दिल्ली हाईकोर्ट ने चेक बाउंस के एक मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति की सजा को निलंबित कर दिया है ताकि वह माननीय सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर कर सके। जस्टिस स्वर्णा कांता शर्मा की पीठ ने इस बात को रेखांकित किया कि यह पुनरीक्षण याचिकाएं (Revision Petitions) हाईकोर्ट में लगभग 12 वर्षों से लंबित थीं।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता, ध्रुव वर्मा, को निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 (NI एक्ट) की धारा 138 के तहत तीन संबंधित शिकायतों (CC No. 669/1/2007, 670/1/2007 और 671/1/2007) में दोषी पाया गया था। इन शिकायतों पर ट्रायल कोर्ट ने 11 अक्टूबर, 2012 को साझा फैसला सुनाया था। इसके बाद 31 अक्टूबर, 2012 को ट्रायल कोर्ट ने सजा सुनाते हुए याचिकाकर्ता को एक साल के साधारण कारावास की सजा दी और प्रत्येक शिकायत के लिए ₹50,00,000 का मुआवजा देने का निर्देश दिया।
अपीलीय अदालत ने 30 सितंबर, 2014 को दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन सजा में बदलाव करते हुए कुल ₹1,00,00,000 का समेकित मुआवजा तय किया। हालांकि, हाईकोर्ट ने 27 फरवरी, 2026 के अपने फैसले में अपीलीय अदालत के बदलाव को रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट द्वारा 2012 में दी गई मूल सजा को बहाल कर दिया।
पक्षों की दलीलें
आवेदक के वकील ने दलील दी कि याचिकाकर्ता हाईकोर्ट के 27 फरवरी, 2026 के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देना चाहता है। उन्होंने तर्क दिया कि यद्यपि SLP दायर करने के लिए 90 दिनों की समय सीमा उपलब्ध है, लेकिन कुछ कारणों से सजा के निलंबन की अवधि बढ़ाना आवश्यक है:
- न्यायिक अवकाश: 2 मार्च, 2026 से 8 मार्च, 2026 के बीच छुट्टियों के कारण सुप्रीम कोर्ट पूरी क्षमता से कार्य नहीं कर रहा था।
- अदालत का बंद होना: 26 और 27 मार्च, 2026 को सुप्रीम कोर्ट बंद रहने के कारण याचिका को शीघ्रता से दाखिल करने में कठिनाई आई।
- सजा की अवधि: आवेदक पहले ही एक साल की जेल काट चुका है। अब अधिकतम शेष सजा केवल तीन महीने की है, जो मुआवजा न देने की स्थिति में डिफॉल्ट सजा के रूप में प्रभावी होगी।
आवेदक ने सुप्रीम कोर्ट जाने की समय सीमा समाप्त होने तक, यानी 27 मई, 2026 तक सजा पर रोक की मांग की थी।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और अवलोकन
हाईकोर्ट ने गौर किया कि 27 फरवरी, 2026 के पिछले फैसले में सजा को निलंबित करने के संबंध में कोई स्पष्ट निर्देश नहीं दिया गया था। हालांकि, कोर्ट ने इस कानूनी लड़ाई में लगे लंबे समय को गंभीरता से लिया।
हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा:
“यह देखते हुए कि शिकायत का मामला वर्ष 2007 का है, पुनरीक्षण याचिकाएं इस अदालत के समक्ष 2014 से लंबित थीं, यानी लगभग 12 वर्षों तक। इसके अतिरिक्त इस बात को भी ध्यान में रखते हुए कि आवेदक वर्तमान मामले में काफी समय तक जेल में रह चुका है और इस अदालत द्वारा 27.02.2026 को पारित निर्णय को माननीय सुप्रीम कोर्ट के समक्ष चुनौती देने के लिए SLP दाखिल करना चाहता है…”
कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के बहाल किए गए आदेश का हवाला दिया जिसमें कहा गया था:
“…दोषी नंबर 2 ध्रुव वर्मा को 1 साल के साधारण कारावास की सजा सुनाई जाती है। उसे आज से एक महीने के भीतर शिकायतकर्ता को 50 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया जाता है, ऐसा न करने पर उसे 3 महीने का अतिरिक्त साधारण कारावास भुगतना होगा…”
निर्णय
हाईकोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.), 1973 की धारा 389 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 430 के साथ पठित) और Cr.P.C. की धारा 482 (BNSS की धारा 528 के साथ पठित) के तहत अपनी शक्तियों का उपयोग किया।
हाईकोर्ट ने कहा:
“…यह अदालत 31.10.2012 के सजा के आदेश के कार्यान्वयन को 28.04.2026 तक निलंबित करने की इच्छुक है, जिसके बाद आवेदक कानून के अनुसार शेष सजा काटने के लिए उत्तरदायी होगा।”
अदालत ने इन निर्देशों के साथ आवेदनों का निपटारा कर दिया।
केस विवरण:
- केस टाइटल: ध्रुव वर्मा व अन्य बनाम जे.के. वर्मा व अन्य
- केस नंबर: CRL.REV.P. 723/2014, 724/2014, 725/2014
- बेंच: जस्टिस स्वर्णा कांता शर्मा
- तारीख: 27 मार्च, 2026

