इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सेवा विवादों में केवल ‘आशंका’ के आधार पर तीसरे पक्ष को अपील का अधिकार नहीं

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सेवा से जुड़े विवादों में कोई भी तीसरा पक्ष महज इस आशंका या अप्रत्यक्ष प्रभाव के आधार पर विशेष अपील दायर नहीं कर सकता। कोर्ट की लखनऊ पीठ ने जोर देकर कहा कि केवल वही व्यक्ति ऐसी अपील कर सकता है जो वास्तव में ‘पीड़ित’ हो और जिसके कानूनी अधिकारों पर सीधा असर पड़ा हो।

चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस जसप्रीत सिंह की खंडपीठ ने यह निर्णय नीरज कुमार सिंह द्वारा दायर एक विशेष अपील को खारिज करते हुए सुनाया।

यह विवाद किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के एक कर्मचारी की बहाली से जुड़ा था। इससे पहले, कोर्ट की एकल-न्यायाधीश पीठ ने उक्त कर्मचारी की सेवा समाप्ति के आदेश को रद्द कर दिया था और उसे वापस सेवा में लेने का आदेश दिया था।

READ ALSO  केरल हाईकोर्ट ने मोटर वाहन विभाग के सर्कुलर पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, जिसमें सख्त ड्राइविंग टेस्ट की मांग की गई थी

नीरज कुमार सिंह, जो स्वयं KGMU में कर्मचारी हैं लेकिन मूल कार्यवाही में पक्षकार नहीं थे, ने इस बहाली के खिलाफ विशेष अपील दायर की। उन्होंने तर्क दिया कि कर्मचारी की बहाली नियमों के विरुद्ध है और इससे भविष्य में उनकी पदोन्नति (प्रमोशन) की संभावनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

खंडपीठ ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि सेवा विवाद अनिवार्य रूप से नियोक्ता (Employer) और संबंधित कर्मचारी के बीच का मामला होता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई तीसरा पक्ष तभी हस्तक्षेप कर सकता है जब वह अपने कानूनी अधिकारों के सीधे और वास्तविक उल्लंघन को साबित कर सके।

READ ALSO  कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में आप विधायक अमानतुल्लाह खान की ईडी हिरासत 3 दिन के लिए बढ़ाई

पीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा:

“पदोन्नति की संभावनाओं को लेकर महज आशंका को अपील के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता।”

कोर्ट ने सेवा न्यायशास्त्र (Service Jurisprudence) में ‘लोकस स्टैंडी’ के सिद्धांत को सख्ती से लागू करने की आवश्यकता पर बल दिया। जजों ने कहा कि यदि बिना किसी ठोस कानूनी क्षति के तीसरे पक्षों को सेवा मामलों को चुनौती देने की अनुमति दी गई, तो इससे न्यायिक अनुशासन प्रभावित होगा और न्याय प्रणाली पर अनावश्यक बोझ बढ़ेगा।

अदालत ने पाया कि अपीलकर्ता नीरज कुमार सिंह किसी भी वास्तविक कानूनी नुकसान को साबित करने में विफल रहे और वह मूल कार्यवाही में पक्षकार भी नहीं थे। इसलिए, कानून की नजर में उन्हें ‘पीड़ित व्यक्ति’ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट ने वाइल्ड कर्नाटक की डॉक्यूमेंट्री दिखाने पर नेटफ्लिक्स के खिलाफ हाईकोर्ट में चल रही अवमानना कार्यवाही पर रोक लगा दी

इन आधारों पर, पीठ ने विशेष अपील को सुनवाई योग्य न मानते हुए खारिज कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि नियोक्ता संस्थान (KGMU) के पास कानून के अनुसार एकल-पीठ के आदेश को चुनौती देने का विकल्प खुला है।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles