सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें लखनऊ के एक बड़े वित्तीय और संपत्ति धोखाधड़ी मामले की आरोपी मोनिका द्विवेदी को अग्रिम जमानत दी गई थी। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने कहा कि हाईकोर्ट ने अपंजीकृत एग्रीमेंट और शिकायतकर्ता द्वारा पैसे वापस मांगने जैसे बाहरी दीवानी (सिविल) पहलुओं पर ध्यान दिया, जबकि आरोपी द्वारा की गई धोखाधड़ी और उसके आपराधिक इतिहास जैसे गंभीर आपराधिक मामलों की अनदेखी की। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने शिकायतकर्ता की अपील स्वीकार करते हुए आरोपी की अग्रिम जमानत रद्द कर दी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद लखनऊ के महानगर एक्सटेंशन स्थित एक आवासीय संपत्ति (C-24, ई-पार्क) से जुड़ा है। शिकायतकर्ता सौरभ अग्रवाल ने 3 जनवरी 2025 को एक एफआईआर दर्ज कराई थी। एफआईआर के अनुसार, आरोपी मोनिका द्विवेदी, उनके बेटे अभिषेक द्विवेदी और बेटी अभिलाषा द्विवेदी ने खुद को इस संपत्ति का संयुक्त मालिक बताया था।
इस बात पर भरोसा करके शिकायतकर्ता ने 8 जनवरी 2024 को एक नोटरी एग्रीमेंट किया। संपत्ति की कुल कीमत 4,30,00,000 रुपये तय हुई थी, जिसमें से 3,55,00,000 रुपये शिकायतकर्ता ने किश्तों में दे दिए। आरोपियों ने कहा कि मोनिका द्विवेदी की बेटी के विदेश से लौटने के बाद रजिस्ट्री (सेल डीड) करा दी जाएगी और सबूत के तौर पर हवाई यात्रा के टिकट भी दिखाए।
लेकिन बड़ी रकम मिलने के बावजूद, मोनिका द्विवेदी और उनके बेटे ने 24 जून 2024 को पूरी संपत्ति किसी तीसरे पक्ष (पंकज मोहन मिश्रा) के नाम रजिस्टर कर दी। शिकायतकर्ता को पता चला कि बेटी का संपत्ति में कोई मालिकाना हक ही नहीं था और उनके साथ धोखा हुआ है। जब पैसे वापस मांगे गए या रजिस्ट्री करने को कहा गया, तो शिकायतकर्ता को धमकियां दी गईं।
शुरुआत में यह एफआईआर अलीगंज थाने में दर्ज की गई थी, जिसे बाद में महानगर थाने में आईपीसी की धाराओं 406, 420, 467, 468, 471, 506, 120-बी और 34 के तहत ट्रांसफर कर दिया गया।
पूर्व अदालती इतिहास:
- एफआईआर रद्द कराने की कोशिश: आरोपियों ने एफआईआर रद्द कराने के लिए हाईकोर्ट में अर्जी दी थी। मध्यस्थता फेल होने के बाद, हाईकोर्ट ने 8 मई 2025 को याचिका खारिज कर दी और आरोपियों के आपराधिक इतिहास तथा धोखाधड़ी के साफ सबूतों का जिक्र किया।
- सेशन कोर्ट से जमानत खारिज: लखनऊ के सेशन कोर्ट ने भी 18 जून 2025 को आरोपों की गंभीरता और पुराने आपराधिक इतिहास को देखते हुए आरोपियों की अग्रिम जमानत अर्जी खारिज कर दी थी।
- फरार आरोपी: शिकायतकर्ता द्वारा निष्पक्ष जांच की मांग वाली एक अन्य अर्जी पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर लिया था कि आरोपी फरार चल रहे हैं और पुलिस उन्हें पकड़ने के लिए लगातार सख्त कदम उठा रही है।
- हाईकोर्ट से जमानत: इसके बावजूद, 6 अक्टूबर 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने आरोपी मोनिका द्विवेदी को अग्रिम जमानत दे दी, जिसे शिकायतकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
दोनों पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता (शिकायतकर्ता) की दलीलें: शिकायतकर्ता के वकील ने कहा कि हाईकोर्ट ने आरोपों की गंभीरता, आर्थिक अपराध में जांच की जरूरत और आरोपी मोनिका द्विवेदी के पुराने आपराधिक इतिहास को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया।
हाईकोर्ट का तर्क (जिसके आधार पर जमानत दी गई थी): अग्रिम जमानत देते समय हाईकोर्ट ने कहा था कि:
- बिक्री का समझौता (एग्रीमेंट टू सेल) केवल नोटरी कराया गया था, रजिस्टर्ड नहीं था।
- आरोपी की बेटी समझौते के समय विदेश में थी, जिससे लगता है कि समझौते पर सभी मालिकों के दस्तखत नहीं थे।
- कुल रकम में से केवल 3,55,00,000 रुपये दिए गए थे और बाकी पैसे देने की तैयारी का कोई जिक्र नहीं था।
