वीडियोकॉन की दो कंपनियों के दिवालियापन मामले को एक साथ जोड़ने की मांग, सुप्रीम कोर्ट सुनवाई को तैयार

सुप्रीम कोर्ट ने वीडियोकॉन ग्रुप के संस्थापक वेणुगोपाल धूत की उस याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई है, जिसमें समूह की दो प्रमुख कंपनियों – वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज लिमिटेड (VIL) और वीडियोकॉन ऑयल वेंचर्स लिमिटेड (VOVL) – की दिवाला कार्यवाही को अलग-अलग चलाने के आदेश को चुनौती दी गई है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने मंगलवार को इस मामले में नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई 10 अगस्त तय की है।

NCLAT के फैसले को दी गई है चुनौती

धूत ने राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) के 14 मई के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसने दोनों कंपनियों की कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) को आपस में जोड़ने के राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) के आदेश को रद्द कर दिया था। NCLAT का मानना था कि उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र की VIL और तेल अन्वेषण कारोबार से जुड़ी VOVL के व्यावसायिक क्षेत्र पूरी तरह अलग हैं। ऐसे में किसी एक समाधान आवेदक के पास दोनों कंपनियों को संकट से उबारने की आवश्यक विशेषज्ञता होना व्यावहारिक नहीं है।

अपीलीय न्यायाधिकरण ने यह भी स्पष्ट किया था कि दोनों कंपनियों की दिवाला कार्यवाही स्वतंत्र रूप से चलाने का फैसला लेनदारों की समिति (CoC) के व्यावसायिक ज्ञान (‘कमर्शियल विजडम’) के तहत लिया गया था, जिसमें न्यायिक हस्तक्षेप उचित नहीं है। दिवाला और दिवालियापन संहिता (IBC) का मूल उद्देश्य बकाए की वसूली के साथ-साथ कंपनी के परिचालन को जारी रखना है।

दोनों कंपनियों की वर्तमान स्थिति

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वर्तमान में जहां VIL की दिवाला प्रक्रिया अभी जारी है, वहीं VOVL को भारत पेट्रोलियम की राज्य के स्वामित्व वाली सहायक कंपनी भारत पेट्रोरिसोर्सेज लिमिटेड (BPRL) ने अधिग्रहित कर लिया है। BPRL ने अपने ‘राइट ऑफ फर्स्ट रिफ्यूजल’ अधिकार का इस्तेमाल कर यह अधिग्रहण पूरा किया, जिसे NCLT ने जून 2024 में मंजूरी दी थी।

इससे पहले दिसंबर 2020 में वेदांता ग्रुप के अध्यक्ष अनिल अग्रवाल के स्वामित्व वाली ट्विन स्टार टेक्नोलॉजीज ने VIL के लिए एक समाधान योजना पेश की थी, जिसे जुलाई 2021 में लेनदारों और NCLT की मंजूरी मिल गई थी। हालांकि, धूत ने विदेशी तेल और गैस संपत्तियों को शामिल न किए जाने का तर्क देते हुए NCLAT में इसके खिलाफ अपील दायर की थी। NCLAT ने धूत के बदलते रवैये की आलोचना करते हुए कहा था कि उन्होंने 2016-17 में खुद घरेलू वित्तीय संकट से विदेशी संपत्तियों को अलग रखने के लिए VIL को सह-देनदार की जगह केवल गारंटर बनाने का अनुरोध किया था, और अब वे इसके ठीक उलट रुख अपना रहे हैं।

कर्ज का ढांचा और कानूनी विवाद

यह मामला साल 2012 का है, जब स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के नेतृत्व वाले बैंकिंग कंसोर्टियम ने VIL और VOVL को ऑब्लिगर/को-ऑब्लिगर व्यवस्था के तहत कर्ज दिया था। 2016-17 में समूह के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक के रूप में धूत ने SBI से VIL की स्थिति बदलकर इसे केवल कॉर्पोरेट गारंटर बनाने का अनुरोध किया था, ताकि मुख्य देनदारी को VIL के बही-खाते से हटाकर विदेशी तेल एवं गैस संपत्तियों को सुरक्षित रखा जा सके।

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इसके बाद SBI की अर्जी पर NCLT मुंबई ने 6 जून 2018 को VIL के खिलाफ और 8 नवंबर 2019 को VOVL के खिलाफ अलग-अलग दिवाला कार्यवाही शुरू की। धूत ने बाद में NCLT से VOVL और 12 अन्य समूह कंपनियों की दिवाला प्रक्रिया को VIL के साथ मिलाने की मांग की। साथ ही उन्होंने धारा 12A के तहत मामला वापस लेने का प्रस्ताव भी दिया, जिसे लेनदारों ने 98.14 प्रतिशत वोट से खारिज कर दिया।

NCLT ने 12 फरवरी 2020 को धूत की याचिका स्वीकार करते हुए VOVL और विदेशी इकाइयों की संपत्तियों को VIL के दिवाला पूल में शामिल करने का निर्देश दिया था। हालांकि, SBI और अन्य लेनदारों की अपील पर NCLAT ने 19 फरवरी 2020 को इस आदेश पर रोक लगा दी थी और 14 मई को इसे अंतिम रूप से रद्द कर दिया।

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