शराब बिक्री मामले में सीबीआई की एफआईआर रद्द करने की याचिका: दिल्ली हाईकोर्ट की जज ने सुनवाई से खुद को अलग किया

दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने मंगलवार को कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम की उस याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग कर लिया है, जिसमें उन्होंने सीबीआई द्वारा दर्ज की गई एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी। यह मामला एक विदेशी शराब कंपनी को ड्यूटी-फ्री बिक्री पर लगे प्रतिबंध के दौरान कथित तौर पर मदद पहुँचाने से जुड़ा है।

सुनवाई के दौरान जस्टिस शर्मा ने निर्देश दिया कि इस मामले को किसी अन्य बेंच के सामने सूचीबद्ध किया जाए। न्यायाधीश ने कहा, “इसे दूसरी बेंच के समक्ष पेश करें।” हालांकि, उन्होंने सुनवाई से हटने का कोई विशिष्ट कारण नहीं बताया। अब इस मामले पर अगली सुनवाई 21 जुलाई को होने की उम्मीद है।

अधिवक्ता अक्षत गुप्ता के माध्यम से दायर अपनी याचिका में कार्ति चिदंबरम ने 1 जनवरी 2025 को दर्ज की गई सीबीआई की इस एफआईआर की वैधता को चुनौती दी है। सांसद ने इसे “अवैध” और “दुर्भावनापूर्ण” बताते हुए आरोप लगाया है कि यह पूरी कार्रवाई “राजनीतिक प्रतिशोध और सत्ता के बदले की भावना” से प्रेरित है।

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याचिका का एक मुख्य आधार एफआईआर दर्ज करने में हुई “भारी देरी” है। एफआईआर के अनुसार, आरोप 2004 से 2010 के बीच की अवधि के हैं, जबकि मामला 2025 में दर्ज किया गया है। याचिका में कहा गया है:

“इस एफआईआर को दर्ज करने में बहुत अधिक देरी की गई है। जहां आरोप 2004-2010 (एफआईआर के अनुसार) की अवधि के हैं, वहीं संबंधित एफआईआर 2025 में यानी 20 साल बाद दर्ज की गई है।”

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इसके अलावा, याचिका में तर्क दिया गया है कि एफआईआर सक्षम प्राधिकारी से पूर्व अनुमति प्राप्त किए बिना “अज्ञात लोक सेवकों” के खिलाफ दर्ज की गई थी, जिससे जांच की प्रक्रिया ही गैर-कानूनी हो जाती है। सांसद का कहना है कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों में प्रथम दृष्टया कोई ठोस आधार नहीं है।

सीबीआई का यह मामला 2005 में ‘डियाजियो स्कॉटलैंड’ नामक कंपनी को कथित रूप से राहत दिलाने से जुड़ा है। उस समय, भारत पर्यटन विकास निगम (ITDC) का आयातित ड्यूटी-फ्री शराब की बिक्री पर एकाधिकार था और उसने डियाजियो के उत्पादों की बिक्री पर रोक लगा दी थी। आरोप है कि इस प्रतिबंध के कारण कंपनी को भारी नुकसान हुआ था, क्योंकि भारत में उसका 70% व्यवसाय ‘जॉनी वॉकर’ व्हिस्की की बिक्री पर निर्भर था।

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एफआईआर के मुताबिक, डियाजियो स्कॉटलैंड और सिकोइया कैपिटल्स द्वारा ‘एडवांटेज स्ट्रैटेजिक कंसल्टिंग प्राइवेट लिमिटेड’ (ASCPL) को संदिग्ध भुगतान किए गए थे। सीबीआई का दावा है कि इस संस्था का नियंत्रण कार्ति चिदंबरम और उनके करीबी सहयोगी एस. भास्कररमन के पास था।

कांग्रेस सांसद के खिलाफ यह चौथा मामला है, जिसकी जड़ें 2018 में सीबीआई द्वारा शुरू की गई एक प्रारंभिक जांच में हैं। वह जांच उस समय की विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड (FIPB) की मंजूरी में हुई कथित अनियमितताओं से संबंधित थी, जब उनके पिता पी. चिदंबरम केंद्रीय वित्त मंत्री थे।

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