वैवाहिक विवादों में महिलाओं की वित्तीय सुरक्षा को लेकर झारखंड हाईकोर्ट ने एक बेहद अहम और संवेदनशील फैसला सुनाया है। अदालत ने एक तलाकशुदा महिला के एकमुश्त स्थायी गुजारे भत्ते (Permanent Alimony) को 40 लाख रुपये से बढ़ाकर सीधे 70 लाख रुपये कर दिया है।
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि गुजारा भत्ते का असल उद्देश्य पत्नी को ‘सम्मानजनक जीवन’ (Reasonable Comfort) देना है। कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि शादी टूटने के बाद किसी भी महिला को ‘वित्तीय लाचारी’ या बेबसी के दलदल में धकेला नहीं जा सकता।
यह फैसला 12 मई को दोनों पक्षों की ओर से दायर अपीलों पर सुनवाई के बाद आया। इससे पहले, अगस्त 2024 में एक फैमिली कोर्ट ने दंपति की शादी को भंग करते हुए पत्नी के लिए 40 लाख रुपये का गुजारा भत्ता तय किया था, जिसे दोनों पक्षों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। पति (जो एक सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर है) का मानना था कि यह रकम बहुत ज्यादा है, जबकि पत्नी का कहना था कि यह उसकी आजीविका के लिए नाकाफी है।
माता-पिता के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता: हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इस बात पर विशेष जोर दिया कि 70 लाख रुपये की एकमुश्त राशि पत्नी के भरण-पोषण के लिए पूरी तरह ‘न्यायसंगत, निष्पक्ष और उचित’ है, क्योंकि उसके पास आय का कोई स्वतंत्र जरिया नहीं है।
अदालत ने उन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि महिला अपने मायके या माता-पिता के सहारे रह सकती है। पीठ ने टिप्पणी की, “इस धारणा पर गुजारा भत्ता देने से इनकार करना या उसे कम करना कि महिला के माता-पिता उसका समर्थन कर सकते हैं, कानून के मूल उद्देश्य को ही खत्म कर देता है।” कोर्ट ने कहा कि एक बेसहारा पत्नी को स्वतंत्र रूप से रहने और रोजमर्रा के खर्चे पूरे करने के लिए पर्याप्त वित्तीय सुरक्षा मिलना उसका कानूनी अधिकार है।
कैसे तय हुई 70 लाख रुपये की रकम?
अदालत ने गुजारा भत्ते की राशि तय करने के लिए एक बेहद व्यावहारिक और भविष्यवादी दृष्टिकोण अपनाया।
- उम्र और जीवन प्रत्याशा का आकलन: कोर्ट ने नोट किया कि महिला की वर्तमान आयु 32 वर्ष है। भारत में महिलाओं की औसत जीवन प्रत्याशा लगभग 70 वर्ष मानते हुए, अदालत ने अगले 38 वर्षों के लिए उसकी वित्तीय जरूरतों का आकलन किया।
- महंगाई और जीवन स्तर: चूंकि महिला को इसी पूंजी और इस पर मिलने वाले ब्याज के भरोसे अपना पूरा जीवन काटना है, इसलिए कोर्ट ने कहा कि यह रकम इतनी होनी चाहिए जो उसे भविष्य की महंगाई (Inflation) से बचा सके और उसे वही जीवन स्तर दे सके जिसकी वह अपने ससुराल में आदी थी।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि गुजारा भत्ता तय करने का कोई तय गणितीय फॉर्मूला नहीं हो सकता, लेकिन अदालतों को इन बातों का ध्यान रखना चाहिए:
- दोनों पक्षों का सामाजिक स्तर और उनकी जरूरतें।
- पति की वित्तीय क्षमता और उसके ऊपर अन्य जिम्मेदारियां।
- दोनों पक्षों की शैक्षणिक और व्यावसायिक पृष्ठभूमि।
