सुप्रीम कोर्ट ने मकान मालिक और किराएदार के एक विवाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश XV नियम 5 के तहत दंडात्मक परिणाम लागू करने से पहले ‘सुनवाई की पहली तारीख’ (First Date of Hearing) को निर्णायक रूप से निर्धारित किया जाना चाहिए। जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने कहा कि किराया न चुकाने पर किराएदार के बचाव को समाप्त करने की शक्ति विवेकाधीन है और इसका प्रयोग यांत्रिक तरीके से नहीं किया जाना चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता धर्मेंद्र कालरा और अन्य कानपुर नगर में स्थित उस परिसर के मालिक हैं, जहां प्रतिवादी कुलविंदर सिंह भाटिया ‘ज्ञान वैष्णव होटल’ चलाते हैं। मकान मालिकों के अनुसार, सितंबर 2020 में मासिक किराया बढ़ाकर ₹25,000 कर दिया गया था, लेकिन किराएदार ने नवंबर 2020 से भुगतान बंद कर दिया।
मकान मालिकों ने बेदखली और बकाया किराए की वसूली के लिए मुकदमा (S.C.C. सूट नंबर 52/2021) दायर किया। सुनवाई के दौरान, ट्रायल कोर्ट ने आदेश XV नियम 5 CPC के तहत किराएदार के बचाव (Defence) को इस आधार पर समाप्त कर दिया कि उसने सुनवाई की पहली तारीख को या उससे पहले बकाया किराया जमा नहीं किया था। हाईकोर्ट ने इस पर विचार करते हुए किराएदार को कम किराया (₹1,500) जमा करने की अनुमति दी और बाद में समय भी बढ़ा दिया, जिसके खिलाफ मकान मालिक सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं (मकान मालिकों) ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के सुविचारित आदेश में हस्तक्षेप करके बड़ी कानूनी चूक की है। उन्होंने कहा कि किराएदार का आचरण जानबूझकर चूक करने वाला रहा है और हाईकोर्ट द्वारा ‘अंतिम अवसर’ देने के बावजूद समय बढ़ाना कानूनन गलत था। उन्होंने जोर दिया कि मकान मालिक-किराएदार के रिश्ते से इनकार करने मात्र से किराएदार CPC के तहत किराया जमा करने के अपने वैधानिक दायित्व से मुक्त नहीं हो जाता।
प्रतिवादी (किराएदार) की ओर से तर्क दिया गया कि किराए की जमा राशि में केवल सात दिनों की देरी हुई थी, जो वकील के विदेश में होने के कारण हुई। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट ने देरी को माफ करके एक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया। इसके अतिरिक्त, किराएदार ने ‘उत्तर प्रदेश शहरी परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021’ के तहत मुकदमे की स्थिरता को भी चुनौती दी।
कोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ
सुप्रीम कोर्ट ने नोट किया कि आदेश XV नियम 5 CPC का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किराएदार मुकदमे के दौरान बिना किराया चुकाए संपत्ति पर कब्जा जारी न रखे। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बचाव को समाप्त करना एक “कठोर” और “असाधारण कदम” है।
बिमल चंद जैन बनाम श्री गोपाल अग्रवाल (1981) मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:
“नियम 5 के उप-नियम (1) में ‘सकना’ (May) शब्द का प्रयोग अदालत को बचाव समाप्त करने की शक्ति देता है, लेकिन यह हर चूक के मामले में ऐसा करने के लिए बाध्य नहीं करता… इस शक्ति का प्रयोग यांत्रिक रूप से नहीं किया जाना चाहिए।”
कोर्ट ने संतोष मेहता बनाम ओम प्रकाश (1980) मामले का भी जिक्र किया और कहा कि यह कठोर प्रावधान केवल उन्हीं स्थितियों के लिए है जहां किराएदार “जानबूझकर या जानबूझकर चूक” का दोषी हो।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि कोर्ट ने ‘सुनवाई की पहली तारीख’ को केवल एक औपचारिक तारीख मानने से इनकार कर दिया। सिराज अहमद सिद्दीकी बनाम प्रेम नाथ कपूर (1993) का संदर्भ देते हुए पीठ ने कहा:
“सुनवाई की पहली तारीख वह होती है जिस दिन अदालत मामले में विवाद के बिंदुओं को निर्धारित करने और जरूरत पड़ने पर मुद्दों को तय करने के लिए अपना दिमाग लगाती है।”
पीठ ने पाया कि वर्तमान मामले में, ट्रायल कोर्ट ने बचाव को समाप्त करने से पहले इस आधारभूत तारीख को स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं किया था।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रक्रियात्मक कानून न्याय के लिए होते हैं, उसे रोकने के लिए नहीं। कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने यांत्रिक रूप से काम किया, जबकि हाईकोर्ट अपने स्वयं के आदेशों में सामंजस्य नहीं बिठा सका। इसी आधार पर मामले को वापस ट्रायल कोर्ट भेज दिया गया है।
ट्रायल कोर्ट को निम्नलिखित निर्देश दिए गए हैं:
- कानून के अनुसार मुकदमे की ‘सुनवाई की पहली तारीख’ निर्धारित करें।
- जांच करें कि क्या आदेश XV नियम 5 CPC की आवश्यकताओं का पर्याप्त अनुपालन किया गया है।
- इस बात पर विचार करें कि क्या चूक जानबूझकर थी या सद्भावना (Bona fide) से हुई थी।
- दोनों पक्षों को पर्याप्त अवसर देने के बाद छह महीने के भीतर तर्कसंगत आदेश पारित करें।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने मामले के मेरिट पर कोई राय व्यक्त नहीं की है और सभी कानूनी मुद्दे ट्रायल कोर्ट के पास निर्णय के लिए खुले हैं।
केस विवरण:
- केस शीर्षक: धर्मेंद्र कालरा और अन्य बनाम कुलविंदर सिंह भाटिया
- केस संख्या: सिविल अपील संख्या (एस) 2026 की (@SLP (C) संख्या 7116/2025)
- पीठ: जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी, जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले
- दिनांक: 15 मई, 2026

