इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि यौन उत्पीड़न की शिकार किसी नाबालिग पीड़िता का बयान विश्वसनीय और भरोसा करने योग्य है, तो बिना किसी अन्य पुष्टि या स्वतंत्र सबूत के भी दोषी को सजा दी जा सकती है। हाईकोर्ट की एक खंडपीठ, जिसमें जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय शामिल थे, ने यह निर्णय एक दोषी की आपराधिक अपील को खारिज करते हुए सुनाया। अपीलकर्ता को साल 2014 में एक सात साल की बच्ची का अपहरण और बलात्कार करने के आरोप में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा पॉक्सो (POCSO) कानून के तहत दोषी को दी गई कठोर आजीवन कारावास की सजा को पूरी तरह बरकरार रखा।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला मुजफ्फरनगर जिले के नई मंडी थाना क्षेत्र में 8/9 जुलाई 2014 की रात का है। पीड़िता के पिता द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर (FIR) के अनुसार, घटना की रात उनका परिवार घर पर सो रहा था। इसी दौरान एक अज्ञात व्यक्ति ने उनकी बेटी का अपहरण कर लिया। अगली सुबह जब बच्ची अपने बिस्तर पर नहीं मिली, तो परिवार ने उसकी तलाश शुरू की। सुबह करीब 5:30 बजे एक पड़ोसी पीड़िता को घर लेकर आया, जिसे वह गांव के स्कूल के पास मिली थी। पड़ोसी ने बताया कि बच्ची की हालत बेहद खराब थी और ऐसा लग रहा था कि बच्ची के साथ मारपीट और बलात्कार किया गया है।
शुरुआत में पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ आईपीसी और पॉक्सो एक्ट की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया। इसके बाद पीड़िता के पिता ने एक और लिखित शिकायत दी, जिसमें बताया गया कि जब उनकी बेटी को होश आया तो उसने पड़ोस में रहने वाले एक व्यक्ति का नाम लिया। जब पीड़िता से पूछा गया कि क्या वह पड़ोस में रहने वाले उसी व्यक्ति की बात कर रही है, तो उसकी आंखों में आंसू आ गए और वह दोबारा बेहोश हो गई। इससे परिवार को पूरा विश्वास हो गया कि वही व्यक्ति इस घिनौने अपराध का दोषी है।
मामले की जांच सब-इंस्पेक्टर द्वारा की गई, जिन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण कर नक्शा तैयार किया और पीड़िता के खून से सने कपड़े व आरोपी के कपड़े आगरा स्थित फोरेंसिक साइंस लैब (FSL) भेजे। एफएसएल रिपोर्ट ने बाद में कपड़ों पर इंसानी खून होने की पुष्टि की। पीड़िता की मेडिकल जांच डॉक्टर द्वारा की गई, जिन्होंने पीड़िता के शरीर पर खरोंच और चोट के 11 निशान तथा अंदरूनी गंभीर घाव पाए। रेडियोलॉजिकल जांच के आधार पर मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने पीड़िता की उम्र लगभग सात वर्ष बताई।
मुजफ्फरनगर की विशेष पॉक्सो कोर्ट ने 24 अगस्त 2018 को आरोपी को दोषी करार करते हुए कठोर आजीवन कारावास और 25,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।
दोनों पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता (दोषी) के वकील ने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष अपना मामला संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। उन्होंने कहा कि निचली अदालत ने गवाहों के बयानों में मौजूद गंभीर विसंगतियों और विरोधाभासों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। बचाव पक्ष का कहना था कि पीड़िता के पिता चश्मदीद गवाह नहीं हैं, मेडिकल रिपोर्ट घटना का समर्थन नहीं करती और नाबालिग पीड़िता को बहला-फुसलाकर झूठी गवाही दिलवाई गई है क्योंकि दोनों परिवारों में आपसी रंजिश थी।
