सुप्रीम कोर्ट ने जयपुर, राजस्थान के नगर निगम और राज्य सरकार के अधिकारियों के खिलाफ जारी अवमानना नोटिस को उनकी बिना शर्त माफी स्वीकार करने के बाद वापस ले लिया है। सुप्रीम कोर्ट की इस पीठ में जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता शामिल थे। यह अवमानना कार्यवाही एक निजी संपत्ति को डी-सील करने (ताला खोलने) और उसका कब्जा वापस सौंपने के अदालती अंतरिम आदेश की अनदेखी और उसमें की गई अत्यधिक देरी के कारण शुरू की गई थी। हालांकि कोर्ट ने अधिकारियों की माफी को स्वीकार करते हुए अवमानना के आरोपों को खारिज कर दिया, लेकिन प्रशासन के इस टालमटोल वाले रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई और भविष्य में ऐसी लापरवाही के प्रति गंभीर चेतावनी दी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह अवमानना याचिका सुप्रीम कोर्ट द्वारा 30 जनवरी 2026 को एक अंतरिम आवेदन (आई.ए. संख्या 14401/2026) पर दिए गए आदेश की तामील न होने से जुड़ी है, जो कि एक लंबित विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी संख्या 30588/2025) का हिस्सा थी। यह मामला जयपुर के परकोटा क्षेत्र (वॉल सिटी) में कथित अवैध निर्माण को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ के समक्ष दायर एक जनहित याचिका (पीआईएल) से शुरू हुआ था। हाईकोर्ट ने प्रभावित पक्षों को अपना पक्ष रखने का मौका दिए बिना या उन्हें मामले में शामिल किए बिना, याचिकाकर्ता भरत कुमार बदलानी की संपत्ति सहित कई निजी संपत्तियों को सील करने और उन्हें ढहाने का आदेश दे दिया था।
इस एकतरफा आदेश के खिलाफ प्रभावित संपत्ति मालिकों ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिकाएं दायर कीं। सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी कर हाईकोर्ट के आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी थी और कई संपत्तियों को डी-सील करने के निर्देश दिए थे। इसी क्रम में 30 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया था कि वे जयपुर के राजा मल का तालाब, जनता मार्केट रोड, चौकड़ी सरहद स्थित मकान संख्या 74 को तुरंत डी-सील करें और उसका कब्जा याचिकाकर्ता को सौंपें।
घटनाक्रम और दलीलें
याचिकाकर्ता भरत कुमार बदलानी ने 6 फरवरी 2026 को जयपुर के नगर निगम हेरिटेज के हवा महल-आमेर जोन के डिप्टी कमिश्नर को सुप्रीम कोर्ट के आदेश की प्रति के साथ एक लिखित प्रतिवेदन सौंपा था। इसके बाद 11 फरवरी 2026 को सभी संबंधित अधिकारियों को ईमेल भी भेजा गया। इसके बावजूद अधिकारियों ने परिसर को डी-सील नहीं किया। आखिरकार याचिकाकर्ता ने 12 मार्च 2026 को डाक और ईमेल के जरिए अधिकारियों को कानूनी नोटिस भेजकर तुरंत आदेश का पालन करने की मांग की।
प्रशासनिक स्तर पर लगातार जारी निष्क्रियता को देखते हुए याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर की। कोर्ट ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए 23 अप्रैल 2026 को राजस्थान सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता (एएजी) को निर्देश प्राप्त करने के लिए केवल 24 घंटे का समय दिया। इसके बाद 24 अप्रैल 2026 को राज्य सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता पद्मेश मिश्रा ने कोर्ट के समक्ष डिप्टी कमिश्नर का एक पत्र प्रस्तुत किया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अधिकारी को 27 अप्रैल 2026 को सुबह 10:30 बजे व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में हाजिर होने और आदेश का पालन न करने का कारण बताने का निर्देश दिया।
निर्धारित तिथि यानी 27 अप्रैल 2026 को हवा महल-आमेर जोन (नगर निगम जयपुर द्वितीय) की डिप्टी कमिश्नर सीमा चौधरी कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुईं। राज्य सरकार के वकील ने कोर्ट को बताया कि संपत्ति को शनिवार, 25 अप्रैल 2026 को डी-सील कर कब्जा याचिकाकर्ता को सौंप दिया गया है। चूंकि सीमा चौधरी द्वारा कोई हलफनामा दायर नहीं किया गया था, इसलिए कोर्ट ने उन्हें आदेश के पूर्ण अनुपालन, देरी के कारणों और एक वैकल्पिक माफीनामा दाखिल करने का निर्देश देते हुए अगली सुनवाई 6 मई 2026 तय की।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में यह बात भी आई कि जिस दिन कोर्ट के आदेश का अनुपालन किया जा रहा था, ठीक उसी समय यानी 24 अप्रैल 2026 को स्थानीय निकाय निदेशालय के डायरेक्टर ने याचिकाकर्ता को एक पत्र जारी कर सुरक्षा राशि या प्रीमियम के रूप में 10,52,832 रुपये की मांग की थी। इस पर नाराजगी जाहिर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“यह अदालत इस प्रकार की मांग को, जो कब्जे की बहाली का निर्देश देने वाले न्यायिक आदेश के अनुपालन के समय ही की गई थी, पूरी तरह से अनुचित मानती है। यह याचिकाकर्ता के खिलाफ एक दमनकारी और प्रतिशोधात्मक कार्रवाई जैसी प्रतीत होती है।”
