सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश प्रशासन को कड़ा संदेश देते हुए कहा है कि सरकारी अधिकारियों से यह उम्मीद बिल्कुल नहीं की जाती कि वे कानून के विपरीत जाकर किसी भी पक्ष का समर्थन करें। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य और उसके अधिकारियों का यह बुनियादी कर्तव्य है कि वे कोर्ट के समक्ष निष्पक्ष रहकर “वास्तविक सहायता” प्रदान करें। जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की खंडपीठ ने एक उम्मीदवार को अवैध रूप से कॉलेज आवंटित करने के मामले में यूपी के अधिकारियों के आचरण पर गंभीर आपत्ति जताई। इसके साथ ही, कोर्ट ने निरस्त हो चुके उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग अधिनियम, 1980 (‘पुराना कानून’) के तहत प्रतीक्षा सूची (वेटिंग लिस्ट) के एक उम्मीदवार द्वारा कॉलेज ट्रांसफर करने की मांग को खारिज कर दिया।
अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले की पुष्टि की, जिसमें कहा गया था कि प्रतीक्षा सूची में शामिल किसी भी उम्मीदवार को आवंटित कॉलेज में ज्वाइन न करने के बाद अपनी पसंद के किसी अन्य संस्थान में ट्रांसफर का कोई अधिकार नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग अधिनियम, 2023 (‘नया कानून’) के लागू होने के साथ ही पुराना कानून समाप्त हो चुका है और उसके तहत तैयार की गई पूरी प्रतीक्षा सूची स्वतः ही निष्प्रभावी हो गई है।
मामले की पृष्ठभूमि
उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग ने अशासकीय सहायता प्राप्त स्नातकोत्तर (पीजी) और स्नातक (यूजी) महाविद्यालयों में प्रिंसिपल के खाली पदों को भरने के लिए वर्ष 2019 में विज्ञापन संख्या 49 जारी किया था। चयन प्रक्रिया संपन्न होने के बाद, 5 अक्टूबर 2021 को आयोग ने 290 चयनित उम्मीदवारों की मुख्य सूची और 73 प्रतीक्षा सूची वाले उम्मीदवारों का पैनल जारी किया। इस प्रतीक्षा सूची में अपीलकर्ता डॉ. मनोज कुमार रावत का नाम 59वें स्थान पर था।
मुख्य चयन सूची में शामिल डॉ. सच्चिदानंद शर्मा को मेरठ कॉलेज, मेरठ के प्रिंसिपल पद पर नियुक्त किया गया और उन्होंने 23 अक्टूबर 2021 को कार्यभार संभाला। लगभग एक वर्ष और दस महीने तक काम करने के बाद, डॉ. शर्मा ने 28 मई 2023 को इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफे के बाद, कॉलेज की वरिष्ठतम शिक्षिका डॉ. अंजलि मित्तल को उनकी सेवानिवृत्ति (30 जून 2024) तक कार्यवाहक प्रिंसिपल बनाया गया। इसके बाद, अगले वरिष्ठतम शिक्षक युधवीर सिंह (प्रतिवादी संख्या 6) को 14 जून 2024 को कार्यवाहक प्रिंसिपल नियुक्त किया गया।
इसी बीच, 3 अगस्त 2022 को उच्च शिक्षा निदेशक ने प्रतीक्षा सूची से डॉ. रावत को श्री बजरंग पी.जी. कॉलेज, बलिया में प्रिंसिपल के रूप में नियुक्त करने की संस्तुति की थी। पुराने कानून के अनुसार, कॉलेज प्रबंधन को तीस दिनों के भीतर नियुक्ति पत्र जारी करना था। हालांकि, पारिवारिक परिस्थितियों का हवाला देकर डॉ. रावत ने बलिया कॉलेज में कार्यभार संभालने के लिए कोई कदम नहीं उठाए। इसके बजाय, नियुक्ति की संस्तुति के लगभग साढ़े दस महीने बाद, 26 जून 2023 को उन्होंने निदेशक को एक प्रतिवेदन भेजकर मेरठ कॉलेज सहित अन्य रिक्त पदों पर ट्रांसफर करने का अनुरोध किया।
