प्रशासनिक निष्क्रियता पर कड़ा रुख अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को नेशनल चंबल घड़ियाल सेंचुरी में बड़े पैमाने पर हो रहे अवैध बालू खनन को रोकने के लिए व्यापक निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि खनन माफियाओं से निपटने के लिए कानूनी ढांचा तो पूरी तरह से “हथियारों से लैस” (सक्षम) है, लेकिन प्रशासनिक अधिकारी “कदम पीछे खींच रहे” हैं, जिसके कारण समझना “कठिन नहीं है।”
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि यह मामला केवल नियमों के पालन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण शासन और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार के मूल सिद्धांतों पर प्रहार करता है। राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच 5,400 वर्ग किमी में फैली यह सेंचुरी घड़ियाल, लाल मुकुट वाले कछुए और गंगा डॉल्फिन जैसी लुप्तप्राय प्रजातियों का महत्वपूर्ण आवास है।
खनन माफिया के संगठित नेटवर्क को तोड़ने के लिए शीर्ष अदालत ने तीनों राज्यों को आधुनिक निगरानी तकनीक अपनाने का आदेश दिया है। मुख्य निर्देश इस प्रकार हैं:
- सीसीटीवी (CCTV) निगरानी: अवैध खनन के लिए इस्तेमाल होने वाले रास्तों और संवेदनशील नदी तटों पर ऊंचे खंभों पर हाई-रिज़ॉल्यूशन और वाई-फाई सक्षम सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं।
- केंद्रीकृत निगरानी (Centralized Monitoring): राज्यों को अभयारण्य से सटे प्रत्येक जिले में समर्पित कंट्रोल रूम स्थापित करने की संभावना तलाशनी होगी, जहां लाइव सीसीटीवी फीड की निगरानी और डेटा विश्लेषण किया जा सके।
- अंतर-राज्यीय समन्वय: अवैध खनन की घटनाओं, विशेष रूप से जहां सशस्त्र प्रतिरोध या सीमा पार की स्थिति हो, वहां से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए तीनों राज्यों को एक समान मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करनी होगी।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि कैमरों की स्थिति सेंट्रल एम्पवर्ड कमेटी (CEC) के परामर्श से तय की जाए ताकि पारिस्थितिक संतुलन बना रहे।
खनन सिंडिकेट के खतरों को स्वीकार करते हुए, बेंच ने आदेश दिया कि चेकपोस्ट पर तैनात कर्मियों को आधुनिक उपकरणों से लैस किया जाए। इसमें सुरक्षात्मक गियर, उन्नत संचार उपकरण, निगरानी सहायता और आवश्यक हथियार शामिल हैं।
बेंच ने कहा, “यह सभी संबंधित अधिकारियों का कर्तव्य है कि वे जिम्मेदारी, तत्परता और प्रतिबद्धता के साथ कार्य करें।” कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पर्यावरण की सुरक्षा जीवन के संवैधानिक अधिकार का एक “अभिन्न अंग” है।
सुप्रीम कोर्ट ने ‘प्रदूषक भुगतान करे’ के सिद्धांत को लागू करते हुए राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को उल्लंघनकर्ताओं से पर्यावरणीय मुआवजे के आकलन और वसूली के लिए समयबद्ध कार्रवाई शुरू करने का निर्देश दिया है। बेंच ने जोर दिया कि यह प्रक्रिया “वैज्ञानिक, पारदर्शी और निष्पक्ष” होनी चाहिए ताकि यह दंडात्मक और निवारक दोनों उद्देश्यों को पूरा कर सके।
अधिकारियों को इन निर्देशों के अनुपालन और भविष्य की कार्ययोजना पर विस्तृत रिपोर्ट और हलफनामा दाखिल करने के लिए 11 मई तक का समय दिया गया है। कोर्ट ने चेतावनी दी कि “कर्तव्य में किसी भी तरह की लापरवाही या निष्क्रियता” को अत्यंत गंभीरता से लिया जाएगा।

