सुप्रीम कोर्ट ने गृह मंत्रालय (MHA) के उस आदेश को रद्द कर दिया है जिसमें 22 साल से जेल में बंद एक कैदी की समय पूर्व रिहाई के अनुरोध को ठुकरा दिया गया था। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने स्पष्ट किया कि कार्यपालिका केवल “अपराध की जघन्यता” के आधार पर छूट (Remission) देने से इनकार नहीं कर सकती। अदालत ने जोर देकर कहा कि सजा का उद्देश्य सुधारात्मक होना चाहिए न कि प्रतिशोधात्मक।
अदालत ने पाया कि गृह मंत्रालय द्वारा उत्तराखंड सरकार की सकारात्मक सिफारिश को बिना किसी ठोस कारण के खारिज करना “मनमाना और तर्कहीन” था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला साल 2003 में लखनऊ के महानगर थाने में दर्ज एक हत्या से संबंधित है। पहले उत्तर प्रदेश पुलिस और फिर सीबी-सीआईडी (CB-CID) ने इसकी जांच की, जिसे बाद में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंप दिया गया। हालांकि अपराध उत्तर प्रदेश में हुआ था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 2007 में निष्पक्ष सुनवाई के लिए ट्रायल को देहरादून, उत्तराखंड स्थानांतरित कर दिया था। याचिकाकर्ता रोहित चतुर्वेदी को आईपीसी की धारा 120बी और 302 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।
लगभग 22 वर्षों तक जेल में रहने के बाद, चतुर्वेदी ने समय पूर्व रिहाई की गुहार लगाई। उत्तराखंड सरकार ने उनकी रिहाई की सिफारिश की थी, लेकिन चूंकि मामला सीबीआई द्वारा जांचा गया था, इसलिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 477 के तहत केंद्र सरकार की सहमति अनिवार्य थी। 9 जुलाई, 2025 को गृह मंत्रालय ने इस सिफारिश को मानने से इनकार कर दिया, जिसे याचिकाकर्ता ने चुनौती दी।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता की दलीलें: याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि गृह मंत्रालय का आदेश “बिना कारण वाला” (non-speaking order) था। उन्होंने इसी मामले के एक अन्य सह-अभियुक्त, अमरमणि त्रिपाठी की रिहाई का हवाला देते हुए समानता (Parity) की मांग की, जिन्हें उत्तर प्रदेश सरकार ने 2023 में रिहा कर दिया था। याचिकाकर्ता ने बताया कि वह 22 साल जेल में काट चुका है और जेल में उसका आचरण बेहद सराहनीय रहा है।
उत्तराखंड सरकार का पक्ष: राज्य सरकार के वकील ने पुष्टि की कि कैदी के आचरण और सुधार की संभावनाओं को देखते हुए राज्य ने उसकी समय पूर्व रिहाई की सिफारिश की थी।
भारत सरकार (गृह मंत्रालय/सीबीआई): अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ने गृह मंत्रालय के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ने एक “जघन्य अपराध” में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। केंद्र का तर्क था कि अपराध की गंभीरता को देखते हुए रिहाई से इनकार करना सही है।
अदालत का विश्लेषण
अदालत ने अपने विश्लेषण में कार्यपालिका के अधिकारों की सीमाओं और सुधारात्मक न्याय प्रणाली के सिद्धांतों पर ध्यान केंद्रित किया।
1. कारण सहित आदेश की अनिवार्यता: पीठ ने गृह मंत्रालय के पत्र को “स्पष्ट रूप से तर्कहीन” पाया, क्योंकि इसमें केवल यह लिखा था कि सक्षम प्राधिकारी “सहमत नहीं है”। अदालत ने कहा:
“कारणों को दर्ज करना कोई खाली औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह मनमानेपन के खिलाफ एक सुरक्षा कवच है और निर्णय लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही सुनिश्चित करता है।”
2. अपराध की जघन्यता बनाम सुधार: अदालत ने स्पष्ट किया कि अपराध की प्रकृति रिहाई से इनकार करने का एकमात्र आधार नहीं हो सकती, क्योंकि अपराध की गंभीरता सजा सुनाते समय ही विचार में ली जा चुकी होती है।
“न्याय किसी व्यक्ति को उसके सबसे खराब कृत्य की छाया में स्थायी रूप से कैद करने की अनुमति नहीं देता है। एक आपराधिक न्याय प्रणाली जो अपराध की गंभीरता से परे अपराधी के परिवर्तन को देखने से इनकार करती है, वह अपने सुधारात्मक आदर्श के साथ विश्वासघात करेगी।”
3. प्लेटो का सिद्धांत और सजा का स्वरूप: दार्शनिक प्लेटो का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि सजा दवा की तरह होनी चाहिए।
“यदि कैदी के आचरण से यह संकेत मिलता है कि उसके भीतर ‘अन्याय के प्रति स्वाभाविक घृणा’ पैदा हो गई है, तो निरंतर कैद अनावश्यक हो जाती है। ऐसी स्थिति में स्वतंत्रता से वंचित रखना सुधार नहीं बल्कि प्रतिशोध बन जाता है।”
4. समानता और सुधारात्मक दृष्टिकोण: अदालत ने उल्लेख किया कि जेल प्रशासन का सीधा प्रबंधन करने वाली उत्तराखंड सरकार ने उसे रिहाई के योग्य पाया था। साथ ही, एक सह-अभियुक्त की रिहाई के बाद याचिकाकर्ता के साथ अलग व्यवहार करने के लिए कोई ठोस और तर्कसंगत कारण मौजूद नहीं था।
अदालत का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने 9 जुलाई, 2025 के गृह मंत्रालय के पत्र को रद्द कर दिया। यह देखते हुए कि याचिकाकर्ता 22 साल की सजा काट चुका है, पीठ ने मामले को फिर से विचार के लिए भेजने के बजाय सीधे राहत प्रदान की।
अदालत ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता को समय पूर्व रिहा माना जाए। अदालत ने कहा, “उसे अब सरेंडर करने की आवश्यकता नहीं होगी।” इसके साथ ही रिट याचिका को स्वीकार कर लिया गया।
मामले का विवरण:
केस का शीर्षक: रोहित चतुर्वेदी बनाम उत्तराखंड राज्य और अन्य
केस संख्या: रिट याचिका (आपराधिक) संख्या 446/2023
पीठ: जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां
दिनांक: 15 मई, 2026

