इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कक्षा 12 की दो छात्राओं द्वारा दायर उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने एक सहपाठी को जबरन इस्लाम कुबूल कराने और बुर्का पहनने के लिए मजबूर करने के आरोप में दर्ज FIR को चुनौती दी थी।
जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने युवाओं द्वारा दूसरों पर अपने धार्मिक विश्वास “थोपने” की बढ़ती प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त की है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021’ को समाज में उभर रही इसी तरह की चुनौतियों से निपटने के लिए लागू किया गया था।
यह कानूनी विवाद मुरादाबाद में पीड़ित छात्रा के भाई द्वारा दर्ज कराई गई एक FIR से शुरू हुआ। शिकायत के अनुसार, एक स्थानीय ट्यूशन सेंटर में पढ़ने वाली पांच मुस्लिम छात्राओं ने उसकी बहन पर धर्म परिवर्तन करने और बुर्का पहनने के लिए दबाव बनाया था।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 180 और 183 के तहत दर्ज बयानों में पीड़िता ने दिसंबर 2025 की एक घटना का जिक्र किया। पीड़िता का आरोप है कि उसकी सहपाठियों ने उसे जबरन बुर्का पहनाया और उसे मांसाहारी भोजन करने के लिए उकसाया। पीड़िता ने यह भी दावा किया कि उसे इस हद तक “ब्रेनवॉश” किया गया कि उसने अपनी स्वतंत्र सोचने की क्षमता खो दी थी। आरोपियों ने कथित तौर पर पीड़िता से कहा कि उनका धर्म श्रेष्ठ है, कुरान को 40 दिनों में पढ़ा जा सकता है और बुर्का पहनकर कहीं भी जाने की आजादी मिलती है।
छात्राओं की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि FIR में लगाए गए आरोप सामान्य और अस्पष्ट हैं। यह भी कहा गया कि याचिकाकर्ता केवल 18 वर्ष की है और इस मामले के कारण वह अपनी कक्षा 12 की परीक्षाओं पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रही है। बचाव पक्ष का यह भी दावा था कि मुख्य आरोप अन्य सह-आरोपियों के खिलाफ हैं, न कि विशेष रूप से इन याचिकाकर्ताओं के खिलाफ।
हालांकि, हाईकोर्ट ने केस डायरी का अवलोकन करते हुए पाया कि इसमें पर्याप्त सबूत मौजूद हैं। सीसीटीवी फुटेज में कथित तौर पर देखा गया कि याचिकाकर्ता और अन्य आरोपी छात्रा को गली में बुर्का पहनने के लिए मजबूर कर रहे थे।
अपने 11 पृष्ठों के फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि 2021 का अधिनियम उन स्थितियों को रोकने के लिए बनाया गया है जहां लोग केवल अपने धर्म का प्रचार नहीं करते, बल्कि उसे दूसरों पर थोपते हैं।
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की, “यदि युवाओं में इस तरह की प्रवृत्ति देखी जाती है, तो यह और भी अधिक चिंताजनक है। यह उनके जीवन का वह समय है जब उन्हें शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में अपने कौशल को विकसित करने और समाज व राष्ट्र की सेवा में खुद को समर्पित करने के बारे में सोचना चाहिए।”
पीठ ने आगे स्पष्ट किया कि यदि किसी कानून को शुरुआती चरण में ही रोक दिया जाता है, तो उसका उद्देश्य विफल हो जाएगा। कोर्ट ने माना कि हालांकि झूठे आरोपों को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए, लेकिन ठोस सबूतों के आधार पर शुरू की गई कानूनी कार्रवाई को शुरुआती स्तर पर ही खत्म नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि क्या याचिकाकर्ताओं के कृत्य ‘प्रलोभन’ या ‘अनुचित प्रभाव’ की श्रेणी में आते हैं, यह जांच और ट्रायल का विषय है, जिसे FIR रद्द करने की याचिका में तय नहीं किया जा सकता। मामले की गंभीरता और उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और याचिका खारिज कर दी।

