सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अधिवक्ताओं का यह दायित्व है कि वे अदालत के समक्ष सभी प्रासंगिक नज़ीरें रखें, चाहे वे उनके मुवक्किल के पक्ष में हों या उनके खिलाफ। साथ ही अदालतों का भी स्वतंत्र दायित्व है कि वे कानून में एकरूपता बनाए रखें और ऐसे निर्णयों से बचें, जो प्रासंगिक वैधानिक प्रावधानों या पूर्ववर्ती बाध्यकारी फैसलों पर विचार किए बिना दिए गए हों।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने यह टिप्पणी इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड द्वारा दायर अपील पर सुनवाई करते हुए की। मामला इस प्रश्न से जुड़ा था कि मोटर वाहन अधिनियम के तहत दिए जाने वाले मुआवजे से मेडिक्लेम के तहत प्राप्त राशि घटाई जा सकती है या नहीं।
पीठ ने कहा कि बार और बेंच दोनों की संयुक्त जिम्मेदारी है कि न्यायिक फैसलों में असंगति को कम किया जाए और न्याय व्यवस्था में निश्चितता बनी रहे।
अदालत ने कहा, “अदालत के प्रति यही दायित्व अधिवक्ताओं से यह अपेक्षा करता है कि वे अदालत के संज्ञान में वे फैसले भी लाएं जो उनके मामले के पक्ष में हों और वे भी जो उनके खिलाफ जाते हों।”
विभिन्न हाईकोर्टों के विरोधाभासी फैसलों पर चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश के विभिन्न हाईकोर्टों और कई मामलों में एक ही हाईकोर्ट की समन्वय पीठों ने इस मुद्दे पर परस्पर विरोधी फैसले दिए हैं कि मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) द्वारा दिए गए मुआवजे से मेडिक्लेम भुगतान घटाया जा सकता है या नहीं।
निर्णय में दिल्ली, बॉम्बे, केरल, पंजाब एवं हरियाणा, मध्य प्रदेश और मद्रास हाईकोर्ट के अलग-अलग और विरोधाभासी फैसलों का उल्लेख किया गया। अदालत ने यह भी नोट किया कि कुछ मामलों में छोटी पीठों ने बड़ी पीठों के पूर्व फैसलों के विपरीत राय व्यक्त की।
पीठ ने कहा कि जब ऐसे विरोधाभासों का समाधान नहीं किया जाता, तो इससे “न्यायिक असंगति और अनिश्चितता” पैदा होती है। अदालत ने कहा कि विरोधाभासी नज़ीरें मुकदमेबाजों में अलग-अलग परिणाम की उम्मीद पैदा करती हैं और इससे न्यायालयों तथा वकीलों दोनों के लिए निर्णय प्रक्रिया जटिल हो जाती है।
अदालत ने कहा कि कानून में निश्चितता न्यायिक दक्षता और निष्पक्षता के लिए आवश्यक है। यदि विरोधाभासी फैसले साथ-साथ चलते रहें, तो “यह कानून का प्रश्न नहीं रह जाता, बल्कि यह पसंद का विषय बन जाता है कि कौन सा फैसला अपनाया जाए और कौन सा छोड़ दिया जाए।”
वकीलों की जिम्मेदारी केवल मुवक्किल तक सीमित नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अधिवक्ताओं का दायित्व केवल अपने मुवक्किल के प्रति नहीं, बल्कि अदालत और पूरी न्याय वितरण प्रणाली के प्रति भी होता है।
पीठ ने कहा कि किसी वकील की “कानून की समझ और तथ्यों पर पकड़” उसकी सबसे बड़ी ताकत होती है, जिससे वह प्रतिकूल नज़ीरों को अलग करते हुए भी प्रभावी ढंग से अपने मुवक्किल का पक्ष रख सकता है। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि इस जिम्मेदारी में ऐसे फैसलों को भी अदालत के सामने रखना शामिल है, जो उनके तर्कों के समर्थन में न हों।
सुप्रीम कोर्ट ने आधुनिक मुकदमेबाजी की परिस्थितियों का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि आज विभिन्न विधिक क्षेत्रों में प्रतिदिन “दर्जनों आदेश और फैसले” सुनाए जाते हैं, जिससे न्यायाधीशों के लिए हर नए फैसले से तुरंत अवगत रहना हमेशा संभव नहीं होता।
ऐसी स्थिति में अदालत ने कहा कि सभी प्रासंगिक निर्णयों को न्यायालय के समक्ष रखने में वकीलों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।
न्यायालयों का भी स्वतंत्र दायित्व
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून में एकरूपता बनाए रखने का पूरा भार केवल अधिवक्ताओं पर नहीं डाला जा सकता।
पीठ ने कहा, “न्यायालय का स्वयं एक स्वतंत्र त्रिस्तरीय दायित्व है — सही कानून लागू करना, भले ही अधिवक्ता उसका उल्लेख न करे; नज़ीरों के साथ एकरूपता सुनिश्चित करना; और प्रासंगिक कानून या बाध्यकारी फैसलों की अनदेखी वाले निर्णयों से बचना।”
अदालत ने न्यायाधीशों के सामने मौजूद व्यावहारिक चुनौतियों का भी उल्लेख किया, जिनमें भारी लंबित मामलों का बोझ, प्रतिदिन आदेशों का उच्चारण और अनेक विधिक क्षेत्रों से जुड़े मामलों को संभालना शामिल है।
पीठ ने कहा कि न्यायिक असंगति और लंबित मामलों को कम करने के लिए बार और बेंच दोनों को “प्रणाली की सेवा की भावना” के साथ कार्य करना होगा।
मेडिक्लेम राशि MACT मुआवजे से नहीं घटेगी
यह टिप्पणियां उस लंबे समय से लंबित कानूनी विवाद का निपटारा करते हुए की गईं, जिसमें यह प्रश्न था कि मेडिक्लेम या स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी के तहत प्राप्त प्रतिपूर्ति राशि को मोटर वाहन अधिनियम के तहत दिए जाने वाले मुआवजे से घटाया जा सकता है या नहीं।
बीमा कंपनी की “डबल बेनिफिट” वाली दलील को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मेडिक्लेम भुगतान बीमाधारक द्वारा प्रीमियम चुकाकर प्राप्त संविदात्मक अधिकार से उत्पन्न होता है, जबकि मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवजा मोटर दुर्घटना से उत्पन्न वैधानिक अधिकार है।
अदालत ने कहा, “हम यह घोषित करते हैं कि मेडिक्लेम/मेडिकल इंश्योरेंस के तहत प्राप्त राशि को संबंधित अधिकरण द्वारा निर्धारित मुआवजे से घटाया नहीं जा सकता।”
सुप्रीम कोर्ट ने इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड की अपील को “निराधार” बताते हुए खारिज कर दिया और मामले को अपने फैसले के अनुरूप नए सिरे से विचार के लिए हाईकोर्ट को वापस भेज दिया। लंबित आवेदनों का भी निस्तारण कर दिया गया।

