दिल्ली दंगा मामला: उमर खालिद की अंतरिम जमानत याचिका खारिज; कोर्ट बोला- ‘मां की मामूली सर्जरी के लिए आपकी जरूरत नहीं’

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के पूर्व छात्र और कार्यकर्ता उमर खालिद को दिल्ली की एक अदालत से बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने फरवरी 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की साजिश से जुड़े मामले में खालिद की 15 दिनों की अंतरिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। उमर खालिद ने अपनी बीमार मां की सर्जरी के दौरान देखभाल करने और अपने दिवंगत चाचा की मौत के 40वें दिन की रस्म (चेहलुम) में शामिल होने के लिए कोर्ट से अस्थाई राहत मांगी थी।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश समीर बाजपेयी ने इस याचिका को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि बचाव पक्ष द्वारा दिए गए तर्क इस मामले में अंतरिम राहत देने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। यह याचिका भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 483 और दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 439 के तहत दायर की गई थी।

‘साधारण है मां का ऑपरेशन, मदद के लिए परिवार के अन्य सदस्य मौजूद’ — कोर्ट

सुनवाई के दौरान उमर खालिद के वकील साहिल घई ने दलील दी कि खालिद अपने परिवार के इकलौते और सबसे बड़े बेटे हैं। उनके पिता की उम्र 71 वर्ष हो चुकी है और वह अकेले अपनी पत्नी की देखभाल करने की स्थिति में नहीं हैं। वकील ने बताया कि खालिद की पांच बहनें हैं, जिनमें से चार शादीशुदा हैं और अपने-अपने घरों में दूर रहती हैं। खालिद की मां लंबे समय से बीमार हैं और उनके स्तन से गांठ (लंप एक्साइज) हटाने के लिए एक सर्जरी होनी तय हुई है।

हालांकि, अदालत ने इन पारिवारिक परिस्थितियों को जमानत का आधार मानने से इनकार कर दिया। न्यायाधीश समीर बाजपेयी ने अपने चार पन्नों के आदेश में स्पष्ट रूप से लिखा कि यह एक बेहद सामान्य और छोटी सर्जरी है।

अदालत ने टिप्पणी की, “जहां तक आरोपी की मां के ऑपरेशन का सवाल है… यह सिर्फ एक गांठ हटाने की बेहद साधारण प्रक्रिया है। इसके लिए आरोपी की उपस्थिति या उसकी ओर से किसी वास्तविक मदद की आवश्यकता नजर नहीं आती।” न्यायाधीश ने यह भी जोड़ा कि उमर खालिद की बहनें अपनी मां की देखभाल के लिए आ सकती हैं और उनके पिता भी वहां मौजूद हैं।

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इसके साथ ही कोर्ट ने दिवंगत चाचा की ‘चेहलुम’ रस्म में शामिल होने की दलील को भी खारिज कर दिया। अदालत का कहना था कि यह कोई ‘निकटतम संबंध’ का मामला नहीं है। जज ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, “अगर संबंध इतने ही गहरे थे, तो आरोपी ने चाचा की मृत्यु के तुरंत बाद जमानत की मांग क्यों नहीं की? इतने लंबे समय के बाद इस आधार पर राहत मांगना उचित नहीं ठहराया जा सकता।”

अभियोजन पक्ष का आरोप: ‘अदालत की नरमी का फायदा उठा रहे आरोपी’

विशेष लोक अभियोजक अयोध्या प्रसाद ने उमर खालिद की इस अर्जी का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने अदालत के समक्ष दलील दी कि आरोपी बार-बार राहत मांगकर “कोर्ट की उदारता का दुरुपयोग” करने की कोशिश कर रहे हैं।

सरकारी वकील ने स्पष्ट किया कि इससे पहले जब भी ठोस और उचित कारण थे, तब अदालत ने खालिद को अंतरिम जमानत दी थी, लेकिन इस बार के कारण बिल्कुल भी तार्किक नहीं हैं। उन्होंने बताया कि मां की सर्जरी केवल लोकल एनेस्थीसिया के तहत होने वाली एक सामान्य प्रक्रिया है, जिसके लिए जेल में बंद आरोपी की शारीरिक मौजूदगी जरूरी नहीं है।

बचाव पक्ष के इस तर्क पर कि उमर खालिद या किसी अन्य सह-आरोपी ने पहले कभी जमानत की शर्तों का उल्लंघन नहीं किया है, अदालत ने साफ किया कि पिछला आचरण भविष्य की राहत की गारंटी नहीं हो सकता। न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि कोर्ट हर नए आवेदन पर उसके अपने गुण-दोष के आधार पर विचार करता है और राहत तभी दी जा सकती है जब कारण पूरी तरह उचित हों।

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पृष्ठभूमि: क्या है पूरा मामला?

उमर खालिद को साल 2020 में गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) और आपराधिक साजिश के तहत गिरफ्तार किया गया था। उन पर फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भड़के सांप्रदायिक दंगों की साजिश रचने का आरोप है। इन दंगों में 53 लोगों की जान चली गई थी और सैकड़ों लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।

इससे पहले, इसी साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने भी उमर खालिद और सह-आरोपी शरजील इमाम की नियमित जमानत याचिकाओं को खारिज कर दिया था। न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया की पीठ ने दोनों को इस साजिश का “मुख्य आरोपी” करार दिया था। शीर्ष अदालत ने माना था कि इन आरोपियों ने कथित तौर पर आतंकी कृत्य की योजना बनाने, भीड़ जुटाने और उसे रणनीतिक दिशा देने में केंद्रीय भूमिका निभाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में जोर दिया था कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के साथ-साथ समाज की सुरक्षा और न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा को संतुलित रखना बेहद जरूरी है।

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