- शिकायतकर्ता ने एफआईआर में पैसे वापस मांगे थे, जिससे यह मामला सिविल (दीवानी) विवाद जैसा लगता है।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इन तर्कों को पूरी तरह खारिज कर दिया और कहा कि इनका अग्रिम जमानत देने के नियमों से कोई लेना-देना नहीं है।
बेटी के विदेश में होने पर: कोर्ट ने कहा कि इससे धोखाधड़ी का आरोप कम नहीं होता:
“अगर यह बात सच भी मान ली जाए, तो भी इससे बहलाने-फुसलाने का आरोप कम नहीं होता। मुख्य आरोप यह है कि शिकायतकर्ता को विश्वास दिलाया गया कि सभी मालिक इस सौदे में शामिल होंगे और इस भरोसे पर शिकायतकर्ता ने बड़ी रकम दे दी। सभी सह-मालिकों ने वास्तव में दस्तखत किए थे या नहीं, यह सबूत का विषय है। इस स्तर पर ध्यान सिर्फ शुरुआत में की गई धोखाधड़ी पर होना चाहिए।”
एग्रीमेंट के अपंजीकृत होने पर: कोर्ट ने कहा कि समझौते के रजिस्टर्ड न होने से अपराध खत्म नहीं होता:
“समझौते का प्रारूप अपने आप में किसी आपराधिक अपराध के होने या न होने को तय नहीं करता। आरोप सिर्फ कॉन्ट्रैक्ट तोड़ने का नहीं है, बल्कि शुरू से ही धोखा देने और पैसे लेने के बाद अपनी बात से मुकर जाने का है। एग्रीमेंट का रजिस्टर्ड न होना इस अपराध को कम नहीं करता।”
आंशिक भुगतान और तैयारी पर: बेंच ने कहा कि जमानत के समय सिविल तैयारी देखना गलत है:
“यह भी अग्रिम जमानत पर विचार करने का पैमाना नहीं हो सकता। मुख्य आरोप यह है कि आरोपियों ने एक बड़ी रकम ली और उसके बाद संपत्ति किसी तीसरे पक्ष को बेच दी। यहां मुद्दा सिर्फ एग्रीमेंट पूरा करने की तैयारी का नहीं है, बल्कि बड़ी रकम हड़पने के बाद आरोपियों के आचरण का है।”
पैसे वापस मांगने को सिविल विवाद बताने पर: कोर्ट ने कहा कि सिविल केस की गुंजाइश होने से क्रिमिनल केस खत्म नहीं होता:
“हाईकोर्ट का यह कहना कि शिकायतकर्ता ने एफआईआर में पैसे वापस मांगे हैं, इसलिए यह सिविल विवाद है, स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह स्थापित कानून है कि सिविल केस का विकल्प होने से आपराधिक कार्यवाही नहीं रुकती, बशर्ते पहली नज़र में आपराधिक अपराध के तत्व मौजूद हों। शिकायतकर्ता द्वारा पैसे वापस मांगने मात्र से धोखाधड़ी के आरोप खत्म नहीं हो जाते।”
आपराधिक इतिहास की अनदेखी पर: सुप्रीम कोर्ट ने सख्त आपत्ति जताई कि हाईकोर्ट ने आरोपी के पुराने आपराधिक मामलों का जिक्र तक नहीं किया:
“एफआईआर रद्द करने की अर्जी खारिज करते समय खुद हाईकोर्ट ने और बाद में सेशन कोर्ट ने आरोपियों के खिलाफ इसी तरह के कई आपराधिक मामलों का जिक्र किया था। इसके बावजूद, हाईकोर्ट का यह आदेश इस पर पूरी तरह चुप है। आर्थिक धोखाधड़ी के मामले में इतने महत्वपूर्ण पहलुओं को नजरअंदाज करना हाईकोर्ट के फैसले को खारिज करने योग्य बनाता है।”
कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने मुख्य मुद्दों को छोड़कर केवल बाहरी बातों पर ध्यान दिया और बिना दिमाग लगाए फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि यह एक पूर्व-नियोजित आर्थिक अपराध था, जिसमें बड़ी रकम शामिल थी और आरोपी जांच से भाग रहे थे:
“आरोपों की गंभीरता, बड़ी रकम, आरोपी का पुराना आपराधिक इतिहास और निष्पक्ष जांच की आवश्यकता को देखते हुए, हमारा मानना है कि इस स्तर पर आरोपी मोनिका द्विवेदी को अग्रिम जमानत देना बिल्कुल उचित नहीं है।”
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और मोनिका द्विवेदी की अग्रिम जमानत खारिज कर दी। कोर्ट ने साफ किया कि इन टिप्पणियों का ट्रायल कोर्ट की मुख्य सुनवाई पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
केस डिटेल्स
- केस का नाम: सौरभ अग्रवाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य
- केस नंबर: क्रिमिनल अपील संख्या 2850/2026
- बेंच: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया
- तारीख: 26 मई, 2026

