दिल्ली हाईकोर्ट में टेक दिग्गजों की दलील: सोशल मीडिया पर सामग्री की पहले से निगरानी करना असंभव

फेसबुक की पैरेंट कंपनी मेटा प्लेटफॉर्म्स और गूगल एलएलसी ने दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका का विरोध करते हुए कहा है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पोस्ट होने वाली सामग्री की पहले से निगरानी (प्रोटेक्टिव मॉनिटरिंग) करना और उसे खुद-ब-खुद हटाना पूरी तरह अव्यावहारिक और असंभव है। दोनों तकनीकी कंपनियों ने अदालत में लिखित जवाब दाखिल कर स्पष्ट किया कि रोजाना अपलोड होने वाली सामग्री की भारी मात्रा को देखते हुए ऐसा करना तकनीकी और कानूनी रूप से व्यावहारिक नहीं है।

यह कानूनी विवाद वकील वैभव सिंह द्वारा दायर एक याचिका से जुड़ा है। याचिका में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से जुड़े अदालती मामले की कार्यवाही की अनधिकृत रिकॉर्डिंग और उसके सोशल मीडिया पर प्रसार पर आपत्ति जताई गई थी। इस मामले में हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने 23 अप्रैल को यह सवाल उठाया था कि क्या अदालत के नियमों का उल्लंघन करने वाले पोस्ट को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म खुद-ब-खुद (ऑटोमैटिकली) हटा सकते हैं।

मेटा ने खुद को सुपर सेंसर बनाने की मांग का किया विरोध

मेटा ने 4 जुलाई को दाखिल अपने जवाब में कहा कि किसी भी पोस्ट की वैधता का फैसला बिना संदर्भ के नहीं किया जा सकता। इसके लिए सामग्री के स्रोत, संदर्भ और प्रकृति की बारीकी से जांच करनी होगी। कंपनी का तर्क है कि यदि उसे यह जिम्मेदारी दी गई, तो उसे खुद ही सामग्री की वैधता तय करनी होगी, जिससे वह एक ‘सुपर सेंसर’ की भूमिका में आ जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही इस तरह की भूमिका को लेकर सचेत किया है।

मेटा ने बताया कि फेसबुक के पास दुनिया भर में 2.9 अरब से अधिक और इंस्टाग्राम के पास 1 अरब से अधिक उपयोगकर्ता हैं, जो रोजाना अरबों की संख्या में पोस्ट, कमेंट और लाइक करते हैं। इतनी विशाल मात्रा के बीच किसी खास आपत्तिजनक सामग्री को बिना सटीक यूआरएल (URL) के ढूंढ पाना नामुमकिन है।

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कंपनी ने सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) नियम, 2021 का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि नियमों के तहत मध्यस्थों (इंटरमीडियरीज) को गैर-कानूनी गतिविधियों को रोकने के लिए ‘उचित प्रयास’ करने होते हैं, लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि वे प्रकाशन से पहले हर सामग्री को सेंसर करें। कानून के अनुसार, कंपनियां केवल अदालती आदेशों या अधिकृत सरकारी एजेंसियों के निर्देशों पर कार्रवाई करने के लिए बाध्य हैं, न कि किसी निजी व्यक्ति की शिकायत पर।

गूगल ने यूट्यूब पर अपलोड होने वाले वीडियो की संख्या का दिया हवाला

गूगल ने भी 4 जुलाई को सौंपे अपने जवाब में मेटा जैसी ही चिंताएं जताईं। गूगल ने कहा कि यूट्यूब एक बेहद गतिशील (डायनामिक) प्लेटफॉर्म है, जहां दुनिया भर से हर घंटे लाखों वीडियो अपलोड किए जाते हैं। ऐसे में प्रत्येक वीडियो की पहले से निगरानी करना, उसकी बारीकियों को समझना या नियमों का उल्लंघन करने वाले अदालती वीडियो की पहचान के लिए लाखों फाइलों को खंगालना व्यावहारिक रूप से असंभव है।

गूगल ने जोर देकर कहा कि उसे किसी अप्रत्यक्ष कानूनी लड़ाई में नहीं घसीटा जाना चाहिए। कंपनी ने साफ किया कि प्लेटफॉर्म पर क्या अपलोड किया जा रहा है, इसमें उसकी कोई भूमिका नहीं होती और किसी भी उल्लंघन की कानूनी जिम्मेदारी केवल सामग्री अपलोड करने वाले व्यक्ति (क्रिएटर) की होती है।

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पत्रकार रवीश कुमार ने आरोपों को नकारा

इस मामले में याचिकाकर्ता वैभव सिंह ने अदालती कार्यवाही का वीडियो साझा करने के आरोप में वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार सहित कई लोगों के खिलाफ अवमानना कार्रवाई की मांग की है। रवीश कुमार ने 2 जुलाई को दाखिल अपने जवाब में कहा कि उन्होंने अदालत के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए उस पोस्ट को खुद ही हटा दिया था।

हालांकि, उन्होंने जानबूझकर अदालत की अवमानना करने के आरोपों को खारिज किया। कुमार ने कहा कि भारत में अदालती कार्यवाही की रिकॉर्डिंग, शेयरिंग और रिपोर्टिंग से जुड़े नियम एक समान नहीं हैं और वे लगातार बदल रहे हैं। देश के सुप्रीम कोर्ट, 25 हाईकोर्ट और अनगिनत निचली अदालतों के अलग-अलग और आपस में टकराते नियमों को समझना वकीलों के लिए भी बेहद मुश्किल है। ऐसे में किसी पत्रकार से दिल्ली हाईकोर्ट के 2025 के विशिष्ट नियमों की पूरी जानकारी रखने की उम्मीद करना और उनके कमेंट को ‘जानबूझकर की गई अवज्ञा’ बताना कानूनी रूप से तर्कसंगत नहीं है।

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