गुवाहाटी हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि दो वयस्कों के बीच लंबे समय तक चले आपसी सहमति के रिश्ते का अंत होना ‘धोखाधड़ी’ नहीं माना जा सकता। अदालत ने एक व्यक्ति को बरी करने के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि अगर समय के साथ आपसी प्यार और आकर्षण खत्म हो जाता है, तो किसी एक पक्ष का अलग रास्ता चुन लेना आपराधिक विश्वासघात के दायरे में नहीं आता।
जस्टिस माइकल जोथानखुमा और जस्टिस संजीव कुमार शर्मा की खंडपीठ ने इस मामले को “एक ठुकराई हुई महिला के गुस्से” (hell hath no fury like a woman scorned) का उदाहरण बताया।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “चूंकि दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति से रिश्ता था, इसलिए यह मामला सीधे तौर पर एक ठुकराई हुई महिला के गुस्से जैसा प्रतीत होता है। किसी भी कारण से, प्रतिवादी (पुरुष) का अपीलकर्ता (महिला) के प्रति आकर्षण और प्यार समय के साथ खत्म हो गया। नौ साल के सहमति वाले रिश्ते के बाद किसी एक साथी का अपनी अलग राह चुन लेना धोखाधड़ी नहीं कहा जा सकता।”
स्कूल के दिनों की दोस्ती से 9 साल के रिश्ते का सफर
यह पूरा कानूनी विवाद एक महिला द्वारा दायर अपील से जुड़ा है। महिला ने निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) के नवंबर 2025 के उस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें आरोपी पुरुष को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया था।
अदालती दस्तावेजों के अनुसार, याचिकाकर्ता महिला और आरोपी पुरुष स्कूल के दिनों से एक-दूसरे को जानते थे। बालिग होने के बाद दोनों आपसी सहमति से एक शारीरिक रिश्ते में आ गए, जो लगभग नौ साल तक चला।
महिला का दावा था कि उसने इस शारीरिक संबंध के लिए सहमति इसलिए दी थी क्योंकि पुरुष ने उससे शादी करने का वादा किया था। हालांकि, महिला का आरोप है कि बाद में पुरुष ने उसे अचानक बताया कि उसका रिश्ता कहीं और तय हो चुका है और उसकी सगाई (रिंग सेरेमनी) भी हो चुकी है।
कानूनी बहस: क्या शादी का वादा तोड़ना ‘धोखाधड़ी’ है?
हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान महिला की ओर से पेश वकील आर. सरमा ने अदालत के सामने स्वीकार किया कि इस मामले में आईपीसी (IPC) की धारा 376 के तहत बलात्कार का कोई मामला नहीं बनता है।
हालांकि, वकील ने दलील दी कि पुरुष द्वारा शादी का वादा तोड़ना आईपीसी की धारा 417 (धोखाधड़ी) के तहत सजा पाने के लिए पर्याप्त आधार है। उन्होंने अदालत से निचली अदालत के फैसले को पलटने और पुरुष को धोखाधड़ी का दोषी ठहराने की मांग की।
दूसरी तरफ, सहायक लोक अभियोजक (Assistant Public Prosecutor) ने इस दलील का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि जब खुद महिला की तरफ से बलात्कार का कोई आरोप नहीं है, तो केवल शादी के वादे के टूटने को आपराधिक धोखाधड़ी के तौर पर साबित नहीं किया जा सकता।
हाई कोर्ट ने क्यों खारिज की अपील?
गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने बचाव पक्ष की दलीलों से सहमति जताते हुए इस मामले को खारिज कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में मुख्य रूप से तीन बिंदुओं को आधार बनाया:
- रिश्ते की शुरुआत में कोई दुर्भावना नहीं: कोर्ट ने पाया कि इस बात का कोई सबूत या शिकायत नहीं है कि रिश्ते की शुरुआत में पुरुष ने किसी दुर्भावना या धोखे की नीयत से शादी का कोई झूठा वादा किया था।
- वयस्कों की आपसी सहमति: दोनों पक्ष बालिग थे और उन्होंने लगभग एक दशक तक आपसी मर्जी से शारीरिक और भावनात्मक रिश्ता बनाए रखा।
- बलात्कार के आरोपों का अभाव: चूंकि मामले में जबरदस्ती या बलात्कार का कोई आरोप शामिल नहीं था, इसलिए केवल ब्रेकअप होने की वजह से इसे आपराधिक धोखाधड़ी नहीं माना जा सकता।
अदालत ने अंत में कहा कि आपसी प्यार और खिंचाव का खत्म हो जाना इंसानी रिश्तों का एक हिस्सा है। लंबे समय तक चले रिश्ते के बाद अलग हो जाना और शादी न करना भारतीय कानून के तहत कोई आपराधिक कृत्य नहीं है।

