सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह स्पष्ट किया है कि ‘पड़ोसी स्कूलों’ (neighbourhood schools) का यह संवैधानिक और वैधानिक कर्तव्य है कि वे राज्य सरकार द्वारा शिक्षा का अधिकार (RTE) ढांचे के तहत भेजे गए छात्रों को बिना किसी देरी के प्रवेश दें। जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने जोर देकर कहा कि यदि स्कूलों को छात्र की पात्रता या सरकार की चयन प्रक्रिया पर कोई आपत्ति या असहमति है, तो भी वे प्रवेश प्रक्रिया में देरी नहीं कर सकते।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला लखनऊ पब्लिक स्कूल, एल्डिको द्वारा दायर एक विशेष अनुमति याचिका (SLP) से संबंधित है, जिसमें हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी। मामला एक छात्रा (प्रतिवादी संख्या 5) से जुड़ा है, जिसने शैक्षणिक वर्ष 2024-25 के लिए उत्तर प्रदेश के बुनियादी शिक्षा विभाग में एक पड़ोसी स्कूल में प्री-प्राइमरी कक्षा में प्रवेश के लिए आवेदन किया था।
उत्तर प्रदेश निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार नियमावली, 2011 (UP RTE Rules, 2011) के तहत निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार छात्रा का चयन किया गया था। उसका नाम चयनित सूची में शामिल कर स्कूल को भेजा गया था, लेकिन स्कूल ने “पात्रता को लेकर अनिश्चितता” का हवाला देते हुए उसे न तो प्रवेश दिया और न ही कक्षाओं में बैठने की अनुमति दी।
इस पर छात्रा ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए कहा था कि स्कूल राज्य सरकार द्वारा लिए गए निर्णयों के विरुद्ध “अपीलीय प्राधिकरण” (appeal court) की तरह व्यवहार नहीं कर सकते।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21A, RTE अधिनियम, 2009 की धारा 12 और उत्तर प्रदेश RTE नियमावली, 2011 के नियम 8 के कानूनी ढांचे का विश्लेषण किया।
सरकारी सूची की बाध्यता
कोर्ट ने टिप्पणी की कि यूपी आरटीई नियमावली के नियम 8 के तहत प्रवेश प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए और स्कूलों के लिए समय-समय पर राज्य सरकार द्वारा निर्धारित प्रवेश प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है। पीठ ने कहा:
“सरकार द्वारा किए गए निर्णय पर पुनर्विचार करने के लिए स्कूल के पास उपलब्ध सीमित अवसर राज्य द्वारा जानबूझकर लिया गया निर्णय है, ताकि बच्चों के शिक्षा के अधिकार को सुनिश्चित करने में देरी न हो।”
‘पड़ोसी स्कूल’ की अवधारणा
निर्णय में इस बात पर प्रकाश डाला गया कि ‘पड़ोसी स्कूल’ की अवधारणा समानता और सामाजिक एकीकरण को लागू करने के लिए एक वैधानिक रणनीति है। कोर्ट ने कहा:
“कमजोर और वंचित वर्गों के बच्चों को कक्षा की क्षमता के कम से कम पच्चीस प्रतिशत तक प्रवेश देने का नियम हमारे समाज की सामाजिक संरचना को बदलने का प्रयास करता है। यह मॉडल स्कूल को एक सामान्य नागरिक स्थान के रूप में देखता है जो जाति, वर्ग और लिंग की बाधाओं को तोड़ता है।”
कर्तव्य धारकों (Duty Bearers) की पहचान
कोर्ट ने अपने पिछले फैसले ‘दिनेश बिवाजी अष्टिकर बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य’ (2026 INSC 56) का हवाला देते हुए प्राथमिक शिक्षा के अधिकार को लागू करने के लिए पांच मुख्य ‘कर्तव्य धारकों’ की पहचान की:
- उपयुक्त सरकार
- स्थानीय प्राधिकरण
- पड़ोसी स्कूल
- माता-पिता/अभिभावक
- प्राथमिक स्कूल शिक्षक
कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि अनुच्छेद 21A के तहत शिक्षा के वादे को अलग-थलग या समानांतर प्रणालियों के बजाय साझा स्थानीय स्कूलों के माध्यम से ही साकार किया जाना चाहिए।
अदालत का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी स्कूल को सरकार द्वारा किए गए चयन से कोई असहमति है, तो भी वह प्रवेश नहीं रोक सकता। स्कूलों के लिए प्रक्रिया स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने कहा:
“याचिकाकर्ता जैसे स्कूल, जिनकी सरकार द्वारा किए गए चयन के साथ कोई असहमति हो सकती है, वे संबंधित अधिकारी के समक्ष अपना पक्ष (representation) रख सकते हैं, लेकिन उन्हें ऐसे प्रतिवेदन के परिणाम की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए और वे मध्यवर्ती अवधि में उस छात्र को प्रवेश देने के लिए बाध्य हैं जिसका नाम स्कूल को भेजी गई सूची में है।”
कोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों में कोई दम न पाते हुए विशेष अनुमति याचिका को खारिज कर दिया और हाईकोर्ट के उस आदेश की पुष्टि की जिसमें छात्रा को बिना किसी देरी के प्रवेश देने का निर्देश दिया गया था।
मामले का विवरण
- केस का शीर्षक: लखनऊ पब्लिक स्कूल, एल्डिको और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
- केस संख्या: विशेष अनुमति याचिका (C) संख्या ___ 2026 की (@ डायरी संख्या 60657/2024)
- पीठ: जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे
- दिनांक: 28 अप्रैल, 2026

