पूर्व मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ को मासिक धर्म पर टिप्पणी को लेकर कानूनी नोटिस, माफी और स्पष्टीकरण की मांग

भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश धनंजय वाई. चंद्रचूड़ को धार्मिक अनुष्ठानों में मासिक धर्म के दौरान महिलाओं की भागीदारी को लेकर की गई उनकी टिप्पणियों के मामले में एक कानूनी नोटिस भेजा गया है। मुंबई के एक वकील द्वारा भेजे गए इस नोटिस में पूर्व मुख्य न्यायाधीश से बिना शर्त सार्वजनिक माफी मांगने और इस विषय पर स्थिति स्पष्ट करने की मांग की गई है। कानूनी नोटिस में आरोप लगाया गया है कि पूर्व शीर्ष न्यायाधीश की टिप्पणियां सनातन धर्म की स्थापित मान्यताओं को ठेस पहुंचाती हैं और एक सेवानिवृत्त संवैधानिक पदाधिकारी के रूप में उन्होंने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर यह बयान दिया है।

यह पूरा विवाद पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ द्वारा बीते 28 मई को ‘मासिक धर्म स्वच्छता सप्ताह’ के दौरान दिए गए एक सार्वजनिक व्याख्यान से जुड़ा है। अपने संबोधन में उन्होंने अपने बेटे की शादी के बाद आयोजित पारिवारिक गणेश उत्सव का एक व्यक्तिगत अनुभव साझा किया था। चंद्रचूड़ ने बताया था कि उनकी बहू ने उनसे पूछा था कि क्या वह मासिक धर्म के दौरान पूजा में शामिल हो सकती हैं। इस पर उन्होंने अपनी बहू से कहा था कि किसी भी इंसान में कोई अपवित्रता नहीं होती और अपवित्रता केवल मन की स्थिति है, शरीर की नहीं। इसके बाद उनकी बहू ने पूजा में हिस्सा लिया था।

मुंबई के वकील घनश्याम उपाध्याय की ओर से भेजे गए इस कानूनी नोटिस में तर्क दिया गया है कि चंद्रचूड़ का यह बयान सिर्फ एक पारिवारिक प्रसंग साझा करने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके जरिए उन्होंने धार्मिक परंपराओं में बदलाव लाने के लिए अपने व्यक्तिगत विचारों को एक सार्वजनिक आदर्श के रूप में पेश करने की कोशिश की। उपाध्याय ने मांग की है कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश को सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट करना चाहिए कि उनके विचार केवल उनके व्यक्तिगत पारिवारिक विश्वास थे और इन्हें सनातन धर्म की किसी अधिकृत या प्रामाणिक व्याख्या के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए।

धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप पर आपत्ति

कानूनी नोटिस में इस बात पर जोर दिया गया है कि देश के सर्वोच्च न्यायिक पद पर रहे किसी व्यक्ति के पास हिंदू धर्मग्रंथों, संहिताओं या स्थापित परंपराओं की पुनर्व्याख्या करने का कोई धार्मिक या आध्यात्मिक अधिकार नहीं है। उपाध्याय के अनुसार, मासिक धर्म के दौरान महिलाओं द्वारा पालन की जाने वाली पारंपरिक प्रथाएं किसी सामाजिक बहिष्कार या हीन भावना पर आधारित नहीं हैं, बल्कि वे वैदिक, स्मृति और आगम ग्रंथों में वर्णित धार्मिक एवं पारंपरिक नियमों से जुड़ी हैं।

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नोटिस में कहा गया है कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने इस प्रथा को शारीरिक अपवित्रता की गलत धारणा बताकर पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं का मजाक उड़ाया है और उन्हें कमजोर करने का प्रयास किया है।

अदालती मामलों पर प्रभाव की चिंता

इस कानूनी नोटिस में चंद्रचूड़ के सार्वजनिक बयानों से अदालतों में लंबित मामलों पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को लेकर भी चिंता जताई गई है। नोटिस के जरिए पूर्व मुख्य न्यायाधीश से यह स्पष्टीकरण देने को कहा गया है कि उनके इस बयान का उद्देश्य सुप्रीम कोर्ट में लंबित सबरीमाला मंदिर प्रवेश विवाद और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े अन्य मामलों की सुनवाई को प्रभावित करना नहीं था।

इसके साथ ही, एडवोकेट उपाध्याय ने सेवानिवृत्त न्यायाधीश से भविष्य में भाषणों, मीडिया साक्षात्कारों या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इस तरह की टिप्पणियां करने से बचने का आग्रह किया है जिससे धार्मिक आस्था को लेकर कोई नया विवाद खड़ा हो। नोटिस में कहा गया है कि जब तक धार्मिक स्वतंत्रता और मंदिर के अधिकारों से जुड़े संवेदनशील मामले अदालतों में विचाराधीन हैं, तब तक पूर्व सीजेआई जैसे उच्च पदस्थ व्यक्तित्वों को धार्मिक प्रथाओं में बदलाव की वकालत करने के लिए अपने पद की प्रतिष्ठा का उपयोग नहीं करना चाहिए।

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फिलहाल इस कानूनी नोटिस पर पूर्व सीजेआई डी.वाई. चंद्रचूड़ की ओर से कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया या स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर भारतीय समाज में संवैधानिक मूल्यों, लैंगिक समानता और पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं व व्यक्तिगत आस्था के बीच के टकराव को लेकर बहस तेज कर दी है।

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