दूसरी ओर, राज्य सरकार के वकील (एजीए) ने निचली अदालत के फैसले का पूरी तरह समर्थन किया। उन्होंने तर्क दिया कि पीड़िता और उसके पिता के बयान पूरी तरह सुसंगत और सुदृढ़ हैं और मेडिकल रिपोर्ट भी पीड़िता की गवाही की पुष्टि करती है। राज्य सरकार का कहना था कि निचली अदालत का फैसला तथ्यों और कानून की सही समझ पर आधारित है, इसलिए इसमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने यौन अपराधों के मामलों में पीड़िता के बयान को दिए जाने वाले कानूनी महत्व पर पहले के स्थापित न्यायिक निर्णयों का विस्तार से विश्लेषण किया। निर्णय पढ़ते हुए जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय ने इस बात पर जोर दिया कि कानून में यह पूरी तरह स्पष्ट है कि यदि बलात्कार पीड़िता का बयान विश्वसनीय है, तो इसे सजा का एकमात्र आधार बनाया जा सकता है।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2013 के एक फैसले (राजस्थान राज्य बनाम बाबू मीणा) का उल्लेख करते हुए उद्धृत किया: “हमें इस व्यापक कानूनी सिद्धांत को स्वीकार करने में रत्ती भर भी संकोच नहीं है कि यदि पीड़िता का बयान विश्वसनीय और भरोसा करने योग्य पाया जाता है, तो केवल उसी के आधार पर सजा सुनाई जा सकती है और इसके लिए किसी अन्य पुष्टि की आवश्यकता नहीं है।“
पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य फैसले (हेमराज बनाम हरियाणा राज्य) का भी हवाला दिया और पीड़िता की गवाही के उच्च कानूनी दर्जे को रेखांकित किया: “बलात्कार के आरोपों वाले मामले में पीड़िता की गवाही सबसे महत्वपूर्ण होती है। यदि यह विश्वसनीय पाई जाती है और पूर्ण विश्वास जगाती है, तो बिना किसी अन्य स्वतंत्र पुष्टि के भी इस पर भरोसा किया जा सकता है।“
इसके अतिरिक्त, हाईकोर्ट ने हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम आशा राम मामले का जिक्र करते हुए स्पष्ट किया कि छोटी-मोटी विसंगतियों के कारण अभियोजन पक्ष की विश्वसनीय कहानी को खारिज नहीं किया जाना चाहिए: “अब यह कानून का एक स्थापित सिद्धांत है कि जब तक पुष्टि की मांग करने के कोई ठोस कारण न हों, तक तक केवल पीड़िता के बयान के आधार पर ही दोषी को सजा सुनाई जा सकती है। यौन उत्पीड़न की शिकार पीड़िता की गवाही किसी घायल गवाह के बयान से भी अधिक विश्वसनीय होती है।“
इस मामले के तथ्यों पर इन मानकों को लागू करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि नाबालिग पीड़िता ने बिना किसी हिचकिचाहट के यह साफ और स्वाभाविक विवरण दिया कि कैसे आरोपी ने आधी रात को उसका अपहरण किया और स्कूल में उसके साथ गलत काम किया। बचाव पक्ष द्वारा की गई कड़ी जिरह के बाद भी उसका बयान पूरी तरह सुदृढ़ रहा। डॉक्टर की रिपोर्ट में पाए गए गंभीर अंदरूनी घाव भी पीड़िता के दावों की पूरी पुष्टि करते हैं। इसलिए, कोर्ट ने पीड़िता को एक अत्यंत विश्वसनीय गवाह (स्टर्लिंग विटनेस) माना।
पीठ ने पॉक्सो एक्ट की गंभीरता को रेखांकित करते हुए कहा कि बच्चों के खिलाफ होने वाले ऐसे जघन्य अपराध उन्हें जीवनभर का मानसिक आघात देते हैं, जो उनके स्वस्थ विकास को पूरी तरह प्रभावित करता है।
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष ने आरोपी के खिलाफ अपना मामला पूरी तरह साबित किया है और निचली अदालत के फैसले में कोई कानूनी खामी या अवैधता नहीं है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने आपराधिक अपील को खारिज कर दिया और निचली अदालत के फैसले व उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: किरणपाल उर्फ किरण बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 6007 वर्ष 2018
पीठ: जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा, जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय
निर्णय की तिथि: 3 जून, 2026

