कंपनी के लिक्विडेशन के बावजूद NI एक्ट की धारा 138 के तहत दायित्व बरकरार: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC), 2016 के तहत कंपनी के खिलाफ लिक्विडेशन (समापन) की कार्यवाही शुरू होने मात्र से नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 138 के तहत आपराधिक दायित्व समाप्त नहीं होता है।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें आरोपी निदेशकों को आरोपमुक्त करने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि मामले के गुण-दोष से जुड़े अन्य सभी तर्क ट्रायल कोर्ट के समक्ष रखने के लिए स्वतंत्र हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला याचिकाकर्ता अभयकुमार आनंदकुमार भंभोरे और एक अन्य द्वारा प्रतिवादी ‘ऑर्थो रिलीफ हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर’ से ₹15,00,000 का ऋण लेने से जुड़ा है। इस राशि के पुनर्भुगतान के लिए 12 दिसंबर, 2018 की तारीख का एक पोस्ट-डेटेड चेक जारी किया गया था। इस चेक पर याचिकाकर्ता नंबर 1 ने कंपनी के निदेशक और अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता के रूप में हस्ताक्षर किए थे। याचिकाकर्ता नंबर 2 भी उसी कंपनी में निदेशक थे।

चेक 14 दिसंबर, 2018 को बाउंस हो गया। इसके बाद, 18 फरवरी, 2019 को शिकायतकर्ता ने नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत शिकायत दर्ज कराई, जिसे एस.सी.सी. नंबर 7281/2019 के रूप में पंजीकृत किया गया।

हाईकोर्ट का रुख

आपराधिक कार्यवाही लंबित रहने के दौरान, 8 अप्रैल, 2019 को संबंधित कंपनी के खिलाफ लिक्विडेशन का आदेश पारित किया गया। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि लिक्विडेशन के बाद उन्होंने निदेशक के रूप में अपनी स्थिति खो दी है, इसलिए वे उत्तरदायी नहीं हैं। ट्रायल कोर्ट ने 31 जनवरी, 2025 को याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें आरोपमुक्त (Discharge) कर दिया था।

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शिकायतकर्ता ने इस आदेश को बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने 1 अक्टूबर, 2025 को ट्रायल कोर्ट के आदेश को खारिज करते हुए कहा कि “IBC, 2016 के तहत कार्यवाही शुरू होने के बावजूद एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत दायित्व बना रहेगा।” हाईकोर्ट के इसी आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों के वकीलों को विस्तार से सुनने के बाद याचिका को खारिज कर दिया। पीठ ने अपने आदेश में कहा:

“हमें विवादित आदेश (High Court Order) में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं दिखता। इसलिए, विशेष अनुमति याचिका (SLP) खारिज की जाती है।”

कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट में कार्यवाही जारी रहेगी और सभी कानूनी बिंदुओं पर बहस के रास्ते खुले हैं:

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“यह कहना अनावश्यक है कि दोनों पक्षों के अन्य सभी तर्क ट्रायल कोर्ट के समक्ष रखने के लिए खुले छोड़े गए हैं।”

इस मामले में याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड (AOR) नितिन भारद्वाज ने किया। वहीं, प्रतिवादियों की ओर से एडवोकेट साहिल देवानी, एडवोकेट शाकुल आर. घाटोले, एडवोकेट श्याम देवानी, एओआर वात्सल्य विग्या, एडवोकेट सचेत मखीजा और एडवोकेट दशांग दोषी पेश हुए।

केस विवरण

  • केस शीर्षक: अभयकुमार आनंदकुमार भंभोरे एवं अन्य बनाम ऑर्थो रिलीफ हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर एवं अन्य
  • केस नंबर: स्पेशल लीव टू अपील (क्रिमिनल) नंबर 19823/2025
  • पीठ: जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस उज्ज्वल भुइयां
  • तारीख: 16 अप्रैल, 2026

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