निदेशक ने 17 अगस्त 2023 को सरकार के विशेष सचिव को अपनी रिपोर्ट भेजी, जिसमें स्पष्ट किया गया कि डॉ. रावत को बलिया कॉलेज में ज्वाइन करना था और पुराने नियमों के तहत एक बार संस्तुति होने के बाद स्थान बदलने या ट्रांसफर करने का कोई प्रावधान नहीं है।
इसके चार दिन बाद, 21 अगस्त 2023 को नया कानून लागू हो गया, जिसने पुराने कानून को समाप्त कर दिया। इसके बावजूद, अधिकारियों ने अपने रुख में अप्रत्याशित बदलाव किया। निदेशक ने 13 दिसंबर 2023 को एक पत्र जारी कर विशेष परिस्थितियों का हवाला देते हुए अपीलकर्ता का ट्रांसफर मेरठ कॉलेज करने की संस्तुति की, जिसे 12 जनवरी 2024 को शासन के संयुक्त सचिव ने मंजूरी दे दी। इसके बाद मेरठ कॉलेज के तत्कालीन कार्यवाहक प्रिंसिपल (प्रतिवादी संख्या 6) ने इस स्थानांतरण आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी, जहां सिंगल जज पीठ और बाद में डिवीजन बेंच ने इस ट्रांसफर को अवैध घोषित कर दिया। इसके खिलाफ डॉ. रावत ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता के तर्क
अपीलकर्ता डॉ. रावत के वकील ने तर्क दिया कि प्रतिवादी संख्या 6 केवल एक कार्यवाहक प्रिंसिपल हैं, इसलिए उन्हें नियमित प्रिंसिपल की नियुक्ति को चुनौती देने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि ट्रांसफर का यह आदेश निदेशक द्वारा पुराने कानून की धारा 13(4) के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए जारी किया गया था, जो पूरी तरह कानूनी है।
प्रतिवादी संख्या 6 के तर्क
कार्यवाहक प्रिंसिपल के वकील ने दलील दी कि पुराने कानून की धारा 12, 13 और 14 के तहत एक बार किसी उम्मीदवार को कॉलेज आवंटित होने के बाद उसका स्थान बदलने का कोई नियम नहीं है। अपीलकर्ता ने स्वेच्छा से बलिया कॉलेज में कार्यभार नहीं संभाला था। नए कानून के लागू होने के साथ ही पुरानी प्रतीक्षा सूची समाप्त हो चुकी है, इसलिए नए कानून के आने के बाद पुरानी सूची के आधार पर ट्रांसफर या नियुक्ति का आदेश जारी करना पूरी तरह से अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
राज्य सरकार का रुख
उत्तर प्रदेश सरकार ने इस मामले में अपीलकर्ता का समर्थन किया। राज्य के वकीलों का कहना था कि निदेशक का आदेश उनके अधिकार क्षेत्र में था। हालांकि, निदेशक द्वारा की गई जांच में यह बात पहले ही सामने आ चुकी थी कि डॉ. रावत ने बलिया कॉलेज के प्रबंधन से खुद संपर्क नहीं किया था, फिर भी राज्य सरकार ने हलफनामा दायर कर अधिकारियों के फैसले का बचाव करने की कोशिश की।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने पुराने और नए दोनों कानूनों के प्रावधानों का बारीकी से विश्लेषण किया और स्थानांतरण की इस प्रक्रिया को अवैध करार दिया।
धारा 13(4) और “अन्यथा” शब्द की व्याख्या
