KG Basin Gas Dispute: “यह सीधे-सीधे गैस की चोरी है…” सुप्रीम कोर्ट में रिलायंस के खिलाफ केंद्र सरकार आक्रामक, जानें क्या है पूरा विवाद

आंध्र प्रदेश तट के पास कृष्णा गोदावरी (KG) बेसिन में गैस रिसाव (माइग्रेशन) को लेकर केंद्र सरकार और रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) के नेतृत्व वाले कंसोर्टियम के बीच चल रहा बहु-अरबी कानूनी विवाद अब अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई एक बेहद तीखी सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने रिलायंस पर कड़ा रुख अपनाते हुए सीधे तौर पर सरकारी कंपनी ओएनजीसी (ONGC) के हिस्से की प्राकृतिक गैस चोरी करने का आरोप लगाया।

यह मामला सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की तीन सदस्यीय पीठ के सामने सुनवाई के लिए आया था। अदालत रिलायंस द्वारा दायर उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें दिल्ली हाई कोर्ट के 14 फरवरी, 2025 के फैसले को चुनौती दी गई है। दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने उस फैसले में रिलायंस के पक्ष में आए मध्यस्थता (arbitration) के फैसले को खारिज कर दिया था।

“यह तो सीधे-सीधे चोरी है” — अटॉर्नी जनरल की तीखी दलील

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए देश के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत के सामने बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा:

“वहां दो अलग-अलग ब्लॉक थे। एक ब्लॉक ONGC का था और दूसरा रिलायंस का। प्राकृतिक प्रक्रिया के तहत गैस का रिसाव हुआ और वह दूसरे ब्लॉक में चली गई। आपने (रिलायंस कंसोर्टियम) वास्तव में हमारी गैस की चोरी की है और इसके लिए आपकी कानूनी जवाबदेही तय होनी ही चाहिए।”

रिलायंस का बचाव: “यह प्राकृतिक प्रक्रिया है, कोई साजिश नहीं”

रिलायंस की ओर से पक्ष रख रहे देश के जाने-माने वरिष्ठ वकील ए. एम. सिंघवी ने सरकार के इन आरोपों का कड़ा विरोध किया। सिंघवी ने दलील दी कि गहरे समुद्र में गैस और तेल की खोज करना बेहद जोखिम भरा काम है और इसमें बहुत भारी निवेश की जरूरत होती है। उन्होंने सरकारी कंपनी पर निशाना साधते हुए कहा कि जब ओएनजीसी को ये ब्लॉक आवंटित किए गए थे, तब उन्होंने लंबे समय तक वहां कोई ठोस काम नहीं किया था।

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गैस रिसाव को पूरी तरह से प्राकृतिक बताते हुए सिंघवी ने अदालत को समझाया:

“जब आप समुद्र तल से 2,000 फीट नीचे दबाव (pressure difference) की प्राकृतिक प्रक्रिया के जरिए गैस या तेल निकालते हैं, तो पास के ब्लॉक से कुछ मात्रा बहकर आपके ब्लॉक की तरफ जरूर आएगी। इसका किसी की मंशा, योजना या जानबूझकर की गई कोशिश से कोई लेना-देना नहीं है। यह केवल दबाव के कारण होने वाली एक प्राकृतिक हलचल है, जिसे जबरन ‘चोरी’ का नाम दिया जा रहा है।”

जब जस्टिस बागची ने पूछा कि क्या दोनों कंपनियों के ब्लॉकों के बीच कोई कृत्रिम दीवार या अवरोध नहीं था, तो सिंघवी ने स्पष्ट किया कि समुद्र के इतनी गहराई में ऐसी कोई दीवार बनाना व्यावहारिक रूप से नामुमकिन है। वहां केवल अक्षांश और देशांतर (coordinates) के जरिए ही कागजी सीमाएं तय की जा सकती हैं। सिंघवी ने यह भी तर्क दिया कि गैस चाहे जिस ब्लॉक से भी निकले, सरकार को रॉयल्टी और टैक्स के रूप में उसका पूरा फायदा मिलता ही है।

दो दशकों से जारी है गहरे समुद्र की यह जंग

इस विवाद की जड़ें साल 2000 में जाती हैं, जब रिलायंस के नेतृत्व वाले कंसोर्टियम—जिसमें रिलायंस (60% हिस्सेदारी), बीपी पीएलसी (30%) और निको रिसोर्सेज (10%) शामिल थे—ने केंद्र सरकार के साथ गहरे समुद्र में गैस की खोज और उत्पादन के लिए एक प्रोडक्शन-शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट (PSC) पर हस्ताक्षर किए थे।

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कंसोर्टियम ने अप्रैल 2009 में ओएनजीसी के गोदावरी पेट्रोलियम लीज ब्लॉक के ठीक पास स्थित अपने KG-D6 ब्लॉक से गैस का व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया था।

विवाद साल 2013 में तब भड़का जब ONGC ने आरोप लगाया कि रिलायंस ने जानबूझकर अपनी सीमाओं के बेहद करीब कुएं खोदे हैं। ONGC का दावा था कि इसके कारण 2009 से 2013 के बीच उसके ब्लॉक की गैस रिलायंस के कुओं में चली गई, जिससे रिलायंस ने “अनुचित वित्तीय लाभ” (unjust enrichment) कमाया।

इसके बाद सरकार ने रिलायंस और उसके सहयोगियों पर करीब 1.5 अरब डॉलर की वसूली (disgorgement) का दावा ठोक दिया, जिस पर 17.4 करोड़ डॉलर का अतिरिक्त ब्याज भी लगाया गया। रिलायंस ने सरकार की इस मांग को मध्यस्थता मंच (arbitration) में चुनौती दी।

कानूनी दांव-पेंच का पूरा सफरनामा

इस हाई-प्रोफाइल विवाद ने पिछले कुछ सालों में कई बड़े कानूनी मोड़ देखे हैं:

  • जुलाई 2018: एक अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायाधिकरण (arbitral tribunal) ने रिलायंस के पक्ष में फैसला सुनाया। न्यायाधिकरण ने कहा कि अनुबंध के तहत रिलायंस पर ऐसी गैस बेचने पर कोई पाबंदी नहीं है जो प्राकृतिक रूप से बहकर उसके ब्लॉक में आ गई हो।
  • मई 2024: दिल्ली हाई कोर्ट की एकल-न्यायाधीश पीठ ने मध्यस्थता के फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार की याचिका को खारिज कर दिया।
  • 14 फरवरी, 2025: दिल्ली हाई कोर्ट की खंडपीठ ने इस मामले को पूरी तरह पलट दिया। अदालत ने पुराने दोनों फैसलों को रद्द करते हुए इन्हें कानून के स्थापित सिद्धांतों के खिलाफ बताया।
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दिल्ली हाई कोर्ट के इसी फैसले के बाद केंद्र सरकार के अरबों डॉलर के दावे एक बार फिर जिंदा हो गए हैं। अब सुप्रीम कोर्ट में चल रही इस अंतिम सुनवाई से ही यह तय होगा कि समुद्र के नीचे बहने वाली इस बहुमूल्य गैस का असली मालिक कौन है।

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