दिल्ली हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) और पॉक्सो (POCSO) अधिनियम के तहत दर्ज आपराधिक मामले को रद्द कर दिया है। इस मामले में आरोपी ने उस पीड़िता से शादी कर ली थी, जिसके साथ उसका संबंध तब शुरू हुआ था जब वह नाबालिग थी। जस्टिस अनूप जयराम भंभानी ने टिप्पणी की कि इस मुकदमे को जारी रखना “स्पष्ट अन्याय” होगा और यह कानूनन घोषित पीड़ित (de-jure victim) और उसके मासूम बच्चे के साथ फिर से उत्पीड़न (re-victimisation) करने जैसा होगा।
मामले की पृष्ठभूमि
यह याचिका एक पति (याचिकाकर्ता) और उसकी पत्नी (उत्तरदाता संख्या 2) द्वारा दायर की गई थी। घटना के समय (सितंबर 2024), याचिकाकर्ता की उम्र लगभग 22 वर्ष थी और पीड़िता की आयु 17 वर्ष 02 महीने थी। दोनों ने 4 सितंबर 2024 को सिख रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह कर लिया और 12 जून 2025 को उनके घर एक बेटे का जन्म हुआ।
हैरानी की बात यह है कि एफआईआर पीड़िता की शिकायत पर दर्ज नहीं हुई थी। जब पीड़िता बच्चे को जन्म देने सफदरजंग अस्पताल गई, तब वहां के डॉक्टरों ने पाया कि वह नाबालिग है। पॉक्सो अधिनियम की धारा 21 के तहत अपने कानूनी दायित्व को निभाते हुए डॉक्टरों ने पुलिस को सूचित किया, जिसके बाद याचिकाकर्ता के खिलाफ धारा 64(1) BNS और पॉक्सो की धारा 6 के तहत केस दर्ज किया गया।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 226 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत इस आधार पर एफआईआर रद्द करने की मांग की कि पीड़िता अब उसकी पत्नी है और दोनों की सहमति है।
पीड़िता ने अदालत में हलफनामा दायर कर कहा कि उसने अपनी मर्जी से शादी की है और वह अपने “ससुराल में खुशी-खुशी और शांति से रह रही है।” उसने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता ने उसके साथ कोई अपराध नहीं किया है और शारीरिक संबंध उसकी अपनी सहमति से थे। पीड़िता ने तर्क दिया कि यदि याचिकाकर्ता को सजा होती है, तो वह और उसका बच्चा बेसहारा हो जाएंगे और उनका छोटा सा परिवार तबाह हो जाएगा।
राज्य की ओर से पेश वकील आनंद वी. खत्री ने भी एफआईआर रद्द करने पर कोई आपत्ति नहीं जताई।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने उन जटिल कानूनी स्थितियों पर विचार किया जहाँ कानून के कठोर प्रवर्तन से पीड़ित को ही नुकसान पहुँचता है। जस्टिस भंभानी ने कहा कि भले ही कानून नाबालिग को ‘पीड़ित’ मानता है, लेकिन कानून की धारा 2(wa) Cr.P.C. और धारा 2(1)(y) BNSS के अनुसार पीड़ित वही है जिसे कोई “हानि या चोट” पहुंची हो।
अदालत ने कहा कि जब पीड़िता स्वयं किसी चोट या नुकसान से इनकार करती है, तो ऐसी स्थिति में उसे केवल तकनीकी तौर पर पीड़ित मानना वास्तविकता से दूर है। हाईकोर्ट की कुछ प्रमुख टिप्पणियां इस प्रकार रहीं:
- कानूनी कठोरता पर: “कानून का जीवन तर्क नहीं रहा है; यह अनुभव रहा है…
$$यह मामला$$
एक कठोर कानूनी ढांचे और उन मानवीय जीवन के बीच के अंतर को उजागर करता है जिन पर वह शासन करना चाहता है।” - वास्तविक (De-facto) बनाम कानूनन (De-jure) पीड़ित पर: अदालत ने स्पष्ट किया कि जहाँ कोई वास्तविक पीड़ित (de-facto victim)—यानी वह व्यक्ति जिसे हकीकत में कोई चोट पहुँची हो—न हो, वहां अपराध का होना केवल एक कागजी या न्यायशास्त्रीय अवधारणा बनकर रह जाता है। जस्टिस भंभानी ने कहा, “केवल एक कानूनन घोषित पीड़ित (de-jure victim)—यानी कागजों पर पीड़ित—के कंधों पर बंदूक रखकर मुकदमा चलाना समझदारी नहीं होगी; खासकर तब, जब उस मुकदमे का खामियाजा खुद उसी को भुगतना पड़े।”
- पुनः उत्पीड़न पर: “न्याय के उद्देश्यों को पूरा करने और विशेष रूप से कानूनन घोषित पीड़ित के पुनः उत्पीड़न को रोकने के लिए सही रास्ता यही होगा कि आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया जाए।”
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अय्यूब मलिक बनाम उत्तराखंड राज्य (2026) के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि शादी और शांतिपूर्ण सह-जीवन जैसे घटनाक्रम अपराध को उसके तार्किक अंत तक ले जाने की आवश्यकता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं।
हाईकोर्ट का फैसला
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि इस मुकदमे को जारी रखना “निरर्थक” और “कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग” होगा। अदालत ने जोर दिया कि उसका प्राथमिक कर्तव्य न्याय करना और “स्पष्ट अन्याय” को रोकना है।
हाईकोर्ट ने माना कि दोनों पक्ष एक परिवार की तरह रह रहे हैं और केस रद्द करना “पीड़िता और बच्चे के सर्वोत्तम हित” में है। इसके साथ ही, एफआईआर संख्या 279/2025 और उससे संबंधित सभी कार्यवाहियां बंद कर दी गईं।
मामले का विवरण:
केस का शीर्षक: हरमीत सिंह बनाम दिल्ली राज्य (NCT) और अन्य
केस संख्या: W.P.(CRL) 1985/2025
पीठ: जस्टिस अनूप जयराम भंभानी
दिनांक: 16 अप्रैल, 2026

