दिल्ली हाईकोर्ट ने एक पति की उस अपील को खारिज कर दिया है जिसमें उसने अपनी अवमानना सजा और पासपोर्ट को जब्त या निलंबित करने के निर्देशों को चुनौती दी थी। पति अपनी अलग रह रही पत्नी और नाबालिग बच्चे को अंतरिम गुजारा भत्ता देने में विफल रहा था। जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस विकास महाजन की बेंच ने स्पष्ट किया कि हालांकि पक्षकार आपस में समझौता करने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन चल रही बातचीत को कोर्ट के मौजूदा आदेशों के उल्लंघन या वित्तीय दायित्वों से बचने का बहाना नहीं बनाया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
दोनों पक्षकारों का विवाह 15 फरवरी, 2004 को हुआ था, जिसके बाद उनके घर एक बेटे का जन्म हुआ। वैवाहिक विवादों के बढ़ने पर, पत्नी ने नवंबर 2021 में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ते की याचिका दायर की थी।
फैमिली कोर्ट ने 20 जुलाई, 2024 को एक आदेश पारित करते हुए पति को पत्नी के लिए 25,000 रुपये प्रति माह और नाबालिग बच्चे के लिए 25,000 रुपये प्रति माह (कुल 50,000 रुपये प्रति माह) का भुगतान करने का निर्देश दिया था। इसके साथ ही, पति को बच्चे की पढ़ाई का खर्च उठाने और बकाया राशि को तीन महीने के भीतर समान मासिक किश्तों में चुकाने का निर्देश भी दिया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि किसी भी प्रकार की चूक को गौरव सोंधी बनाम दीया सोंधी 120 (2005) डीएलटी 426 के कानूनी मिसाल के तहत देखा जाएगा। लगातार भुगतान न होने के कारण, पत्नी ने अवमानना की कार्यवाही शुरू की।
न्यायिक प्रक्रिया और हाईकोर्ट की कार्रवाई
पति ने शुरुआत में फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए एक पुनरीक्षण याचिका (रिवीजन पिटिशन) दायर की थी, जिसे बाद में उसने वापस ले लिया। इसके अलावा, एक अन्य कार्यवाही में हाईकोर्ट की एक समन्वय पीठ ने 18 नवंबर, 2024 को पति को फैमिली कोर्ट के गुजारा भत्ता आदेश का पालन करने का निर्देश दिया था। पत्नी बैंक खाता कुर्क कराकर लगभग 3.5 लाख रुपये की आंशिक वसूली करने में सफल रही, लेकिन सितंबर 2024 के बाद से मासिक गुजारा भत्ते का भुगतान पूरी तरह से बकाया रहा।
अवमानना मामले की सुनवाई के दौरान सिंगल जज के सामने दुबई (यूएई) में रह रहे और काम कर रहे पति ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हिस्सा लिया। वह भुगतान न करने का कोई ठोस कारण नहीं बता सका और अंतरिम तौर पर कोई अस्थायी राशि देने से भी बचता रहा। 27 अप्रैल, 2026 को सिंगल जज ने फैसला सुनाया:
“ऐसी परिस्थितियों में, यह स्पष्ट है कि प्रतिवादी फैमिली कोर्ट द्वारा 20.07.2024 को पारित आदेश में दिए गए निर्देशों का जानबूझकर उल्लंघन कर रहा है। तदनुसार, उसे कोर्ट अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 10 के तहत ‘अवमानना’ का दोषी ठहराया जाता है।”
सिंगल जज ने पति को 18 मई, 2026 को सजा पर सुनवाई के लिए व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश होने का आदेश दिया था। हालांकि, उस तारीख पर भी उसने दुबई में ही रहने का फैसला किया और कोर्ट में शारीरिक रूप से उपस्थित होने से इनकार कर दिया। उसके वकील ने दलील दी कि धन का इंतजाम तभी किया जाएगा जब पत्नी एकमुश्त समझौते के लिए तैयार हो। कोर्ट ने माना कि यह रुख पति की दुर्भावना को दर्शाता है। इसके बाद कोर्ट ने उसकी उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए ब्यूरो ऑफ इमिग्रेशन को उसका पासपोर्ट निलंबित या जब्त करने का निर्देश दिया।
पति ने गर्मियों की छुट्टियों के दौरान एक अलग अपील दायर कर इस आदेश को चुनौती देने की कोशिश की, जिसे उसने 5 जून, 2026 को वापस ले लिया और फिर 27 अप्रैल और 18 मई, 2026 के आदेशों के खिलाफ वर्तमान अपील दायर की।
पक्षकारों की दलीलें और कोर्ट का विश्लेषण
डिवीजन बेंच (खंडपीठ) के समक्ष सुनवाई के दौरान पति के वकील ने स्वीकार किया कि फैमिली कोर्ट के गुजारा भत्ता आदेश के तहत कोई भी राशि नहीं दी गई है। वकील ने दलील दी कि पति मामले को पूरी तरह सुलझाने के लिए 40 लाख रुपये की एकमुश्त राशि देने को तैयार है, लेकिन पत्नी इससे अधिक राशि की मांग कर रही है।
जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस विकास महाजन ने इस पर टिप्पणी की कि हालांकि आपसी विवाद को सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझाना पक्षकारों का अपना विषय है, लेकिन इसके कारण पहले से जारी कोर्ट के आदेशों को निलंबित नहीं किया जा सकता। खंडपीठ ने कहा:
“हालांकि, इस बीच, अपीलकर्ता फैमिली कोर्ट द्वारा पारित आदेश की जानबूझकर अवहेलना जारी नहीं रख सकता और पत्नी तथा बच्चे को गुजारा भत्ता देने से इनकार नहीं कर सकता।”
कोर्ट ने माना कि पति के लगातार उल्लंघन और कोर्ट के समक्ष शारीरिक रूप से पेश होने से साफ इनकार को देखते हुए सिंगल जज द्वारा दिए गए निर्देश पूरी तरह से उचित और सही थे।
कोर्ट का निर्णय
पति की अपील में कोई दम न पाते हुए डिवीजन बेंच ने पिछली अवमानना की सजा और पासपोर्ट से जुड़े निर्देशों को बरकरार रखा और कहा:
“विद्वान सिंगल जज द्वारा पारित 27 अप्रैल, 2026 और 18 मई, 2026 के आक्षेपित आदेश पूरी तरह से वैध और तर्कसंगत हैं, और इनमें किसी भी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।”
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने अपील को खारिज कर दिया और सभी लंबित आवेदनों का निपटारा कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: अमित भामराल बनाम नेहा भामराल उर्फ नेहा शर्मा एवं अन्य
वाद संख्या: कंटेंप्ट अपील (सिविल) 14/2026 एवं सीएम अप्लीकेशन 40041/2026
पीठ: जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस विकास महाजन
निर्णय की तिथि: 2 जुलाई, 2026

