‘आपका क्या एजेंडा है?’: एयर इंडिया विमान हादसे की जांच रिपोर्ट में बदलाव की मांग वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट से खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को जून 2023 के अहमदाबाद एयर इंडिया विमान हादसे की प्रारंभिक जांच को चुनौती देने वाली एक याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने याचिकाकर्ता के “मकसद” और “एजेंडा” पर गंभीर सवाल उठाए, क्योंकि मृतकों के परिजनों ने ऐसी कोई मांग नहीं की थी।

यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने से जुड़ा था, जिसमें एक जनहित याचिका (PIL) को नामंजूर कर दिया गया था। याचिकाकर्ता ने विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो (AAIB) की प्रारंभिक रिपोर्ट में बदलाव की मांग की थी। याचिका में मांग की गई थी कि रिपोर्ट में “घटनाक्रम का पूरा विवरण” शामिल किया जाए, विशेष रूप से इंजन के बंद होने (फ्लेम-आउट) के समय और ईंधन स्विच (मैकेनिकल या मैनुअल) की स्थिति के बारे में जानकारी दी जाए।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत , जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पांचोली की पीठ ने याचिका को विचार करने योग्य नहीं माना। अदालत ने अधिकारियों को याचिकाकर्ता के आवेदन पर विचार करने का निर्देश देने से भी इनकार कर दिया।

12 जून, 2023 को एयर इंडिया की फ्लाइट AI 171 (बोइंग 787-8), जो लंदन गैटविक जा रही थी, अहमदाबाद के सरदार वल्लभभाई पटेल अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से उड़ान भरने के तुरंत बाद एक मेडिकल कॉलेज के हॉस्टल परिसर में दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी। इस भीषण हादसे में विमान में आग लग गई थी, जिससे विमान में सवार 242 में से 241 लोगों और जमीन पर मौजूद 19 लोगों की जान चली गई थी।

हादसे के बाद AAIB ने एक प्रारंभिक जांच रिपोर्ट जारी की थी। याचिकाकर्ता ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख कर इस रिपोर्ट में तकनीकी विवरण शामिल करने और इसे सार्वजनिक करने की मांग की थी। 25 फरवरी को दिल्ली हाईकोर्ट ने इस याचिका को “पूरी तरह से गलत” बताते हुए खारिज कर दिया था, जिसके बाद यह मामला देश की सबसे बड़ी अदालत में पहुंचा।

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सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता की मंशा पर कड़ी नाराजगी जताई। सीजेआई सूर्य कांत ने याचिकाकर्ता के वकील से पूछा कि जब प्रभावित परिवारों ने ऐसी कोई मांग नहीं की है, तो एक बाहरी व्यक्ति जांच रिपोर्ट में तकनीकी बदलाव के लिए इतना जोर क्यों दे रहा है।

चीफ जस्टिस ने टिप्पणी करते हुए कहा:

“आपका गहरा एजेंडा क्या है? ऐसा नहीं है कि हम आपका मकसद नहीं समझते। जिन लोगों ने अपनी जान गंवाई, उनके परिवार के सदस्य याचिका दायर नहीं कर रहे हैं, लेकिन आप कर रहे हैं।”

पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस निष्कर्ष का समर्थन किया जिसमें याचिका को “भ्रामक” बताया गया था। हाईकोर्ट ने पहले ही स्पष्ट किया था कि यदि याचिकाकर्ता को कोई विशिष्ट जानकारी चाहिए थी, तो उन्हें सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम का सहारा लेना चाहिए था, न कि तकनीकी रिपोर्ट में संशोधन के लिए कानूनी आदेश की मांग करनी चाहिए थी।

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हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था:

“हमारी सुविचारित राय में ऐसी प्रार्थना स्वीकार नहीं की जा सकती। यदि ऐसी जानकारी आरटीआई अधिनियम के तहत देने योग्य होगी, तो वह प्रदान की जाएगी।”

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया। इसके साथ ही, अदालत ने याचिकाकर्ता की उस वैकल्पिक मांग को भी ठुकरा दिया जिसमें अधिकारियों को इस याचिका को एक प्रतिवेदन (representation) के रूप में स्वीकार करने का निर्देश देने को कहा गया था।

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