बर्खास्तगी के 4 साल बाद जागा बैंक तो हाई कोर्ट ने लगाई फटकार, ₹18.48 लाख की ग्रेच्युटी ब्याज समेत चुकाने का आदेश

कलकत्ता हाई कोर्ट ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को सर्वोपरि रखते हुए सार्वजनिक क्षेत्र के यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (Union Bank of India) को एक बड़ा झटका दिया है। अदालत ने कथित ऋण अनियमितताओं के आरोप में सेवा से बर्खास्त किए गए एक पूर्व मुख्य प्रबंधक की ₹18.48 लाख की ग्रेच्युटी को रोकने की बैंक की याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया है।

न्यायाधीश शम्पा दत्त पाल ने आदेश दिया कि बैंक द्वारा अपीलीय प्राधिकारी के पास जमा कराई गई ग्रेच्युटी की राशि को संचित ब्याज के साथ 30 दिनों के भीतर पूर्व कर्मचारी को जारी किया जाए। अदालत ने बैंक की कार्यप्रणाली पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि बर्खास्तगी के चार साल बाद अचानक वित्तीय नुकसान की बात कहकर ग्रेच्युटी जब्त करने की कोशिश करना कानूनन ‘देर से सूझा विचार’ (Afterthought) और ‘कानूनी प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग’ है।

यह पूरा मामला बैंक के एक पूर्व मुख्य प्रबंधक से जुड़ा है, जिन्होंने अगस्त 1987 में यूनियन बैंक ऑफ इंडिया में अपनी सेवाएं शुरू की थीं। अपनी सेवा के दौरान जब वे आगरा विकास प्राधिकरण शाखा में तैनात थे, तब उन पर नियमों की अनदेखी कर लगभग 280 ऋण (लोन) स्वीकृत करने का आरोप लगा, जिनकी कुल राशि ₹61.51 करोड़ थी।

इन आरोपों के बाद:

  • 1 मार्च 2018: बैंक ने उन्हें चार्जशीट थमाई।
  • 22 जनवरी 2019: विभागीय जांच के बाद उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
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बर्खास्तगी के खिलाफ उनकी विभागीय अपील भी खारिज हो गई, लेकिन उस वक्त बैंक ने न तो कर्मचारी की ग्रेच्युटी का भुगतान किया और न ही उसे जब्त करने के लिए कोई कानूनी प्रक्रिया शुरू की। मामला तब गरमाया जब कर्मचारी ने अपने कानूनी हक के लिए कदम उठाया।

विवाद का घटनाक्रम और उसकी समयसीमा दर्शाती है कि बैंक ने इस मामले में कितनी देरी की:

  • अप्रैल 2022: बर्खास्त कर्मचारी ने ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम के तहत ‘फॉर्म-एन’ भरकर अपने पैसों का दावा किया। इसके बाद बैंक को पहली बार कंट्रोलिंग अथॉरिटी से नोटिस मिला।
  • 21 नवंबर 2022: नोटिस मिलने के बाद हरकत में आते हुए बैंक ने बर्खास्तगी के लगभग चार साल बाद पहली बार ग्रेच्युटी जब्त करने का प्रस्ताव दिया और कथित वित्तीय नुकसान की गणना पेश की।
  • फरवरी 2023: बैंक ने औपचारिक तौर पर कर्मचारी को सूचित किया कि उसकी ग्रेच्युटी जब्त कर ली गई है।
  • 13 जून 2023: कंट्रोलिंग अथॉरिटी ने बैंक के इस कदम को खारिज करते हुए बैंक को ₹18.48 लाख की राशि ब्याज सहित चुकाने का आदेश दिया।
  • 27 मार्च 2024: अपीलीय प्राधिकारी ने भी बैंक की अपील खारिज कर दी। इस अपील प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए बैंक ने अथॉरिटी के पास ₹26.87 लाख जमा कराए थे। इसके बाद यूनियन बैंक ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
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सुनवाई के दौरान कलकत्ता हाई कोर्ट ने बैंक की जांच प्रक्रिया में पाई गई खामियों पर गहरी नाराजगी जताई। अदालत ने पाया कि न तो शुरुआती कारण बताओ नोटिस (Show-cause notice), न चार्जशीट, न ही अंतिम बर्खास्तगी आदेश में बैंक ने कर्मचारी द्वारा पहुंचाए गए किसी विशिष्ट वित्तीय नुकसान की राशि का निर्धारण (Quantification) किया था। कानून के मुताबिक, ग्रेच्युटी रोकने के लिए जांच के दौरान ही नुकसान की सटीक राशि तय करना अनिवार्य है।

न्यायाधीश शम्पा दत्त पाल ने बैंक की 400 पन्नों की लंबी जांच रिपोर्ट पर टिप्पणी करते हुए कहा:

“भले ही याचिकाकर्ता (बैंक) द्वारा पेश की गई जांच रिपोर्ट 400 पन्नों की है, लेकिन यह कर्मचारी के खिलाफ गुणवत्ता से ज्यादा केवल पन्नों की संख्या (मात्रा) को दर्शाती है।”

अदालत ने आगे स्पष्ट किया कि बर्खास्तगी के चार साल बाद अचानक नुकसान की बात उठाना यह साफ करता है कि बैंक की यह कार्रवाई महज एक ‘आफ्टरथॉट’ थी, जिसका मकसद केवल कर्मचारी को उसके हक से वंचित रखना था।

यूनियन बैंक की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता रंजय दे ने दलील दी कि बैंक के ग्रैच्युटी फंड नियम उसे वित्तीय नुकसान की सीमा तक ग्रैच्युटी जब्त करने की अनुमति देते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि बैंक को हुआ वास्तविक नुकसान कर्मचारी की ₹18.48 लाख की ग्रैच्युटी की तुलना में बहुत अधिक था, इसलिए जांच के समय नुकसान की सटीक गणना न होना मायने नहीं रखता।

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दूसरी तरफ, कर्मचारी का पक्ष रख रहे अधिवक्ता प्रतीक मजूमदार ने कोर्ट को बताया कि उनके मुवक्किल को कभी भी किसी विशिष्ट वित्तीय नुकसान के आरोपों का जवाब देने का अवसर (Fair Opportunity) ही नहीं दिया गया। बैंक वर्षों तक इस मामले पर चुप बैठा रहा और जैसे ही कर्मचारी ने अपना हक मांगा, बैंक ने मनमाने तरीके से जब्ती की कार्यवाही शुरू कर दी।

इस कानूनी टकराव पर अंतिम फैसला सुनाते हुए कलकत्ता हाई कोर्ट ने साफ कर दिया कि देश के वैधानिक कानून हमेशा किसी संस्थान की आंतरिक नीतियों से ऊपर होते हैं। कोर्ट ने कहा कि यूनियन बैंक यह दावा नहीं कर सकता कि उसके आंतरिक नियम ‘ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम’ (Payment of Gratuity Act) पर हावी होंगे। उचित और कानूनी प्रक्रिया का पालन न करने के कारण, हाई कोर्ट ने बैंक की याचिका को खारिज कर दिया और कर्मचारी को तत्काल राहत देने का निर्देश दिया।

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