इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चकबंदी उप संचालक (डी.डी.सी.) के उस आदेश को रद्द कर दिया है जिसमें नाबालिग बेटों की ओर से उनकी माता द्वारा निष्पादित बैनामों को अवैध घोषित किया गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि नाबालिगों ने बालिग होने के बाद निर्धारित समय सीमा के भीतर इन ‘वॉयडेबल’ (शून्यकरणीय) लेन-देन को चुनौती देने के लिए कोई कानूनी कदम नहीं उठाया, इसलिए उन्होंने संपत्ति पर अपना अधिकार खो दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद वाराणसी जिले के सिंधोरा गांव में बृजमोहन के वंशजों की पुश्तैनी जमीन से जुड़ा है। इस मामले में 1955 से 1961 के बीच कई बैनामे निष्पादित किए गए थे। बृजमोहन के पौत्रों- आद्या शंकर और कृपा शंकर, तथा राधे मोहन ने उत्तर प्रदेश जोत चकबंदी अधिनियम, 1953 की धारा 9ए(2) के तहत आपत्तियां दायर की थीं।
उनका दावा था कि उनकी माता चमेला देवी (विश्वनाथ की विधवा) और उनके पिता/चाचा द्वारा किए गए बैनामे अवैध थे, क्योंकि जमीन पुश्तैनी थी और नाबालिग के रूप में उनके हिस्से की रक्षा नहीं की गई थी। चमेला देवी ने कर्ज चुकाने के लिए आद्या शंकर और कृपा शंकर के नाबालिग रहते हुए उनके हिस्से की जमीन बेच दी थी।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं (क्रेताओं) का तर्क था कि ये बैनामे वैध थे और नाबालिगों के कल्याण तथा पारिवारिक कर्ज चुकाने के लिए किए गए थे। उन्होंने दलील दी कि बेटों ने बालिग होने के बाद तीन साल की मियाद के भीतर इन बैनामों को चुनौती नहीं दी, जिसका अर्थ है कि उन्होंने अपने अधिकारों का त्याग कर दिया है।
दूसरी ओर, प्रतिवादियों (बेटों) ने तर्क दिया कि जमीन पुश्तैनी थी और उनकी मां को सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बिना उनके हिस्से बेचने का कोई कानूनी अधिकार नहीं था। उन्होंने डी.डी.सी. के उस निष्कर्ष का समर्थन किया कि ये बैनामे ‘शून्य’ (void-ab-initio) थे क्योंकि ये नाबालिगों के लाभ के लिए नहीं किए गए थे।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी ने संपत्ति की प्रकृति और लेनदेन की कानूनी स्थिति की समीक्षा की। हाईकोर्ट ने पुष्टि की कि जमीन वास्तव में ‘पुश्तैनी’ थी क्योंकि यह विरासत के माध्यम से प्राप्त हुई थी।
मां द्वारा नाबालिगों के हिस्से बेचने के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही उन्होंने सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बिना और बच्चों के सीधे लाभ के बजाय पति के कर्ज चुकाने के लिए जमीन बेची हो, लेकिन ऐसे बैनामे शुरू से ही शून्य (void) नहीं बल्कि ‘शून्यकरणीय’ (voidable) होते हैं।
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“किसी नाबालिग के अभिभावक द्वारा किए गए शून्यकरणीय (voidable) लेनदेन को नाबालिग द्वारा बालिग होने पर समय के भीतर चुनौती दी जा सकती है। इसके लिए या तो लेनदेन को रद्द करने के लिए मुकदमा दायर करना होगा या अपने आचरण से स्पष्ट रूप से इसे नकारना होगा।”
हाईकोर्ट ने पाया कि आद्या शंकर 1962 में और कृपा शंकर 1965 में बालिग हुए थे, लेकिन उन्होंने 1976 में चकबंदी की कार्यवाही शुरू होने तक इन बैनामों को रद्द करने या चुनौती देने के लिए कोई प्रभावी कानूनी कदम नहीं उठाया।
हाईकोर्ट ने आगे कहा:
“उन्होंने अपनी मां द्वारा बेची गई जमीन पर अपना अधिकार (यदि कोई था) खो दिया है… डी.डी.सी. द्वारा दिए गए निष्कर्ष कानूनी रूप से उचित नहीं हैं, इसलिए उन्हें रद्द किया जाता है।”
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि पुनरीक्षण अधिकारी (डी.डी.सी.) यह विचार करने में विफल रहे कि क्या नाबालिग बच्चों ने मियाद के भीतर उन शून्यकरणीय लेनदेन को रद्द करने के लिए कोई कदम उठाया था।
अदालत का निर्णय
हाईकोर्ट ने 25 मई, 1979 के चकबंदी उप संचालक के आदेश को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने इस निर्देश के साथ याचिकाओं का निस्तारण किया कि संबंधित चकबंदी अधिकारी इस निष्कर्ष के आधार पर हिस्सों का वितरण करेंगे कि जिन शून्यकरणीय बैनामों को चुनौती नहीं दी गई, वे अब अंतिम रूप ले चुके हैं।
मामले का विवरण
- केस टाइटल: सरजू और अन्य बनाम डी.डी.सी. और अन्य
- केस नंबर: रिट बी संख्या 6873 वर्ष 1979
- पीठ: जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी
- दिनांक: 23 अप्रैल, 2026

