‘नैतिकता को अपराध से अलग रखें’: महिला वकील से रेप के आरोपी जिम ट्रेनर को दिल्ली हाईकोर्ट से मिली राहत

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महिला अधिवक्ता के साथ दुष्कर्म के आरोपी जिम ट्रेनर को यह कहते हुए जमानत दे दी है कि व्यक्तिगत नैतिकता को आपराधिक कानून से अलग रखा जाना चाहिए। अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि प्रथम दृष्टया यह मामला किसी आपराधिक साजिश के बजाय दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने रोमांटिक संबंधों का प्रतीत होता है।

न्यायमूर्ति गिरीश कठपालिया ने 12 मई को दिए अपने आदेश में स्पष्ट किया कि जब किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Liberty) का प्रश्न हो, तो सामाजिक नैतिकता के आधार पर कानूनी राहत को नहीं रोका जा सकता। आरोपी जिम ट्रेनर नवंबर 2025 से हिरासत में था।

मामले की शुरुआत तब हुई जब दिल्ली के दिलशाद कॉलोनी में जिम जाने वाली एक 30 वर्षीय महिला वकील ने ट्रेनर पर गंभीर आरोप लगाए। शिकायतकर्ता के अनुसार, जिम में दोस्ती होने के बाद आरोपी ने उसे नशीला पेय पिलाया और बेहोशी की हालत में गाजियाबाद के एक होटल ले जाकर उसके साथ दुष्कर्म किया। महिला ने यह भी आरोप लगाया था कि आरोपी ने उसकी कुछ आपत्तिजनक तस्वीरें खींच ली थीं, जिनके आधार पर वह उसे ब्लैकमेल कर रहा था और बार-बार शारीरिक शोषण कर रहा था।

सुनवाई के दौरान अदालत ने अभियोजन पक्ष (Prosecution) के दावों में कई विसंगतियां पाईं। न्यायमूर्ति कठपालिया ने विशेष रूप से उस घटना पर सवाल उठाया जिसमें पीड़िता ने बेहोशी की हालत में दिल्ली से गाजियाबाद तक यात्रा करने की बात कही थी। अदालत ने कहा, “यह समझना मुश्किल है कि नशीला पदार्थ पीने के बाद बेहोशी की स्थिति में पीड़िता इतनी लंबी दूरी तय कर होटल तक कैसे पहुंच गई।”

इसके अलावा, पुलिस की जांच और आरोपी के जब्त मोबाइल फोन से भी ब्लैकमेलिंग के दावों की पुष्टि नहीं हुई। कोर्ट ने पाया कि फोन में कोई “आपत्तिजनक” सामग्री नहीं थी, बल्कि जो फोटो और वीडियो मिले, वे दोनों के बीच एक सामान्य और प्रेमपूर्ण रिश्ते को दर्शाते थे।

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दिल्ली पुलिस ने जमानत का विरोध करते हुए दलील दी थी कि आरोपी शादीशुदा है और एक बच्चे का पिता है, इसलिए एक “विवाहेतर संबंध” (Extramarital Affair) में शामिल व्यक्ति को अदालती राहत नहीं मिलनी चाहिए। पुलिस ने दोनों पक्षों के अलग-अलग धर्मों से होने का मुद्दा भी उठाया।

अदालत ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा, “नैतिकता को अपराध से अलग रखना होगा, विशेषकर तब जब हम किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की बात कर रहे हों।”

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कोर्ट ने आगे जोड़ा कि पीड़िता कोई नाबालिग या अनपढ़ महिला नहीं है। आदेश के अनुसार, “शिकायतकर्ता 30 वर्ष की है और एक अभ्यास करने वाली वकील है, जो पूरी तरह से जानती है कि उसके लिए क्या सही है और क्या गलत।” कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले में ‘शादी के झूठे वादे’ जैसा कोई दावा भी नहीं किया गया था।

इन तमाम परिस्थितियों को देखते हुए, दिल्ली हाईकोर्ट ने आरोपी को आगे जेल में रखने का कोई ठोस कारण नहीं पाया और उसे जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया।

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