सुनवाई की अगली तारीख 6 मई 2026 को कोर्ट ने डिप्टी कमिश्नर के हलफनामे का अवलोकन किया, जिसमें देरी का कारण डायरेक्टर और म्युनिसिपल कमिश्नर के साथ पत्राचार को बताया गया था। हालांकि कोर्ट के सामने पत्राचार का कोई रिकॉर्ड पेश नहीं किया गया। इस पर कोर्ट ने उन्हें सभी पत्रों की श्रृंखला पेश करने का निर्देश दिया और 18 मई 2026 को दोबारा पेश होने को कहा। 18 मई को हलफनामे की समीक्षा के बाद सुप्रीम कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि यह मामला अवमानना के आरोप तय करने के लिए उपयुक्त है और इसके लिए 21 मई 2026 की तारीख तय कर दी।
इसके बाद 21 मई 2026 को अवमाननाकर्ता अधिकारी कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश हुए। उनकी पैरवी अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) ऐश्वर्या भाटी और अतिरिक्त महाधिवक्ता पद्मेश मिश्रा ने की। अधिकारियों ने कोर्ट के समक्ष बिना शर्त माफीनामा प्रस्तुत किया और बताया कि डायरेक्टर द्वारा जारी 10,52,832 रुपये की मांग वाले विवादित पत्र को 19 मई 2026 को वापस ले लिया गया है।
देरी और अवमानना पर सुप्रीम कोर्ट का रुख
सुप्रीम कोर्ट ने प्रशासनिक अधिकारियों की कार्यशैली और टालमटोल के रवैये पर अत्यंत गंभीर चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“रिकॉर्ड से टालमटोल, निष्क्रियता और इस अदालत के स्पष्ट व असंदिग्ध आदेशों की जानबूझकर की गई अनदेखी का एक चिंताजनक तरीका सामने आता है। यह बेहद गंभीर चिंता का विषय है कि कानून के तहत सार्वजनिक कर्तव्यों का निर्वहन करने वाले अधिकारियों ने देश की सर्वोच्च अदालत के आदेशों को अपनी फुर्सत के हिसाब से निपटाने वाली चीज़ समझा, न कि उस तत्परता और तात्कालिकता के साथ जिसके ये निर्देश हकदार थे।”
कोर्ट ने इस बात को रेखांकित किया कि संपत्ति को सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने के लगभग तीन महीने बाद डी-सील किया गया। कोर्ट ने कहा:
“संपत्ति को 25 अप्रैल 2026 को डी-सील किया गया, जो कि निर्देश जारी होने के लगभग तीन महीने बाद का समय है। डायरेक्टर-सह-विशेष सचिव ने केवल 26 अप्रैल 2026 को पूर्वव्यापी मंजूरी दी, जो इन कार्यवाहियों के दौरान अपनाए गए प्रशासनिक रवैये पर अपने आप में एक बड़ा बयान है।”
न्यायपालिका और कानून के शासन पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा:
“इस अदालत के आदेशों की अवमानना कानून के शासन की बुनियाद और न्यायपालिका के अधिकार पर प्रहार करती है। जब कानून के संरक्षक और निष्पादक सार्वजनिक अधिकारी ही न्यायिक आदेशों की खुलेआम अनदेखी करते हैं, तो यह न्याय प्रशासन पर एक गहरा और स्थायी साया डालता है और कानूनी प्रणाली में नागरिकों के विश्वास को कमजोर करता है।”
अवमानना के अधिकार क्षेत्र पर संतुलन स्थापित करते हुए कोर्ट ने माना:
“हालांकि, यह अदालत इस बात के प्रति भी सचेत है कि अवमानना के लिए दंडित करने की शक्ति, भले ही व्यापक हो, उसका प्रयोग संयम, विवेक और न्याय के उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए। अवमानना की कार्यवाही में सजा अपने आप में एक साध्य नहीं है; यह अनुपालन सुनिश्चित करने, अदालत की गरिमा को बनाए रखने और उन लोगों के लिए एक सबक के रूप में काम करने का जरिया है जो न्यायिक आदेशों को हल्के में लेने की कोशिश करते हैं।”
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
डिप्टी कमिश्नर सीमा चौधरी, डायरेक्टर-सह-विशेष सचिव जुईकर प्रतीक चंद्रशेखर और कमिश्नर ओम प्रकाश कासेरा द्वारा दायर किए गए बिना शर्त माफी के हलफनामों और अवैध वसूली की मांग वापस लिए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों की माफी स्वीकार कर ली और अवमानना नोटिस को खारिज कर दिया।
हालांकि, कोर्ट ने कड़े शब्दों में चेतावनी देते हुए स्पष्ट किया:
“हालांकि, माफी की स्वीकृति को किसी भी तरह से उस आचरण को कमतर आंकने के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए जिसके कारण यह कार्यवाही शुरू हुई। अवमाननाकर्ताओं को स्पष्ट और असंदिग्ध चेतावनी दी जाती है कि भविष्य में न्यायिक आदेशों (चाहे इस अदालत के हों या किसी अन्य सक्षम अदालत के) के प्रति किसी भी तरह की कोताही या लापरवाही को अत्यंत गंभीरता से लिया जाएगा और इसे वैसी ढील नहीं दी जाएगी।”
सुप्रीम कोर्ट ने इस अवमानना याचिका का निपटारा करते हुए इसे रिकॉर्ड में दर्ज करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इस अवमानना मामले की टिप्पणियों का मूल विशेष अनुमति याचिका के गुण-दोष पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, जो कि अभी भी सुनवाई के लिए लंबित है।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: भरत कुमार बदलानी बनाम सीमा चौधरी
वाद संख्या: अवमानना याचिका (सिविल) डायरी संख्या 21438/2026, स्पेशल लीव पिटीशन (सिविल) संख्या 30588/2025 में
पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता
निर्णय की तिथि: 29 मई, 2026

