जनहित के नाम पर दायर तुच्छ और प्रेरित याचिकाओं को हतोत्साहित करना आवश्यक: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने प्रक्रिया के दुरुपयोग पर लगाया ₹50,000 का जुर्माना

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रायपुर के लिमही तालाब में अनुपचारित सीवेज (गंदा पानी) छोड़े जाने को रोकने की मांग करने वाली एक जनहित याचिका (PIL) को “तुच्छ और प्रेरित” बताते हुए खारिज कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने पाया कि याचिकाकर्ता ने तालाब से संबंधित अपने निजी व्यावसायिक हितों के तथ्यों को छुपाया और न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग किया, जिसके लिए उस पर ₹50,000 का जुर्माना लगाया गया है।

इस मामले का मुख्य कानूनी मुद्दा संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट के असाधारण रिट क्षेत्राधिकार के उपयोग से जुड़ा था। याचिकाकर्ता ने सार्वजनिक जल निकाय में सीवेज बहाने से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान का आरोप लगाया था। हालांकि, कोर्ट ने इस बात पर गौर किया कि क्या याचिकाकर्ता “साफ हाथों” (clean hands) के साथ आया था या वह एक असफल व्यावसायिक निविदा (टेंडर) प्रक्रिया से उपजे अपने निजी विवाद को सुलझाने के लिए PIL का उपयोग कर रहा था।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता अजय कुमार निषाद ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर रायपुर के वार्ड नंबर 79 (माधवराव सप्रे वार्ड) स्थित लिमही तालाब में सीवेज के पानी को सीधे बहाने से रोकने के लिए हस्तक्षेप की मांग की थी। याचिका के अनुसार, तालाब का उपयोग धार्मिक और सामुदायिक कार्यों के लिए किया जाता है, लेकिन पास की आवासीय कॉलोनियों का गंदा पानी इसमें मिलने से सार्वजनिक स्वास्थ्य को खतरा पैदा हो रहा है।

याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उसने नगर निगम रायपुर और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण/लोक अदालत (मामला संख्या 1959/2025) के समक्ष शिकायतें की थीं, लेकिन कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। उसने तालाब की सफाई, गाद निकालने और सीवेज के पानी को अन्यत्र मोड़ने के निर्देश देने की प्रार्थना की थी।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील श्री अखिलेश मिश्रा ने तर्क दिया कि अधिकारियों की निष्क्रियता अनुच्छेद 21 के तहत स्वच्छ पर्यावरण के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि नगर निगम सार्वजनिक जल निकायों की रक्षा करने के अपने वैधानिक कर्तव्य में विफल रहा है।

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राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता श्री प्रवीण दास और छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण बोर्ड (CECB) की ओर से श्री अनिमेष तिवारी ने कहा कि अधिकारी पहले से ही इस मामले को देख रहे हैं। बोर्ड ने बताया कि वह पानी की गुणवत्ता की निगरानी कर रहा है और आवश्यक निर्देश जारी किए जा रहे हैं।

सबसे महत्वपूर्ण विरोध प्रतिवादी नंबर 4 (नगर निगम रायपुर) के वकील श्री पंकज अग्रवाल ने किया। उन्होंने तर्क दिया कि यह याचिका पूरी तरह से गलत और व्यक्तिगत हितों से प्रेरित है। उन्होंने खुलासा किया कि याचिकाकर्ता ने स्वयं इसी तालाब के मछली पालन के अधिकारों के लिए निविदा प्रक्रिया में भाग लिया था और उसे ‘L-1’ (न्यूनतम बोलीदाता) घोषित किया गया था, लेकिन उसने पट्टे की राशि जमा नहीं की। उन्होंने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता अपने व्यक्तिगत हितों को जनहित के रूप में पेश कर रहा है।

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कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

अभिलेखों की समीक्षा के बाद, हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता ने तालाब के मछली पालन के टेंडर में अपनी भागीदारी के तथ्यों को छुपाया है। खंडपीठ ने कहा:

“रिकॉर्ड से पता चलता है कि याचिकाकर्ता ने मछली पालन के लिए तालाब के आवंटन की निविदा प्रक्रिया में भाग लिया था और उसे L-1 घोषित किया गया था… हालांकि, बार-बार सूचना दिए जाने के बावजूद, उसने निविदा शर्तों के अनुसार पट्टे की राशि जमा नहीं की।”

कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता का इस मामले में सीधा “निजी और व्यक्तिगत हित” है, इसलिए उसे जनहित याचिका के माध्यम से कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह याचिका जनहित की आड़ में एक निजी कारण को बढ़ावा देने का प्रयास है।

अदालत ने स्टेट ऑफ उत्तरांचल बनाम बलवंत सिंह चौफाल (2010), कल्यानेश्वरी बनाम भारत संघ (2011) और तहसीन पूनावाला बनाम भारत संघ (2018) जैसे महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए कहा:

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“PIL क्षेत्राधिकार का उपयोग करने वाले याचिकाकर्ता को साफ हाथों, साफ दिल और साफ उद्देश्य के साथ कोर्ट आना चाहिए, अन्यथा ऐसी याचिकाएं लागत (जुर्माने) के साथ खारिज किए जाने योग्य हैं।”

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता का आचरण कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है और इससे न्यायिक समय की बर्बादी हुई है।

न्यायालय का निर्णय

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जनहित याचिका को खारिज करते हुए निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  1. याचिकाकर्ता को एक महीने के भीतर ₹50,000 की लागत (जुर्माना) जमा करने का आदेश दिया गया है।
  2. यह राशि रजिस्ट्री में जमा की जाएगी, जिसे बाद में ‘शासकीय मानसिक निःशक्त बालक गृह’, माना कैंप, जिला रायपुर को हस्तांतरित किया जाएगा।
  3. निर्धारित अवधि में राशि जमा न करने पर, इसे भू-राजस्व की बकाया राशि के रूप में वसूला जाएगा।
  4. याचिका दायर करते समय जमा की गई ₹15,000 की सुरक्षा राशि को भी जब्त कर लिया गया है।

केस विवरण:

  • केस शीर्षक: अजय कुमार निषाद बनाम छत्तीसगढ़ राज्य एवं अन्य
  • केस संख्या: WPPIL No. 20 of 2026
  • पीठ: मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल
  • दिनांक: 20 अप्रैल, 2026

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