध किया। हेल्पलाइन प्रतिनिधि ने शिकायत दर्ज करते हुए एक संदर्भ संख्या जारी की और भरोसा दिलाया कि कार्ड निष्क्रिय कर दिया गया है तथा अब इसका दुरुपयोग नहीं हो सकेगा।

हालांकि, बैंक के इस आश्वासन के बावजूद उसी शाम उपभोक्ता के पास दो और संदेश आए, जिनसे पता चला कि उसके खाते से 50,000 रुपये और 10,000 रुपये की दो और अनधिकृत ट्रांजैक्शन कर ली गई हैं।

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जब पीड़ित ने बैंक से संपर्क किया तो अधिकारियों ने दावा किया कि उसके खाते से चार अलग-अलग डेबिट कार्ड जारी किए गए थे, जबकि ग्राहक का कहना था कि उसे केवल एक ही कार्ड मिला था। इसके बाद पीड़ित ने शेष कार्ड ब्लॉक कराए, पुलिस में आधिकारिक शिकायत दर्ज कराई और न्याय के लिए उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया।

आयोग ने माना: शुरुआती गलती के बावजूद बाद के नुकसान के लिए बैंक जिम्मेदार

आयोग के समक्ष बैंक ने अपना बचाव करते हुए तर्क दिया कि नुकसान का जिम्मेदार पूरी तरह ग्राहक स्वयं है, क्योंकि उसने सुरक्षा चेतावनियों की अनदेखी करते हुए अज्ञात व्यक्तियों के साथ कार्ड और गोपनीय पिन साझा किया था। बैंक की दलील थी कि ग्राहक की इस लापरवाही के कारण हुए किसी भी नुकसान के लिए वित्तीय संस्थान को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता।

वहीं, शिकायतकर्ता ने अपनी शुरुआती चूक को स्वीकार किया और पहली बार निकाली गई 25,000 रुपये की राशि पर कोई दावा नहीं जताया। उसका वाद केवल उन 60,000 रुपयों तक सीमित था, जो कार्ड ब्लॉक होने के बैंक के आश्वासन के बाद निकाले गए थे।

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उपभोक्ता आयोग ने ग्राहक की इस दलील को स्वीकार कर लिया। पीठ ने साक्ष्यों के आधार पर पाया कि उपभोक्ता ने पहली अनधिकृत निकासी के तुरंत बाद शिकायत दर्ज कराकर कार्ड निष्क्रिय कराने का पुख्ता प्रमाण पेश किया है। आयोग ने कहा कि बैंक ग्राहक के इस अनुरोध पर तत्काल कार्रवाई करने में नाकाम रहा, जिसके कारण 60,000 रुपये की अगली निकासी हुई। इसी आधार पर आयोग ने बैंक को यह रकम वापस करने और मानसिक उत्पीड़न के लिए 30,000 रुपये क्षतिपूर्ति देने का आदेश सुनाया।

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