21 वर्ष से कम उम्र के लड़के के साथ लिव-इन रिलेशनशिप को इलाहाबाद हाईकोर्ट का सुरक्षा देने से इनकार; कहा- ‘विवाह कानूनों की अनदेखी नहीं की जा सकती’

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुरक्षा की मांग करने वाले एक लिव-इन कपल की रिट याचिका को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोर्ट ऐसी किसी भी स्थिति में सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकता जो उस विवाह के विकल्प के रूप में काम करे, जिसकी अनुमति वर्तमान वैधानिक ढांचे के तहत नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने पाया कि चूंकि पुरुष याचिकाकर्ता की आयु 19 वर्ष है, इसलिए उसे ‘बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006’ के तहत विवाह के उद्देश्य से ‘बच्चा’ (child) माना जाएगा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह याचिका एक प्रेमी जोड़े द्वारा दायर की गई थी, जिन्होंने दावा किया था कि वे लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं। याचिकाकर्ता संख्या 1 एक 20 वर्षीय मुस्लिम महिला है, जबकि याचिकाकर्ता संख्या 2 एक 19 वर्षीय हिंदू युवक है जो अनुसूचित जाति से संबंध रखता है।

याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि महिला के पिता उन्हें डरा-धमका रहे हैं और रिश्ता खत्म करने के लिए दबाव बना रहे हैं। उन्होंने पुलिस अधिकारियों को यह निर्देश देने की मांग की थी कि उनके परिवार को उनके साथ रहने में हस्तक्षेप करने से रोका जाए और उनके जीवन एवं स्वतंत्रता की रक्षा की जाए। याचिकाकर्ताओं ने यह स्वीकार किया कि वे वर्तमान में विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत शादी नहीं कर सकते क्योंकि युवक की आयु 21 वर्ष पूरी नहीं हुई है।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि चूंकि दोनों पक्ष बालिग (18 वर्ष से ऊपर) हैं, इसलिए उन्हें अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ शादी के साथ या उसके बिना रहने का अधिकार है। उन्होंने हाईकोर्ट के उन पिछले आदेशों का हवाला दिया जिनमें लिव-इन जोड़ों को सुरक्षा प्रदान की गई थी।

राज्य की ओर से अतिरिक्त मुख्य स्थायी अधिवक्ता ने इस मांग का विरोध किया। उन्होंने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955, विशेष विवाह अधिनियम, 1954 और बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 के प्रावधानों का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि कानून 21 वर्ष से कम उम्र के पुरुष को विवाह की कानूनी क्षमता से रहित मानता है। राज्य का कहना था कि आयु, परिपक्वता और कानूनी क्षमता से संबंधित वैधानिक नीति को अनुच्छेद 21 के व्यापक आह्वान के माध्यम से निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

जस्टिस गरिमा प्रसाद ने वैधानिक ढांचे की समीक्षा की और मुख्य प्रश्न यह तय किया कि क्या कोर्ट उस लिव-इन रिलेशनशिप को सुरक्षा दे सकता है जहां पुरुष को विवाह के लिए वैधानिक रूप से ‘बच्चा’ माना गया है।

वैधानिक अक्षमता और विधायी मंशा हाईकोर्ट ने पाया कि 2006 का अधिनियम ‘विवाह-विशिष्ट अक्षमता’ पैदा करता है। कोर्ट ने कहा:

“कानून के तहत 18 वर्ष की आयु पूरी करने पर एक पुरुष वयस्क हो सकता है, लेकिन संसद ने फिर भी विवाह के लिए 21 वर्ष की आयु पूरी होने तक उसे ‘बच्चा’ मानने का विकल्प चुना है। यह अंतर एक सचेत विधायी निर्णय को दर्शाता है कि विवाह के लिए कई अन्य नागरिक कार्यों की तुलना में उच्च स्तर की परिपक्वता की आवश्यकता होती है।”

परोक्ष कार्यों का सिद्धांत हाईकोर्ट ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप व्यावहारिक रूप से विवाह की प्रकृति का ही रिश्ता है। जस्टिस गरिमा प्रसाद ने टिप्पणी की:

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“यदि ऐसा रिश्ता जानबूझकर इसलिए अपनाया जाता है क्योंकि कानून एक निश्चित आयु तक विवाह का अधिकार नहीं देता, तो उसे सुरक्षा देने वाला कोर्ट का आदेश केवल एक सुरक्षा आदेश नहीं रह जाता। यह उस विवाह जैसी व्यवस्था के लिए एक परोक्ष मंजूरी के रूप में कार्य करने लगता है जिसकी वर्तमान में अनुमति नहीं है।”

कोर्ट ने इस सिद्धांत को लागू किया कि “जो काम सीधे नहीं किया जा सकता, उसे परोक्ष रूप से करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।” कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विवाह के कार्यात्मक विकल्प (functional equivalent) को केवल इसलिए न्यायिक समर्थन नहीं मिल सकता क्योंकि उसे लिव-इन रिलेशनशिप कहा गया है।

माता-पिता की जिम्मेदारी बनाम हस्तक्षेप पारिवारिक हस्तक्षेप के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने कहा कि हालांकि माता-पिता हिंसा या अवैध कैद का सहारा नहीं ले सकते, लेकिन उन्हें 2006 के अधिनियम के तहत ‘कानूनी कदम’ उठाने से नहीं रोका जा सकता, जैसे कि बाल विवाह निषेध अधिकारी से संपर्क करना।

मिसालों (Precedents) का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों को इस मामले से अलग बताया:

  • नंदकुमार बनाम केरल राज्य (2018): यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता में अवैध हस्तक्षेप को रोकता है, लेकिन विवाह की क्षमता को नियंत्रित करने वाले कानूनों को हराने की आवश्यकता नहीं बताता।
  • लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2006): यह उन जोड़ों पर लागू होता है जो “विवाह के लिए कानूनी रूप से सक्षम वयस्क” हैं।
  • इंद्रा शर्मा बनाम वी.के.वी. शर्मा (2013): इसमें स्पष्ट किया गया था कि वैधानिक प्रतिबंधों से टकराने वाले रिश्ते को स्वतः ही विवाह जैसा संरक्षित दर्जा नहीं दिया जा सकता।
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अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि रिट क्षेत्राधिकार का उपयोग उस रिश्ते को वैधता देने के लिए नहीं किया जा सकता जो उस विवाह का विकल्प है जिसे कानून अनुमति नहीं देता। हालांकि व्यक्ति अनुच्छेद 21 के तहत वास्तविक नुकसान या अवैध हिरासत के खिलाफ सुरक्षा के हकदार हैं, लेकिन इस मामले में याचिकाकर्ताओं के आरोप “अस्पष्ट” थे और उनके समर्थन में कोई विशिष्ट शिकायत या तथ्य मौजूद नहीं थे।

कोर्ट ने अंत में कहा:

“इस कोर्ट के रिट क्षेत्राधिकार का उपयोग कानून के संचालन को कमजोर करने या उसे दरकिनार करने के लिए नहीं किया जा सकता है।”

इन्हीं टिप्पणियों के साथ याचिका खारिज कर दी गई।

केस विवरण :

  • केस का नाम: शाजिया परवीन और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 3 अन्य
  • केस संख्या: रिट-सी संख्या 469/2026
  • पीठ: जस्टिस गरिमा प्रसाद
  • तारीख: 4 मई, 2026

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