असम में नागरिकता निर्धारण से जुड़े मामलों में एक बड़ा कानूनी घटनाक्रम सामने आया है। गौहाटी हाई कोर्ट ने एक महिला को ‘विदेशी’ घोषित करने वाले 16 साल पुराने एकतरफा (ex-parte) आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने महिला को अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने का एक और अंतिम अवसर प्रदान किया है। न्यायालय ने रेखांकित किया कि अपनी वंशावली और विरासत को साबित करने का अधिकार बेहद बुनियादी और महत्वपूर्ण है। अदालत के अनुसार, भले ही कानूनी कदम उठाने में याचिकाकर्ता की ओर से बड़ी देरी हुई हो, लेकिन चूंकि उसके दादा साल 1956 से भारत के पंजीकृत नागरिक रहे हैं, इसलिए महिला को अपनी नागरिकता साबित करने का मौका मिलना ही चाहिए।
यह आदेश न्यायमूर्ति कल्याण राय सुराणा और न्यायमूर्ति शमीमा जहां की खंडपीठ ने निवा सुक्लाबैद्य नामक महिला द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई के बाद जारी किया। याचिकाकर्ता ने फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल (विदेशी न्यायाधिकरण) के 12 मई, 2010 के उस एकतरफा फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें 25 मार्च, 1971 के बाद की धारा के तहत एक ‘विदेशी’ घोषित कर दिया गया था।
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता निवा सुक्लाबैद्य का दावा है कि वह दिवंगत मीरा सुक्लाबैद्य की बेटी हैं, जो खुद दिवंगत उमेशराम सुक्लाबैद्य के पुत्र थे। याचिका में दिए गए विवरण के अनुसार, उनके दादा उमेशराम सुक्लाबैद्य तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान से भारत आए थे और उन्हें 18 नवंबर, 1956 को आधिकारिक तौर पर भारत के नागरिक के रूप में पंजीकृत कर पंजीकरण प्रमाण पत्र जारी किया गया था। इसके अतिरिक्त, याचिकाकर्ता ने यह भी दलील दी कि साल 2017 में फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ने उनके सगे चाचा, बीरेन सुक्ला बैद्य को भी “विदेशी नहीं” (भारतीय नागरिक) घोषित किया था।
इतने मजबूत पारिवारिक दस्तावेजों के बावजूद, साल 2010 में निवा सुक्लाबैद्य को उनकी अनुपस्थिति में ‘विदेशी’ घोषित कर दिया गया था। इस स्थिति के लिए अपनी परिस्थितियों का हवाला देते हुए निवा ने कोर्ट को बताया कि वह एक अनपढ़ महिला हैं और जटिल कानूनी प्रक्रियाओं के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं थी। न्यायाधिकरण में गवाही और सबूत पेश करने की तारीखों पर वे खुद तो शारीरिक रूप से मौजूद थीं, लेकिन उनके वकील कोर्ट में हाजिर नहीं हुए। इस वजह से जांच अधिकारी सहित किसी भी सरकारी गवाह से उनकी तरफ से जिरह (cross-examination) नहीं की जा सकी।
निवा ने यह भी स्पष्ट किया कि उन्होंने अपने तत्कालीन वकील को अपने जोड़ों के गंभीर दर्द (rheumatic pain) की बीमारी के बारे में बताया था। वकील ने उन्हें आश्वासन दिया था कि वह मामले में जरूरी कानूनी कदम उठाएंगे, लेकिन अंततः कोई कदम नहीं उठाया गया और न्यायाधिकरण ने एकतरफा आदेश पारित कर उन्हें विदेशी घोषित कर दिया।
अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील एम. दत्ता ने दलील दी कि न्यायाधिकरण के समक्ष गवाहों से जिरह न हो पाने की मुख्य वजह पूर्व वकील की अनुपस्थिति थी। इसके साथ ही याचिकाकर्ता की बीमारी और उनकी अशिक्षा ने भी परिस्थितियों को अधिक जटिल बना दिया, जिसके चलते उनका पक्ष मजबूती से नहीं रखा जा सका।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार के वकील ए. के. दत्ता ने याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने अदालत के समक्ष दलील दी कि याचिका दायर करने में अत्यधिक और बिना किसी ठोस कारण के देरी की गई है। न्यायाधिकरण ने अपना एकतरफा फैसला 12 मई, 2010 को सुनाया था, जबकि इसके खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका 1 अक्टूबर, 2019 को दायर की गई—यानी पूरे 9 साल और 4 महीने की लंबी देरी। केंद्र सरकार के वकील ने तर्क दिया कि लगभग एक दशक तक विदेशी होने के अपने दर्जे को बिना किसी कानूनी चुनौती के स्वीकार कर लेने के बाद, याचिकाकर्ता अदालत से किसी भी तरह की विवेकाधीन राहत पाने की हकदार नहीं रह जाती हैं।
हाई कोर्ट का विश्लेषण और अहम टिप्पणी
गौहाटी हाई कोर्ट ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए कानूनी देरी और नागरिकता के दावों के बीच एक मानवीय संतुलन बनाने का प्रयास किया। अदालत ने माना कि यदि किसी व्यक्ति के सीधे पूर्वजों के पास वैध भारतीय नागरिकता के आधिकारिक रिकॉर्ड हैं, तो उस दावे को महज तकनीकी देरी के आधार पर पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।
याचिकाकर्ता के दावे में दम देखते हुए खंडपीठ ने टिप्पणी की:
“इस मामले में, याचिकाकर्ता का यह प्रदर्शित करना है कि उनके दादा भारत के एक पंजीकृत नागरिक थे और उनके चाचा को भी फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल द्वारा विदेशी नहीं माना गया था। ऐसी परिस्थितियों में, अदालत का यह सुविचारित मत है कि याचिकाकर्ता को अपना दावा साबित करने का एक अवसर जरूर दिया जाना चाहिए।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हालांकि देश के कानून के मुताबिक नागरिकता साबित करने का अंतिम भार (burden of proof) याचिकाकर्ता पर ही रहेगा, लेकिन इसके लिए उन्हें न्यायाधिकरण के समक्ष अपनी बात रखने का उचित और निष्पक्ष मंच मिलना अनिवार्य है।
क्या रहा अदालत का अंतिम निर्णय?
हाई कोर्ट ने इस मामले को दोबारा फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के पास भेज दिया है (Remand back) ताकि वहां नए सिरे से इस पर फैसला लिया जा सके। इसके तहत याचिकाकर्ता को अपना पक्ष साबित करने का सिर्फ एक मौका दिया जाएगा।
हालांकि, हाई कोर्ट ने इस राहत को बेहद सख्त और सशर्त रखा है। एकतरफा आदेश को रद्द करने का यह फैसला तभी प्रभावी होगा जब याचिकाकर्ता इस आदेश की तारीख से ठीक 30 दिनों के भीतर न्यायाधिकरण के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होंगी।
न्यायालय ने समय-सीमा का उल्लंघन करने के परिणामों को स्पष्ट करते हुए कहा:
- यदि याचिकाकर्ता 30 दिनों के भीतर न्यायाधिकरण के सामने पेश होने में विफल रहती हैं, तो हाई कोर्ट का यह राहत संबंधी आदेश 31वें दिन स्वतः ही निरस्त मान लिया जाएगा।
- निर्धारित समय-सीमा बीत जाने की स्थिति में, पुराना एकतरफा आदेश (साल 2010 का फैसला) तत्काल प्रभाव से दोबारा लागू और बहाल हो जाएगा और उन्हें पुनः विदेशी माना जाएगा।