पुराने कानून की धारा 13(4) के तहत, यदि सूची की वैधता अवधि के दौरान “मृत्यु, इस्तीफे या अन्यथा” के कारण कोई पद खाली होता है, तो ही निदेशक प्रतीक्षा सूची से किसी नाम की सिफारिश कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि डॉ. रावत द्वारा आवंटित कॉलेज में ज्वाइन न करना और मेरठ कॉलेज में रिक्ति का इंतजार करना इस धारा के तहत नहीं आता। कोर्ट ने कमलेश कुमार शर्मा बनाम योगेश कुमार गुप्ता एवं अन्य (1998) 3 SCC 45 मामले के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि “अन्यथा” शब्द का मतलब केवल आकस्मिक या अप्रत्याशित रिक्तियों से है। इसका अर्थ यह नहीं निकाला जा सकता कि उम्मीदवार अपनी पसंद के अनुसार पोस्टिंग के लिए ट्रांसफर की मांग करने लगें:
“इसलिए, 03.08.2022 की सिफारिश के बाद, यदि अपीलकर्ता अपनी पारिवारिक परिस्थितियों के कारण ज्वाइन करने के लिए तैयार नहीं थे और मेरठ कॉलेज में रिक्ति होने पर, अधिकारियों को पुराने कानून की धारा 13(4) के तहत अपना मामला फिट करने के लिए मजबूर करने के इरादे से प्रतिवेदन प्रस्तुत किया, तो ऐसी कार्रवाई पिछली सिफारिश को दरकिनार कर देगी और धारा 13(3) के उद्देश्य को विफल कर देगी।”
नए कानून के लागू होने का प्रभाव
अदालत ने कहा कि नए कानून की धारा 31 और उत्तर प्रदेश सामान्य भाषा खंड अधिनियम, 1904 की धारा 6 के तहत पुराने कानून के निरस्त होने के बाद पुरानी प्रतीक्षा सूची जीवित नहीं रह सकती थी:
“…नए अधिनियम के प्रारंभ होने के बाद, पुराने अधिनियम के तहत सूची/पैनल की वैधता स्वतः ही समाप्त हो जाएगी और संबंधित प्राधिकारी नए अधिनियम की धारा 10 और 11 के तहत प्रिंसिपल के पद पर नियुक्ति के लिए कदम उठाने के लिए बाध्य हैं।”
यूपी सरकार के अधिकारियों के आचरण पर सुप्रीम कोर्ट की फटकार
इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारियों के आचरण को लेकर बेहद तल्ख टिप्पणियां कीं। कोर्ट ने उन अधिकारियों के रवैये की कड़े शब्दों में निंदा की, जिन्होंने एक निजी पक्ष को लाभ पहुंचाने के लिए कानून के विपरीत जाकर हलफनामे दायर किए।
राज्य का मुकदमेबाजी कर्तव्य: पक्षपात रहित और तटस्थ रवैया
निर्णय के पैरा 26 के तहत, सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि सरकारी अधिकारियों का कोर्ट के प्रति क्या कर्तव्य है। कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों से निष्पक्षता और कानून के अनुपालन की उम्मीद की जाती है:
“यह ध्यान रखना आवश्यक है कि कोर्ट के समक्ष अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करते समय और बहस करते समय राज्य और उसके अधिकारियों का कर्तव्य वास्तविक सहायता प्रदान करना है। ऐसी सहायता तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए और मामले में लागू होने वाले कानून को सही तरीके से लागू करके दी जानी चाहिए। अधिकारियों से यह उम्मीद नहीं की जाती है कि वे कानून के विपरीत जाकर किसी भी पक्ष का समर्थन करें या ऐसा हलफनामा दाखिल करें जो कानून के अनुरूप तथ्यों को प्रकट नहीं करता हो।”
अदालत ने अधिकारियों के विरोधाभासी रवैये को रेखांकित किया, जिसमें नया कानून लागू होने के ठीक चार दिन पहले निदेशक ने माना था कि ट्रांसफर का कोई नियम नहीं है, लेकिन कानून निरस्त होने के बाद उन्होंने उसी अवैध ट्रांसफर को सही ठहराने के लिए पैरवी शुरू कर दी:
