रिमांड कार्यवाही से पहले गिरफ्तारी के आधारों वाली रिमांड रिपोर्ट सौंपना संवैधानिक अनिवार्यता का पालन: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि गिरफ्तारी के आधारों वाली रिमांड रिपोर्ट की प्रति मजिस्ट्रेट के समक्ष कार्यवाही शुरू होने से पहले आरोपी को सौंप दी जाती है, तो इसे भारत के संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत सूचना देने की अनिवार्य आवश्यकता का अनुपालन माना जाएगा। जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस बालाजी मेडमल्ली की खंडपीठ ने कहा कि हालांकि गिरफ्तारी के आधार लिखित में देना जरूरी है, लेकिन इसके लिए “गिरफ्तारी के आधार” (grounds of arrest) जैसा औपचारिक शीर्षक होना अनिवार्य नहीं है, बशर्ते मामले के आवश्यक विवरण आरोपी को प्रदान कर दिए गए हों।

मामले की पृष्ठभूमि

हाईकोर्ट बोल्ला किरण द्वारा दायर एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका पर सुनवाई कर रहा था। इस याचिका में दो बंदियों, तानिगाडापा प्रसाद (A1) और तुंगला रुक्मिणी (A2) की रिहाई की मांग की गई थी। इन दोनों को माइलावरम पुलिस ने गिरफ्तार किया था और 9 अप्रैल, 2026 को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धाराओं 308(5), 127(1) और 3(5) के तहत न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था।

याचिकाकर्ता ने इस गिरफ्तारी और रिमांड को इस आधार पर अवैध बताया कि बंदियों को उनकी गिरफ्तारी के आधार लिखित में नहीं बताए गए थे। यह तर्क दिया गया कि BNSS की धारा 47 और 48 के तहत दिए गए नोटिस केवल गिरफ्तारी की सूचना मात्र थे, जिनमें विस्तृत आधारों का अभाव था।

पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता के वकील: याचिकाकर्ता के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य (2026) और विहान कुमार बनाम हरियाणा राज्य (2025) के फैसलों का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि गिरफ्तारी के आधार लिखित में और उस भाषा में दिए जाने चाहिए जिसे आरोपी समझता हो। उन्होंने विहान कुमार मामले का संदर्भ देते हुए कहा कि रिमांड रिपोर्ट में आधारों का उल्लेख करना अनुच्छेद 22(1) का पालन नहीं माना जा सकता।

प्रतिवादियों (राज्य) के वकील: राज्य की ओर से पेश सहायक सरकारी वकील ने कानूनी स्थिति से असहमति नहीं जताई, लेकिन तर्क दिया कि वर्तमान मामले में रिमांड रिपोर्ट, जिसमें गिरफ्तारी के आधार शामिल थे, रिमांड सुनवाई से पहले बंदियों को दे दी गई थी। उन्होंने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के ही पप्पुला चलमा रेड्डी और केसीरेड्डी उपेंद्र रेड्डी मामलों का हवाला देते हुए कहा कि ऐसी तामील संवैधानिक और वैधानिक सुरक्षा उपायों को पूरा करती है।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने इस मुख्य प्रश्न पर विचार किया कि क्या गिरफ्तारी के आधार न बताए जाने के कारण रिमांड का आदेश अवैध था।

1. अनुच्छेद 22(1) की अनिवार्यता: हाईकोर्ट ने दोहराया कि अनुच्छेद 22(1) एक अनिवार्य संवैधानिक सुरक्षा उपाय और मौलिक अधिकार है। विहान कुमार मामले का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा:

“गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधारों की जानकारी देना अनुच्छेद 22(1) की एक अनिवार्य आवश्यकता है… अनुच्छेद 22(1) का पालन न करना आरोपी के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा… और यह संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा गारंटीकृत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन माना जाएगा।”

2. रिमांड रिपोर्ट के संबंध में स्पष्टीकरण: कोर्ट ने विहान कुमार मामले में सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी को स्पष्ट किया जिसमें कहा गया था कि “रिमांड रिपोर्ट में आधारों का उल्लेख करना पर्याप्त नहीं है।” हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उस मामले में पुलिस ने आरोपी को प्रति दिए बिना ही रिपोर्ट मजिस्ट्रेट को सौंप दी थी।

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बेंच ने टिप्पणी की:

“रिमांड कार्यवाही से पहले आरोपी को रिमांड रिपोर्ट सौंपे बिना, उसमें केवल गिरफ्तारी के आधारों का उल्लेख करना अनुपालन नहीं माना जाएगा… केवल रिमांड रिपोर्ट में आधारों का उल्लेख करना अपने आप में अनिवार्य आवश्यकता का पालन नहीं होगा जब तक कि उस रिमांड रिपोर्ट की तामील आरोपी पर न की गई हो।”

3. रूपरेखा बनाम सामग्री: कोर्ट ने पाया कि हालांकि रिमांड रिपोर्ट (अनुलग्नक P8) में “गिरफ्तारी के आधार” जैसा कोई विशिष्ट शीर्षक नहीं था, लेकिन उसमें दोनों बंदियों के खिलाफ मामले के सभी आवश्यक विवरण दिए गए थे। कोर्ट ने कहा:

” ‘बचाव के आधार’ [गिरफ्तारी] जैसा औपचारिक शीर्षक आवश्यक नहीं हो सकता जब तक कि आवश्यक विवरण निर्धारित कर दिए गए हों।”

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4. संचार की भाषा: वकील के इस मौखिक तर्क पर कि रिपोर्ट अंग्रेजी में थी, बेंच ने उल्लेख किया कि याचिका में ऐसा कोई तथ्यात्मक आधार नहीं उठाया गया था। इसलिए, कोर्ट ने यह मानने से इनकार कर दिया कि बंदी रिपोर्ट की भाषा नहीं समझ पाए।

निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि गिरफ्तारी के आधारों वाली रिमांड रिपोर्ट रिमांड कार्यवाही से पहले बंदियों को सौंप दी गई थी, इसलिए संविधान के अनुच्छेद 22(1) या अनुच्छेद 21 का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है। रिमांड आदेश के खिलाफ चुनौती में कोई ठोस आधार न पाते हुए हाईकोर्ट ने रिट याचिका खारिज कर दी।

केस का शीर्षक: बोल्ला किरण बनाम आंध्र प्रदेश राज्य व 5 अन्य

केस संख्या: रिट याचिका संख्या: 9972/2026

बेंच: जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस बालाजी मेडमल्ली

दिनांक: 23 अप्रैल, 2026

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