“बच्चे को चाहिए माता-पिता दोनों का प्यार”: बॉम्बे हाई कोर्ट ने मां की ‘पजेसिवनेस’ पर जताई चिंता

बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक वैवाहिक विवाद के मामले में बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि माता-पिता के बीच चाहे कैसा भी मनमुटाव हो, बच्चे को दोनों का प्यार मिलना चाहिए। कोर्ट ने बच्चे को पिता से न मिलने देने की मां की ‘पजेसिवनेस’ (अधिकार जताने की भावना) पर गहरी चिंता व्यक्त की और इसे बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बताया।

जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे की पीठ एक पिता की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसने गर्मियों की छुट्टियों के दौरान अपने 8 वर्षीय बेटे से मिलने और उसके साथ समय बिताने की अनुमति मांगी थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए, कोर्ट ने मां को निर्देश दिया कि वह छुट्टियों के दौरान पांच दिनों के लिए बच्चे की कस्टडी पिता को सौंप दे।

सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि बच्चे को काउंसलिंग के लिए मनोवैज्ञानिक (Psychologist) के पास ले जाया जा रहा है। इस पर कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि यह स्थिति “परेशान करने वाली” है। बेंच ने सुझाव दिया कि अगर बच्चे को माता-पिता दोनों का साथ मिलता, तो शायद उसे मनोवैज्ञानिक परामर्श की जरूरत ही नहीं पड़ती।

अदालत ने स्पष्ट किया, “हमारा मानना है कि बच्चे के जीवन में माता-पिता दोनों की उपस्थिति बहुत महत्वपूर्ण है, जो उसे एक स्वस्थ व्यक्ति के रूप में विकसित होने में मदद करती है।”

8 साल के बच्चे की उम्र का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि यह उम्र विकास के सबसे महत्वपूर्ण साल (Formative Years) होते हैं। अगर मां बच्चे के मन में पिता के प्रति डर या नफरत पैदा करती है, तो यह डर उसके साथ ताउम्र रह सकता है।

हाई कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर मां बच्चे को यह सिखाती है कि पिता की संगत उसके लिए ठीक नहीं है, तो बच्चे के व्यक्तित्व पर इसका स्थायी और नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

अदालत ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि महिला ने पहले फैमिली कोर्ट में बच्चे को हर सप्ताहांत (Weekend) पिता से मिलाने का वादा किया था, लेकिन बाद में वह अपनी बात से मुकर गई।

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बेंच ने टिप्पणी की, “मां इस व्यवस्था का जितना विरोध करेगी, बच्चा अपने पिता से उतना ही दूर होता जाएगा, और हम ठीक इसी स्थिति से बचना चाहते हैं।” कोर्ट ने साफ किया कि शादी खत्म हो सकती है, लेकिन माता-पिता के रूप में जिम्मेदारियां कभी खत्म नहीं होतीं। यह फैसला स्पष्ट संदेश देता है कि अदालती लड़ाइयों में बच्चे के भावनात्मक हितों को सर्वोपरि रखा जाना चाहिए।

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