केरल सरकार के काजू विभाग के सचिव और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी के. बीजू ने शुक्रवार को केरल हाईकोर्ट के समक्ष व्यक्तिगत रूप से पेश होकर बिना शर्त माफी मांगी है। यह मामला वर्ष 2015 के एक कथित भ्रष्टाचार मामले में अधिकारियों पर मुकदमा चलाने की मंजूरी देने वाले सरकारी आदेश में इस्तेमाल की गई विवादित भाषा से जुड़ा है, जिस पर हाईकोर्ट ने पूर्व में बेहद सख्त नाराजगी जताई थी।
जस्टिस ए. बदरुद्दीन की एकल पीठ के समक्ष पेश होकर बीजू ने एक औपचारिक हलफनामा दायर किया। उन्होंने अपने हलफनामे में स्वीकार किया कि 2 जुलाई को जारी किए गए अभियोजन मंजूरी आदेश की शब्दावली अनुचित थी। बीजू ने कहा कि इस भाषा से यह गलत संदेश जा सकता था कि सरकार ने बिना स्वतंत्र सोच और विवेक के, केवल अदालत के दबाव में आकर यह फैसला लिया है। उन्होंने अदालत के अधिकार, गरिमा और न्यायिक बुद्धिमत्ता पर सवाल उठाने वाले अपने पूर्व के बयानों को बिना शर्त वापस लेते हुए कोर्ट से इस भूल को अनजाने में हुई चूक मानने और उन्हें क्षमा करने का अनुरोध किया।
हाईकोर्ट ने आईएएस अधिकारी की व्यक्तिगत उपस्थिति और उनके बिना शर्त माफीनामे को रिकॉर्ड पर लिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य के एडवोकेट जनरल ने भी यह माना था कि मूल आदेश में प्रयुक्त भाषा प्रथम दृष्ट्या अदालत की अवमानना के दायरे में आती है। अदालत ने इस मामले में फैसला सुरक्षित रखते हुए अगली सुनवाई के लिए 15 जुलाई की तारीख तय की है।
हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी और अवमानना नोटिस
इससे पहले, बीते बुधवार को हाईकोर्ट ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए संबंधित नौकरशाह को अवमानना का नोटिस जारी किया था। जस्टिस बदरुद्दीन ने सुनवाई के दौरान मौखिक टिप्पणी की थी कि यह आदेश न्यायपालिका को निशाना बनाने और आरोपियों को बचाने के उद्देश्य से तैयार किया गया प्रतीत होता है। अदालत ने स्पष्ट किया था कि मुकदमा चलाने की मंजूरी देने का निर्णय केस के तथ्यों और रिकॉर्ड की प्राथमिक संतुष्टि के आधार पर स्वतंत्र रूप से लिया जाना चाहिए, न कि इसका श्रेय अदालती निर्देशों को देकर जिम्मेदारी से बचने का प्रयास किया जाना चाहिए। इस कड़ी न्यायिक टिप्पणी के बाद, राज्य सरकार ने आनन-फानन में 6 जुलाई को एक नया और संशोधित मंजूरी आदेश जारी किया था।
क्या है पूरा मामला
यह पूरा विवाद केरल स्टेट काजू विकास निगम (केएससीडीसी) के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ आईएनटीयूसी (INTUC) नेता आर. चंद्रशेखरन सहित कई अन्य अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति से जुड़ा है। कोल्लम निवासी कदाकम्पल्ली मनोज ने हाईकोर्ट में एक अवमानना याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि राज्य सरकार केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को इन आरोपियों पर मुकदमा चलाने की मंजूरी देने संबंधी अदालती निर्देशों का पालन नहीं कर रही है।
यह भ्रष्टाचार का मामला साल 2015 का है, जब हाईकोर्ट के निर्देश पर सीबीआई ने निगम के भीतर हुई कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच के लिए मामला दर्ज किया था। जांच पूरी करने के बाद, सीबीआई ने आरोपियों के खिलाफ अदालती कार्यवाही शुरू करने के लिए राज्य सरकार से आधिकारिक मंजूरी मांगी थी, जिसके बाद सरकार की ओर से यह विवादित आदेश जारी हुआ था।

