इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने सरकारी धन के कथित गबन से जुड़े एक मामले में उत्तर प्रदेश के लोकायुक्त के खिलाफ की गई अपनी पिछली सख्त टिप्पणियों को वापस ले लिया है। मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह की खंडपीठ ने यह आदेश देते हुए निर्देश दिया कि मामले में विपक्षी पक्षों की सूची से लोकायुक्त का नाम हटाकर उनकी जगह उप-लोकायुक्त को शामिल किया जाए।
क्या है पूरा मामला? (विवाद की पृष्ठभूमि)
यह कानूनी लड़ाई मोहम्मद सलीम द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) से शुरू हुई थी। याचिका में लखीमपुर खीरी में सरकारी धन के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
याचिका के अनुसार, लखीमपुर खीरी में तैनात ग्राम विकास अधिकारी (GVA) अहमद हसन ने कथित तौर पर ₹6,02,995 का सरकारी फंड एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी फुरकान अली के निजी बैंक खाते में ट्रांसफर कर दिया था। इस वित्तीय गड़बड़ी की विभागीय जांच हुई और 8 जून 2020 को हसन को एक मामूली विभागीय सजा दी गई, जिसके तहत उसकी एक वेतन वृद्धि (increment) रोक दी गई और उसकी सर्विस बुक में एक प्रतिकूल प्रविष्टि दर्ज की गई।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि इस बेहद मामूली सजा ने आरोपी अधिकारी के हौसले और बढ़ा दिए। विभागीय सजा का कोई डर न होने के कारण अहमद हसन ने 10 अप्रैल 2023 को एक और बड़ा घोटाला किया। इस बार उसने सरकारी खजाने से सीधे ₹95,94,015 की भारी-भरकम राशि फुरकान अली के उसी निजी खाते में ट्रांसफर कर दी।
शिकायत बंद होने पर हाईकोर्ट की नाराजगी
इस दूसरे बड़े ट्रांजैक्शन पर जब प्रशासन द्वारा कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई, तो लोकायुक्त कार्यालय में इसकी औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई। लोकायुक्त ने इस शिकायत को जांच के लिए उप-लोकायुक्त के पास भेज दिया।
हालांकि, उप-लोकायुक्त ने यह कहते हुए इस शिकायत को बंद (क्लोज) कर दिया कि आरोपी ग्राम विकास अधिकारी को पहले ही इसी तरह के एक मामले में विभागीय सजा मिल चुकी है।
जब यह मामला हाईकोर्ट पहुंचा, तो अदालत ने इस रवैये पर गहरी नाराजगी जताई। पिछले 16 मार्च को हुई सुनवाई में कोर्ट ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया कि इतने बड़े गबन के बाद भी आरोपी को खुला छोड़ दिया गया। इसी सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने लोकायुक्त के खिलाफ कड़ी टिप्पणियां दर्ज की थीं और राज्य सरकार सहित सभी संबंधित पक्षों से जवाब मांगा था।
लोकायुक्त की सफाई और कोर्ट का रुख
हाईकोर्ट के कड़े रुख के बाद लोकायुक्त कार्यालय की ओर से अदालत में जवाब दाखिल किया गया। इस जवाब में प्रशासनिक विभाजन को स्पष्ट करते हुए बताया गया कि शिकायत को बंद करने और आरोपी अधिकारी को राहत देने का आदेश लोकायुक्त ने नहीं, बल्कि उप-लोकायुक्त ने स्वतंत्र रूप से पारित किया था।
लोकायुक्त की ओर से दलील दी गई कि चूंकि यह फैसला उनका नहीं था, इसलिए 16 मार्च को कोर्ट द्वारा उनके खिलाफ की गई टिप्पणियां अनुचित थीं और उन्हें वापस लिया जाना चाहिए।
अदालत ने इन दलीलों पर विचार किया और रिकॉर्ड की जांच करने के बाद पाया कि वास्तव में वह आदेश उप-लोकायुक्त द्वारा ही पारित किया गया था।
अदालत का अंतिम निर्णय
मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह की खंडपीठ ने लोकायुक्त की दलीलों को स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ की गई प्रतिकूल टिप्पणियों को वापस ले लिया।
इसके साथ ही अदालत ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- विपक्षी पक्षों की सूची (array of opposite parties) से लोकायुक्त का नाम तुरंत हटाया जाए।
- लोकायुक्त के स्थान पर उप-लोकायुक्त को इस मामले में नया पक्षकार बनाया जाए।
हाईकोर्ट ने इस जनहित याचिका पर अगली सुनवाई के लिए 10 जुलाई की तारीख तय की है, जहां सरकारी धन के इस बड़े दुरुपयोग के मुख्य मामले पर आगे की सुनवाई की जाएगी।

