इलाहाबाद हाईकोर्ट: लखनऊ निवासी होने की शर्त मनमानी, असंवैधानिक; ई-रिक्शा पंजीकरण पर लगी रोक रद्द

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने शुक्रवार को उस आदेश को खारिज कर दिया जिसमें लखनऊ में ई-रिक्शा पंजीकरण के लिए “शहर का स्थायी निवासी” होना अनिवार्य किया गया था। अदालत ने कहा कि ऐसी शर्त संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(g) और 21 के तहत प्रदत्त समानता, व्यवसाय की स्वतंत्रता और जीवन के अधिकार का सीधे तौर पर उल्लंघन करती है।

न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति बी. आर. सिंह की खंडपीठ ने अजीत यादव सहित चार याचिकाओं पर सुनवाई के बाद यह निर्णय सुनाया।

याचिकाकर्ताओं ने चुनौती दी थी कि 5 फरवरी को सहायक क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी (प्रशासन), लखनऊ ने दो शर्तें लगाकर नया ई-रिक्शा पंजीकरण सीमित कर दिया था:

  1. जिसके नाम पहले से एक ई-रिक्शा पंजीकृत है, उसे नया पंजीकरण नहीं दिया जाएगा, और
  2. केवल लखनऊ का स्थायी निवासी ही नया ई-रिक्शा पंजीकरण ले सकेगा।
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इनमें से दूसरी शर्त—लखनऊ का स्थायी निवासी होना—को अदालत में चुनौती दी गई थी।

उत्तर प्रदेश सरकार ने कहा कि किराये पर रहने वाले ई-रिक्शा मालिकों का पता बदल जाने पर फिटनेस समाप्ति आदि की नोटिसें भेजना मुश्किल होता है, इसलिए यह शर्त लगाई गई।

अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और कहा कि प्रशासनिक कठिनाइयाँ किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों को सीमित करने का आधार नहीं हो सकतीं। कोर्ट ने सुझाव दिया कि यदि संख्या या ट्रैकिंग की समस्या है तो सरकार अन्य उपयुक्त उपाय लागू कर सकती है, जैसे—

  • हर वर्ष पंजीकरण की एक तय सीमा,
  • फिटनेस नियमों का सख्त पालन, और
  • बिना वैध फिटनेस वाले वाहनों की जब्ती।
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लेकिन केवल इसलिए पंजीकरण न देना कि व्यक्ति लखनऊ का स्थायी निवासी नहीं है—यह मनमाना और असंवैधानिक है, अदालत ने कहा।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह शर्त गैर-निवासियों के साथ भेदभाव करती है और इसका कोई तर्कसंगत आधार नहीं है। इससे सीधे तौर पर समानता का अधिकार, आजीविका का अधिकार और किसी भी वैध व्यवसाय को अपनाने की स्वतंत्रता प्रभावित होती है।

इस फैसले के बाद अब गैर-निवासी भी लखनऊ में ई-रिक्शा पंजीकरण के लिए आवेदन कर सकेंगे, बशर्ते वे अन्य सभी वैधानिक शर्तों का पालन करें।

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