‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के खिलाफ जांच की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से हाई कोर्ट का इनकार, जानें क्या है पूरा मामला

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ नामक एक गैर-पंजीकृत समूह की कथित देश विरोधी गतिविधियों और युवाओं को भड़काने के आरोपों की जांच की मांग करने वाली आपराधिक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। मंगलवार को हुई सुनवाई में कोर्ट द्वारा क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार (Territorial Jurisdiction) पर सवाल उठाए जाने के बाद याचिकाकर्ता ने अपनी अर्जी वापस ले ली।

न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी की अवकाशकालीन पीठ ने याचिकाकर्ता को उचित कानूनी मंच पर जाने की छूट देते हुए इस मामले का निस्तारण कर दिया।

विदेशी फंडिंग और युवाओं को भड़काने का गंभीर आरोप

यह कानूनी विवाद बेंगलुरु निवासी एस. विग्नेश शिशिर द्वारा दायर एक याचिका के बाद शुरू हुआ। याचिका में अमेरिका में रह रहे पुणे के मूल निवासी अभिजीत दिपके को निशाना बनाया गया था। याचिकाकर्ता का दावा है कि दिपके ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ नाम के एक गैर-पंजीकृत संगठन के संस्थापक हैं, जो विदेशी फंडिंग की मदद से भारत में कथित रूप से देश विरोधी गतिविधियों को संचालित कर रहा है।

याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की थी कि इस संगठन के कामकाज और वित्तीय लेन-देन की राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) से संयुक्त जांच कराई जाए।

इसके साथ ही, याचिका में आरोप लगाया गया था कि यह समूह देश के युवाओं को गुमराह करने और भड़काने के लिए सोशल मीडिया का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रहा है। याचिकाकर्ता ने फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, व्हाट्सएप, टेलीग्राम और एक्स (पूर्व में ट्विटर) जैसे प्लेटफॉर्म पर सक्रिय इस ग्रुप के खातों को केंद्र सरकार द्वारा तत्काल ब्लॉक या बंद कराने के निर्देश देने की भी गुहार लगाई थी।

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क्षेत्राधिकार के पेंच में उलझा मामला

आरोपों की गंभीरता के बावजूद, हाई कोर्ट की पीठ का पूरा ध्यान इस बात पर केंद्रित रहा कि क्या यह मामला इस अदालत के अधिकार क्षेत्र में आता है।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता एस. विग्नेश शिशिर ने याचिका और अपने हलफनामे में खुद को बेंगलुरु का स्थायी निवासी बताया है। अदालत ने टिप्पणी की कि भले ही यह मामला राष्ट्रीय महत्व का हो सकता है, लेकिन याचिकाकर्ता को सबसे पहले कर्नाटक हाई कोर्ट का रुख करना चाहिए था।

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पीठ ने इस बात को भी रेखांकित किया कि याचिका में ऐसा कोई ठोस कारण या घटनाक्रम नहीं दर्शाया गया है जो उत्तर प्रदेश राज्य की सीमा के भीतर घटित हुआ हो।

याचिका वापस लेकर नए सिरे से कोर्ट जाने की तैयारी

अदालत द्वारा क्षेत्राधिकार की कमी और ‘फोरम नॉन कन्वीनियंस’ (असुविधाजनक मंच) के आधार पर याचिका को विचार योग्य न माने जाने का संकेत मिलने के बाद, याचिकाकर्ता के वकील ने अर्जी वापस लेने की अनुमति मांगी।

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वकील ने अदालत से उचित क्षेत्राधिकार वाली सक्षम अदालत में जाने की स्वतंत्रता मांगी। अवकाशकालीन पीठ ने इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए याचिका को इस छूट के साथ खारिज (dispose) कर दिया कि याचिकाकर्ता उचित अदालत के समक्ष अपनी नई याचिका दायर कर सकते हैं।

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