देश में बढ़ते नशे के कारोबार पर कड़ा प्रहार करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक बड़ा और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि व्यावसायिक मात्रा (Commercial Quantity) में नशीले पदार्थों के साथ पकड़े गए आरोपी जमानत पाने के लिए ‘निर्दोष होने की सामान्य कानूनी धारणा’ (Presumption of Innocence) का दावा नहीं कर सकते।
न्यायमूर्ति वी. श्रीशानंद (Justice V Srishananda) की एकल पीठ ने ७ मई के अपने फैसले में (जो मंगलवार को सार्वजनिक हुआ) एक नाइजीरियाई नागरिक की जमानत याचिका को सिरे से खारिज कर दिया। यह आरोपी भारी मात्रा में एमडीएमए (MDMA) क्रिस्टल के साथ पकड़ा गया था। कोर्ट ने साफ किया कि नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (NDPS) एक्ट के कड़े प्रावधान सामान्य आपराधिक कानूनों पर हावी रहते हैं।
अदालत ने अपने आदेश में बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, “यदि किसी आरोपी पर एनडीपीएस कानून के तहत ‘व्यावसायिक मात्रा’ में ड्रग्स रखने का आरोप है, तो ऐसे मामलों में जमानत याचिका को खारिज करना ही नियम है और जमानत देना केवल एक अपवाद है।”
₹१.५ करोड़ से अधिक की ड्रग्स के साथ हुआ था गिरफ्तार
यह मामला नाइजीरियाई नागरिक क्रिस्टियन सोपोरुचुकवु (Cristian Soporuchukwu) की गिरफ्तारी से जुड़ा है। ५ अप्रैल २०२५ को एक गुप्त सूचना के आधार पर बेंगलुरु के बेगुरू इलाके में पुलिस ने कार्रवाई की थी। पुलिस ने सोपोरुचुकवु को घेरकर जब उसके दोपहिया वाहन की तलाशी ली, तो उसमें से १ किलोग्राम एमडीएमए क्रिस्टल बरामद हुआ।
हाईकोर्ट ने जमानत अर्जी पर सुनवाई के दौरान बरामद ड्रग्स की भारी मात्रा और उसकी कीमत को बेहद गंभीरता से लिया। सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक, बाजार में एमडीएमए की कीमत करीब १५,००० रुपये से २०,००० रुपये प्रति ग्राम है। इस हिसाब से जब्त किए गए १ किलो नशीले पदार्थ की कीमत लगभग १.५ करोड़ रुपये से भी अधिक है।
अदालत ने कहा कि इतनी भारी मात्रा में और इतनी महंगी ड्रग्स को पुलिस द्वारा आरोपी को झूठा फंसाने के लिए अपनी तरफ से प्लांट किया जाना नामुमकिन है। यह जब्ती ही अभियोजन पक्ष के दावे को मजबूत करने के लिए काफी है।
संवैधानिक अधिकारों और तकनीकी खामियों पर बहस
सुनवाई के दौरान आरोपी के वकील बालकृष्ण एम. आर. (Balakrishna M R) ने दलील दी कि पुलिस ने गिरफ्तारी के समय उनके मुवक्किल को ‘गिरफ्तारी के आधार’ (Grounds of Arrest) लिखित में नहीं सौंपे थे। उन्होंने दावा किया कि यह संविधान के अनुच्छेद २२ (Article 22) के तहत मिले मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है, इसलिए आरोपी को तकनीकी आधार पर जमानत मिलनी चाहिए।
दूसरी तरफ, सरकारी वकील चन्नप्पा एरप्पा (Channappa Erappa) ने इस याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने अदालत को बताया कि आरोपी सोपोरुचुकवु बिजनेस वीजा पर भारत आया था और वीजा की अवधि समाप्त होने के बाद भी वह अवैध रूप से देश में रह रहा था। सरकारी वकील ने तर्क दिया कि यह तथ्य ही आरोपी की संदिग्ध मंशा को उजागर करने के लिए काफी है।
अभियोजन पक्ष ने यह भी साबित किया कि आरोपी को गिरफ्तारी मेमो विधिवत सौंपा गया था। जब आरोपी को पहली बार मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, तब उसने भाषा की समस्या या पुलिस द्वारा किसी भी तरह के दुर्व्यवहार की कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई थी।
हत्या के मुकदमों से अलग क्यों है एनडीपीएस कानून?
बचाव पक्ष की दलीलों का जवाब देते हुए न्यायमूर्ति श्रीशानंद ने एनडीपीएस एक्ट की धारा ३७ (Section 37) के पीछे के विधायी इरादे को समझाया। उन्होंने इसकी तुलना हत्या (Murder) जैसे जघन्य अपराधों से करते हुए एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर स्पष्ट किया।
सामान्य आपराधिक मामलों में कानून यह मानकर चलता है कि आरोपी तब तक निर्दोष है जब तक कि उसका दोष साबित न हो जाए। लेकिन जस्टिस श्रीशानंद ने रेखांकित किया कि एनडीपीएस कानून की धारा ३७ जानबूझकर इस सामान्य धारणा को खत्म करती है। ड्रग्स के मामलों में खुद आरोपी को अदालत के सामने यह साबित करना होता है कि वह निर्दोष है।
पीठ ने कहा, “एनडीपीएस अधिनियम की धारा ३७ को बिना किसी मकसद के नहीं जोड़ा गया है। इसका मुख्य उद्देश्य देश की युवा पीढ़ी को खोखला कर रहे ड्रग्स परिवहन, तस्करी और पेडलिंग जैसी बुराइयों पर लगाम लगाना है।”
तकनीकी चोर दरवाजे से नहीं मिलेगी राहत
हाईकोर्ट ने पाया कि पुलिस ने आरोपी के अधिकारों का पूरा ध्यान रखा था। सोपोरुचुकवु के नाइजीरियाई नागरिक होने के कारण जांच अधिकारी ने सावधानी बरतते हुए गिरफ्तारी के आधारों को अंग्रेजी भाषा में लिखकर उसे सौंपा था। निचली अदालत के न्यायाधीश के सामने पेशी के दौरान आरोपी ने खुद स्वीकार किया था कि उसके साथ कोई बुरा बर्ताव नहीं हुआ और उसके एक दोस्त को गिरफ्तारी की सूचना दे दी गई थी।
कोर्ट ने तकनीकी खामियों का सहारा लेकर गंभीर मामलों से बचने की कोशिशों पर कड़ी आपत्ति जताई।
न्यायमूर्ति ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “एक तरफ जहां गिरफ्तारी के आधार न बताना या उनका ठीक से पालन न करना सामान्य अपराधों में जमानत का मजबूत आधार हो सकता है, वहीं दूसरी तरफ एनडीपीएस के तहत ‘व्यावसायिक मात्रा’ के आरोपियों को प्रक्रियात्मक खामियों का फायदा उठाकर पिछले दरवाजे (Backdoor Entry) से जमानत पाने की अनुमति बिल्कुल नहीं दी जा सकती।”
इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने आरोपी की जमानत याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया।

