‘दुख से उबरने में वक्त लगता है’: उपभोक्ता अदालत ने SBI को दिया विधवा को ₹5 लाख का बीमा क्लेम देने का आदेश, 6 साल की देरी को माना जायज

उपभोक्ता अधिकारों के हित में एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए एक उपभोक्ता अदालत ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) को निर्देश दिया है कि वह एक विधवा को उसके पति की मृत्यु के छह साल बाद किए गए दावे के बदले ₹5 लाख का दुर्घटना बीमा क्लेम प्रदान करे।

महाराष्ट्र के नागपुर स्थित जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (अतिरिक्त डीसीएफ) ने पिछले महीने दिए अपने फैसले में देश के सबसे बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक की उस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें देरी का हवाला देकर क्लेम देने से मना किया गया था। आयोग ने बेहद मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए कहा कि अचानक जीवनसाथी को खोने के बाद व्यक्ति का गहरे “मानसिक सदमे” में जाना स्वाभाविक है और इस असहनीय दुख से उबरने में समय लगता है।

एक अचानक आया तूफान और जिंदगी को समेटने की लंबी जद्दोजहद

यह पूरा मामला सितंबर 2013 का है। नागपुर के ट्राई जंक्शन कैंटोनमेंट एरिया स्थित एसबीआई शाखा में खाता रखने वाले एक व्यक्ति की सड़क दुर्घटना में दर्दनाक मौत हो गई थी।

अचानक आए इस वज्रपात ने उनकी पत्नी को पूरी तरह तोड़ दिया। सदमे के कारण उन्हें मानसिक रूप से उबरने और अपनी बिखरी जिंदगी को दोबारा पटरी पर लाने में कई साल लग गए। इस लंबे संघर्ष के बाद, उन्हें अचानक पता चला कि उनके दिवंगत पति के डेबिट कार्ड पर ₹5 लाख का मानार्थ (कॉम्प्लीमेंट्री) दुर्घटना मृत्यु बीमा कवर उपलब्ध था।

बीमा पॉलिसी की जानकारी मिलते ही वह 26 मार्च 2019 को दावा पेश करने बैंक पहुंचीं। महिला ने सभी आवश्यक दस्तावेज भी जमा कर दिए, लेकिन एसबीआई ने उनके आवेदन को बिना किसी फैसले के अनिश्चितकाल के लिए लंबित रखा। बैंक के इस रवैये से परेशान होकर आखिरकार उन्होंने न्याय के लिए उपभोक्ता अदालत का दरवाजा खटखटाया।

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बैंक की दलील: तकनीकी नियम और बारीक अक्षरों का खेल

एसबीआई ने उपभोक्ता आयोग के समक्ष लिखित जवाब में महिला की शिकायत का विरोध करते हुए इसे “झूठा और निराधार” करार दिया।

बैंक ने मुख्य रूप से दो तकनीकी दलीलों के पीछे शरण ली:

  1. 90 दिनों की समय सीमा: बैंक ने तर्क दिया कि शिकायतकर्ता हादसे के बाद अनिवार्य 90 दिनों की तय अवधि के भीतर बीमा दावा प्रस्तुत करने में विफल रहीं।
  2. कार्ड की श्रेणी का बहाना: बैंक का दावा था कि मृतक के पास ‘मास्टरकार्ड क्लासिक’ डेबिट कार्ड था, जो इस तरह के बीमा कवर के दायरे में नहीं आता।
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इसके साथ ही बैंक ने यह भी तर्क दिया कि वह अपने कार्डधारकों को व्यक्तिगत रूप से बीमा सुरक्षा के नियमों या दस्तावेजों की जानकारी भेजने के लिए बाध्य नहीं है।

उपभोक्ता आयोग ने बैंक को फटकारा, कहा- ‘सेवा में गंभीर कमी’

आयोग ने अपने फैसले में एसबीआई के हर तर्क को खारिज करते हुए बैंक की इस कार्रवाई को “अन्यायपूर्ण” और “सेवा में गंभीर कमी” करार दिया।

दावा दायर करने में हुई छह साल की देरी पर टिप्पणी करते हुए आयोग ने कहा कि एक गहरे सदमे और दुख से जूझ रही विधवा से तुरंत कागजी कार्रवाई की उम्मीद करना पूरी तरह से अनुचित है। आयोग ने स्पष्ट किया कि चूंकि एसबीआई यह साबित करने में नाकाम रहा कि उसने कभी भी खाताधारक या उनके उत्तराधिकारियों को डेबिट कार्ड पर मिलने वाले इस बीमा लाभ की जानकारी दी थी, इसलिए वह 90 दिनों की समय सीमा के नियम का इस्तेमाल एक “ढाल” की तरह नहीं कर सकता।

आयोग ने टिप्पणी की, “अगर बैंक ने पहले ही ऐसी महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की होती, तो मृतक या उनके उत्तराधिकारी निश्चित रूप से समय पर उचित कदम उठाते।”

‘मास्टरकार्ड क्लासिक’ को बीमा के दायरे से बाहर रखने के बैंक के दावे पर भी अदालत ने कड़ा रुख अपनाया। दस्तावेजों की जांच के बाद आयोग ने पाया कि यद्यपि बैंक के रिकॉर्ड अन्य श्रेणियों के डेबिट कार्ड पर मुफ्त बीमा की बात करते हैं, लेकिन ‘मास्टरकार्ड क्लासिक’ को स्पष्ट रूप से इस सूची से बाहर रखने का कोई ठोस नियम या दस्तावेज बैंक पेश नहीं कर सका।

आयोग ने कहा, “समान परिस्थितियों में अलग-अलग ग्राहकों के साथ अलग-अलग व्यवहार करना पूरी तरह से अनुचित है और यह सेवा में कोताही को दर्शाता है।”

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कोर्ट का अंतिम फैसला

एसबीआई को जिम्मेदार ठहराते हुए उपभोक्ता आयोग ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  • बैंक पीड़िता को ₹5 लाख की पूरी बीमा राशि का भुगतान करे। इसके साथ ही शिकायत दर्ज होने की तारीख (5 सितंबर 2019) से इस राशि पर 6% वार्षिक ब्याज भी दिया जाए।
  • बैंक महिला को हुए मानसिक उत्पीड़न और अदालती खर्च के मुआवजे के तौर पर ₹10,000 की अतिरिक्त राशि का भुगतान करे।

गौरतलब है कि महिला ने मानसिक-शारीरिक प्रताड़ना के लिए ₹50,000 और कानूनी लड़ाई के खर्च के लिए ₹20,000 के मुआवजे की मांग की थी।

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