“जैसा कि ऊपर विश्लेषण किया गया है, यह स्पष्ट है कि 21.08.2023 को नए अधिनियम के लागू होने के बाद, अधिकारियों के लिए पुराने अधिनियम के तहत तैयार की गई सूची के अनुसार कार्य करना संभव नहीं था, विशेष रूप से तब जब नए अधिनियम के लागू होने से ठीक चार दिन पहले उन्होंने अपीलकर्ता (जो कि एक प्रतीक्षा सूची का उम्मीदवार था) को नियुक्ति न देने की अपनी मंशा व्यक्त की थी। इसके बाद, निदेशक के पास पुरानी सूची को पुनर्जीवित करने और 13.12.2023 को अपीलकर्ता के पक्ष में लिखने का कोई आधार नहीं था।”
मुख्य सचिव को जांच के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रशासनिक विफलता और कानून के उल्लंघन पर कड़ा रुख अपनाते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को दोषी अधिकारियों के आचरण की जांच करने का निर्देश दिया:
“यह कहना पर्याप्त होगा कि उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव उन अधिकारियों के आचरण की जांच कर सकते हैं जिन्होंने हाईकोर्ट और इस कोर्ट के समक्ष भी कानून के विपरीत ऐसा रुख अपनाते हुए हलफनामा दायर किया है, जो कानून के तहत पूरी तरह से अस्वीकार्य है और हाईकोर्ट के निष्कर्षों के विपरीत है।”
चूंकि संबंधित अधिकारी व्यक्तिगत रूप से इस मामले में पक्षकार नहीं थे, इसलिए कोर्ट ने सीधे तौर पर कोई दंडात्मक आदेश जारी नहीं किया, लेकिन राज्य सरकार को उचित अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया:
“चूंकि संबंधित अधिकारी इस मामले में पक्षकार नहीं हैं, इसलिए हम कोई प्रतिकूल निर्देश जारी नहीं कर रहे हैं, हालांकि, हम उत्तर प्रदेश राज्य के लिए यह विकल्प खुला छोड़ते हैं कि वह उपरोक्त टिप्पणियों पर विचार करे और कानून के अनुसार आवश्यक कदम उठाए।”
अधिकार क्षेत्र (Locus Standi) का मुद्दा
डॉ. रावत द्वारा कार्यवाहक प्रिंसिपल के याचिका दायर करने के अधिकार पर उठाए गए सवालों के जवाब में कोर्ट ने आनंद शरदचंद्र ओका बनाम मुंबई विश्वविद्यालय और अयाउबखान नूरखान पठान बनाम महाराष्ट्र राज्य मामलों का संदर्भ देते हुए कहा:
“…जब अधिकारियों की अवैधता पूरी तरह से स्पष्ट है और किया गया कार्य पूरी तरह से गैर-कानूनी था, तो इस मामले के तथ्यों में locus standi का मुद्दा बहुत महत्वपूर्ण नहीं रह जाता है। इसलिए, हम इस मुद्दे को किसी उपयुक्त मामले में तय करने के लिए खुला छोड़ते हैं।”
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की एकल पीठ और डिवीजन बेंच दोनों के निर्णय पूरी तरह सही थे। अपीलकर्ता के तर्क पुराने और नए दोनों कानूनों की मूल भावना के विपरीत थे, जिसके चलते कोर्ट ने डॉ. रावत की अपील को खारिज कर दिया। सभी पक्षों को अपनी मुकदमेबाजी का खर्च स्वयं वहन करने का निर्देश दिया गया है।
केस विवरण
- केस का शीर्षक: डॉ. मनोज कुमार रावत बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य
- केस नंबर: स्पेशल लीव पिटीशन (सिविल) नंबर 15989 / 2025
- पीठ: जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर
- दिनांक: 19 मई, 2026

