हल्द्वानी आगजनी मामला: सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों की ‘डिफ़ॉल्ट बेल’ रद्द की, दो हफ्ते में सरेंडर करने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया है, जिसमें 2024 के हल्द्वानी आगजनी और दंगे के दो आरोपियों को डिफ़ॉल्ट बेल (जमानत) दी गई थी। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने उत्तराखंड सरकार की अपील को स्वीकार करते हुए दोनों आरोपियों को दो सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के सामने आत्मसमर्पण (सरेंडर) करने का निर्देश दिया है।

शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की कि जांच एजेंसी के काम करने के तरीके और गति की आलोचना करते हुए हाईकोर्ट ने “पूरी तरह से गलत” रुख अपनाया था। पीठ ने जोर देकर कहा कि अपराध की गंभीरता—जिसमें व्यापक दंगा और पुलिस थाने पर हमला शामिल था—जांच एजेंसी के सामने बड़ी चुनौतियां पेश करती है, जो जांच की समयसीमा को उचित ठहराती हैं।

यह पूरा मामला फरवरी 2024 में हल्द्वानी के बनभूलपुरा में हुई हिंसा से जुड़ा है। एक अतिक्रमण हटाओ अभियान के दौरान वहां भीषण दंगे भड़क उठे थे, जिसमें सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया गया और एक पुलिस थाने को आग के हवाले कर दिया गया था। इस मामले में आरोपी जावेद सिद्दीकी और अरशद अयूब को 9 फरवरी, 2024 को गिरफ्तार किया गया था। उन पर भारतीय दंड संहिता (IPC), सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम, शस्त्र अधिनियम और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था।

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कानूनी प्रावधानों के अनुसार, यदि जांच एजेंसी निर्धारित समय (आमतौर पर 60 या 90 दिन, या UAPA जैसे विशेष मामलों में विस्तारित अवधि) के भीतर चार्जशीट दाखिल नहीं करती है, तो आरोपी ‘डिफ़ॉल्ट बेल’ का हकदार होता है। इस मामले में, निचली अदालत ने जांच पूरी करने के लिए समय सीमा बढ़ा दी थी और पुलिस ने 7 जुलाई, 2024 को चार्जशीट दाखिल की थी, जो विस्तारित समय सीमा (11 जुलाई) के भीतर थी।

जनवरी 2025 में, उत्तराखंड हाईकोर्ट ने दोनों आरोपियों को डिफ़ॉल्ट बेल दे दी थी। हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी पर “लापरवाही” और “सुस्ती” का आरोप लगाया था। हाईकोर्ट की टिप्पणी थी कि जब आरोपी जेल में बंद थे, तब जांच बहुत धीमी गति से आगे बढ़ी और तीन महीनों में केवल आठ सरकारी और चार सार्वजनिक गवाहों के बयान दर्ज किए गए।

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सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की इन टिप्पणियों को “पूरी तरह से अनुचित” और तथ्यों के लिहाज से गलत पाया। उत्तराखंड सरकार की ओर से पेश हुए डिप्टी एडवोकेट जनरल जतिंदर कुमार सेठी ने अदालत को बताया कि 90 दिनों की अवधि के भीतर केवल 12 नहीं, बल्कि 65 गवाहों के बयान दर्ज किए गए थे।

पीठ ने कहा कि “अपराध की भयावहता और आरोपियों व गवाहों की बड़ी संख्या” को देखते हुए जांच “अत्यधिक तत्परता” के साथ चल रही थी। अदालत ने उन आरोपों की गंभीरता पर भी ध्यान दिया जिनमें पेट्रोल बमों का इस्तेमाल और पुलिस स्टेशन को नष्ट करना शामिल था।

इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों की प्रक्रियात्मक चूक की ओर भी इशारा किया। पीठ ने पाया कि आरोपियों ने समय बढ़ाने या जमानत खारिज होने के निचली अदालत के आदेशों को तुरंत हाईकोर्ट में चुनौती नहीं दी। इसके बजाय, उन्होंने सितंबर 2024 तक इंतजार किया, जबकि जुलाई में ही चार्जशीट दाखिल हो चुकी थी।

पीठ ने अपने आदेश में कहा, “इसमें कोई विवाद नहीं है कि अपील दायर किए जाने से बहुत पहले ही जांच पूरी हो चुकी थी और चार्जशीट दाखिल कर दी गई थी। हमारा मानना है कि जब तक आरोपियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, तब तक वे अपनी चुप्पी (acquiescence) के कारण डिफ़ॉल्ट बेल का अधिकार खो चुके थे।”

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सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि हाईकोर्ट का आदेश टिकने योग्य नहीं है और उसे रद्द कर दिया। आरोपियों को दो हफ्ते के भीतर सरेंडर करने का आदेश दिया गया है, ऐसा न करने पर ट्रायल कोर्ट को उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का अधिकार दिया गया है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोपी नियमित जमानत (Regular Bail) के लिए आवेदन करने के लिए स्वतंत्र हैं, जिस पर डिफ़ॉल्ट बेल के संबंध में की गई टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना उसके गुणों (merits) के आधार पर विचार किया जाएगा।

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