अदालत ने कहा कि अगर कोई पति अपनी वास्तविक आय छुपाता है या बेरोजगार होने का नाटक करता है, तो कोर्ट को उसके रहन-सहन, बैंक लेनदेन और शैक्षणिक योग्यता के आधार पर उसकी वास्तविक आय का निष्पक्ष आकलन करना चाहिए।
हाईकोर्ट ने पति को आदेश दिया है कि वह इस 70 लाख रुपये की राशि का भुगतान 12 महीनों के भीतर चार किस्तों में करे, जिसकी पहली किस्त दो महीने के भीतर देनी होगी।
पुणे से शुरू हुआ था विवाद, लगे गंभीर आरोप
इस कानूनी लड़ाई की जड़ें नवंबर 2019 में हुई एक शादी से जुड़ी हैं, जो हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न हुई थी। शादी के कुछ ही दिनों बाद यह जोड़ा पुणे शिफ्ट हो गया, जहां पति एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में कार्यरत था। हालांकि, जल्द ही दोनों के बीच कड़वाहट आ गई।
- पति के आरोप: पति का दावा था कि जनवरी 2020 से ही उसकी पत्नी का व्यवहार बदल गया। उसने अपने सहकर्मियों के साथ पति के अवैध संबंधों के झूठे आरोप लगाए। पति ने यह भी आरोप लगाया कि उसकी पत्नी और सास ने उसे दहेज और यौन उत्पीड़न के झूठे मामलों में फंसाने की धमकी दी, जिससे वह गहरे मानसिक तनाव और डिप्रेशन में चला गया और उसे घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा।
- पत्नी के आरोप: दूसरी ओर, पत्नी ने बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया कि पुणे जाने के बाद उसे पता चला कि उसके पति के एक अन्य विवाहित महिला के साथ संबंध थे। उसने यह भी आरोप लगाया कि पति ने उस पर कुछ अनुचित रिश्ते बनाने का दबाव डाला और उसे जान से मारने की भी कोशिश की, जिससे वह गंभीर अवसाद और मानसिक प्रताड़ना का शिकार हो गई।
इन विवादों के बाद पति ने साल 2023 में क्रूरता के आधार पर तलाक की याचिका दायर की थी, जिस पर फैसला सुनाते हुए फैमिली कोर्ट ने 2024 में तलाक की डिक्री मंजूर की थी।
अदालत में वकीलों की दलीलें
सुनवाई के दौरान पत्नी की ओर से पेश अधिवक्ता सुमीर प्रसाद ने दलील दी कि फैमिली कोर्ट द्वारा तय की गई 40 लाख रुपये की राशि बेहद कम थी। उन्होंने बताया कि पत्नी की उम्र करीब 33-34 वर्ष हो चुकी है, वह बेरोजगार है, उसके पिता का निधन हो चुका है और वह अपनी विधवा मां के साथ बेहद तंगहाली में जीवन यापन कर रही है। उन्होंने कोर्ट को यह भी बताया कि पति ने दूसरी शादी कर ली है और ट्रायल कोर्ट के आदेश के बाद से अब तक कोई गुजारा भत्ता नहीं दिया है।
वहीं, पति के वकील रंजन कुमार सिंह ने दलील दी कि 40 लाख रुपये की राशि भी बहुत अधिक थी। उन्होंने कोर्ट के सामने पक्ष रखा कि पति की मासिक आय 2.24 लाख रुपये है, वह पुणे में किराए के मकान में रहता है, वहां रहने का खर्च बहुत ज्यादा है और उसके ऊपर अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल की भी जिम्मेदारी है, जिसके कारण वह अधिक बचत करने की स्थिति में नहीं है।
सभी पक्षों को सुनने के बाद, झारखंड हाईकोर्ट ने पति की स्थिर और बेहतर आय को ध्यान में रखते हुए बढ़ी हुई एलिमनी को सही ठहराया और पत्नी के गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार को सर्वोपरि माना।

