‘दहेज मामलों में पति के रिश्तेदारों को घसीटना अब आम चलन’: इलाहाबाद हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणी

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के दौरान टिप्पणी की है कि वैवाहिक विवादों में पति के परिवार के सदस्यों को झूठा फंसाना अब एक “आम चलन” बनता जा रहा है। अदालत ने यह टिप्पणी एक महिला की उस याचिका को खारिज करते हुए की, जिसमें उसने अपने पति के साथ-साथ अपने ससुराल वालों पर भी मुकदमा चलाने की मांग की थी।

न्यायमूर्ति अनिल कुमार-X ने 7 मई को दिए अपने आदेश में महिला की उस आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision Petition) को खारिज कर दिया, जिसमें उसने ट्रायल कोर्ट और पुनरीक्षण अदालत के फैसलों को चुनौती दी थी। इन निचली अदालतों ने महिला की उस अर्जी को नामंजूर कर दिया था जिसमें उसने अपनी सास, ननद और देवर को दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 319 के तहत अतिरिक्त आरोपी के रूप में समन जारी करने की मांग की थी।

फैसले की प्रति के अनुसार, न्यायमूर्ति कुमार-X ने कहा, “दहेज की मांग और उत्पीड़न के आरोपों वाले मामलों में पति के परिवार के सदस्यों को शामिल करना (फंसाना) एक आम चलन बन गया है।”

क्या है धारा 319 CrPC और इस मामले का कानूनी पेंच?

दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 319 अदालत को यह असाधारण शक्ति देती है कि यदि किसी जांच या मुकदमे के दौरान यह प्रतीत हो कि किसी ऐसे व्यक्ति ने भी अपराध किया है जिसे शुरू में आरोपी नहीं बनाया गया था, तो अदालत उसे भी मुख्य आरोपी के साथ मुकदमे का सामना करने के लिए बुला सकती है।

इस मामले में, याचिकाकर्ता महिला का तर्क था कि मामले के कई गवाहों ने लगातार यह बयान दिया है कि उसके ससुराल वालों ने उसे अतिरिक्त दहेज के लिए प्रताड़ित किया। महिला के वकील ने तर्क दिया कि चूंकि ये गवाह उसकी मूल शिकायत का पूरी तरह समर्थन कर रहे हैं, इसलिए ट्रायल कोर्ट के पास ससुराल पक्ष के लोगों को समन जारी न करने का कोई ठोस कारण नहीं था।

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दूसरी ओर, पति के रिश्तेदारों के वकील ने इस मांग का कड़ा विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि भाई, बहन और मां के खिलाफ लगाए गए आरोप केवल “सामान्य और अस्पष्ट” (Omnibus and Bald) हैं। उनका इस कथित अपराध से कोई सीधा संबंध नहीं है और उनके खिलाफ विशिष्ट आरोप कानूनी प्रक्रिया के काफी बाद के चरण में जोड़े गए हैं।

‘अस्पष्ट आरोप न्याय के तराजू पर खरे नहीं उतरते’

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और मामले के रिकॉर्ड का अध्ययन करने के बाद, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने निचली अदालतों के फैसले को सही ठहराया। हाई कोर्ट ने माना कि पति के करीबी रिश्तेदारों के खिलाफ लगाए गए आरोपों में कोई ठोस आधार नहीं है।

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अदालत ने रेखांकित किया कि शिकायत पूरी तरह से घिसे-पिटे और बिना किसी ठोस सबूत के लगाए गए दावों पर आधारित थी। कोर्ट ने कहा, “पति के परिवार के सभी सदस्यों के खिलाफ इस तरह के सामान्य और निराधार आरोप लगाना अदालत में भरोसा पैदा नहीं करता।”

ट्रायल कोर्ट और पुनरीक्षण अदालत के निष्कर्षों में किसी भी तरह के न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता न पाते हुए, हाई कोर्ट ने महिला की याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया।

एक दूसरा पहलू: दहेज हत्याओं पर सुप्रीम कोर्ट की गंभीर चिंता

इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब देश की अदालतों में दहेज से जुड़े मामलों को लेकर एक व्यापक और गंभीर बहस चल रही है। हाल ही में, भारत के उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) ने देश में विशेषकर उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में बढ़ती दहेज हत्याओं पर गहरी चिंता व्यक्त की थी, जहां युवा महिलाओं को उनके ससुराल में लगातार प्रताड़ना या हिंसा का सामना करना पड़ता है।

एक अन्य महत्वपूर्ण मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने दहेज हत्या के एक आरोपी की जमानत को रद्द करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व के फैसले की आलोचना की थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हाई कोर्ट ने गंभीर आरोपों के बावजूद आरोपी को जमानत देकर “गंभीर भूल” की थी।

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सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़े शब्दों में कहा था, “हम केवल यह कहना चाहते हैं कि किसी भी स्तर पर जमानत अदालत को यह सुनिश्चित करने के लिए बहुत सतर्क रहना चाहिए कि उसका आदेश समाज में यह संदेश न दे कि अदालतें महिलाओं के खिलाफ गंभीर अपराधों को हल्के में ले रही हैं।”

सर्वोच्च अदालत ने समाज के एक कड़वे सच की ओर भी इशारा किया। कोर्ट ने कहा कि लड़कियों को बेहतर शिक्षा देने और आत्मनिर्भर बनाने के बावजूद, शादी के बाद उन्हें दहेज की मांग का सामना करना पड़ता है। अदालत ने भारतीय विवाहों में व्याप्त एक अलिखित सामाजिक नियम का भी जिक्र किया, जहां दूल्हे की अच्छी कमाई होने पर दुल्हन के परिवार पर इस बात का मनोवैज्ञानिक दबाव होता है कि वे अधिक दहेज दें, ताकि लड़के वाले किसी भी तरह से नाराज न हों।

उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पीड़िता के पिता की अपील को स्वीकार करते हुए पति की जमानत रद्द कर दी थी, जिससे यह स्पष्ट संदेश गया कि वैवाहिक क्रूरता के मामलों में कोई नरमी नहीं बरती जाएगी।

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