उत्तराखंड हाईकोर्ट के जस्टिस राकेश थपलियाल की पीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया कि आपराधिक कानून के तहत डर या धमकी के जरिए ली गई सहमति बलात्कार के अपराध के दायरे में आती है। कोर्ट ने ब्लैकमेल, आपराधिक धमकी और लगातार यौन उत्पीड़न के आरोपों का सामना कर रहे एक आरोपी की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी। हालांकि, आरोपी की दो नाबालिग बेटियों की देखरेख और बुजुर्ग मां की स्वास्थ्य जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने मानवीय आधार पर उसे छह सप्ताह की अल्पकालिक जमानत (शॉर्ट-टर्म बेल) प्रदान की है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला ऋषिकेश पुलिस स्टेशन में अप्रैल 2026 में दर्ज कराई गई एक एफआईआर से जुड़ा है। शिकायत के अनुसार, पीड़िता के पति ने वर्ष 2021 में दो सहयोगियों के साथ मिलकर रियल एस्टेट का कारोबार शुरू किया था। आरोप है कि इसके बाद से ही पीड़िता का लगातार यौन शोषण किया जाने लगा।
शिकायत में पीड़िता ने आरोप लगाया कि उसके पति का एक बिजनेस पार्टनर पति की गैरमौजूदगी में घर आता था और जनवरी 2022 में उसने पीड़िता के साथ घर में जबरन दुष्कर्म किया। इसके बाद फरवरी 2023 में पति पीड़िता को एक पेंटहाउस ले गया, जहां पार्टनर के बेटे ने उसे नशीला पदार्थ पिलाकर बेहोश कर दिया और अगली सुबह पीड़िता के शरीर पर चोट के निशान मिले।
जनवरी 2024 में पीड़िता के पति ने उसकी पहचान एक अन्य कारोबारी पार्टनर (वर्तमान आरोपी) से कराई। आरोप है कि सितंबर 2024 में आरोपी ने पीड़िता की अश्लील तस्वीरें उजागर करने की धमकी देकर उसे होटल में बुलाया और उसके साथ दुष्कर्म किया। इसके बाद आरोपी और अन्य सहयोगियों ने देहरादून तथा आसपास के इलाकों में स्थित विभिन्न होटलों व फार्महाउसों में उसके साथ बार-बार शारीरिक शोषण और मारपीट की।
जांच के बाद पुलिस ने आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 69 और 351 के तहत चार्जशीट दाखिल की, जबकि अन्य दो सह-आरोपियों को शुरुआती जांच में बरी कर दिया गया। इसके बाद मजिस्ट्रेट कोर्ट ने धारा 64 और 351 के तहत मामले का संज्ञान लिया। इस बीच, शुरुआती जांच अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए पीड़िता द्वारा दायर याचिका पर संज्ञान लेते हुए वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) देहरादून ने अपर पुलिस अधीक्षक के नेतृत्व में एक नई विशेष जांच टीम (एसआईटी) का गठन किया, जो अन्य संदिग्धों की भूमिका की जांच कर रही है।
पक्षों की दलीलें
आरोपी की ओर से तर्क: आरोपी के वकील ने दावा किया कि उनके मुवक्किल को झूठा फंसाया गया है। उन्होंने दलील दी कि पीड़िता के पति द्वारा व्यभिचार के आधार पर तलाक की याचिका दायर करने के बाद वैवाहिक जीवन बचाने के उद्देश्य से यह आरोप लगाए गए हैं।
वकील ने कहा कि दोनों के बीच संबंध आपसी सहमति से थे, जिसके प्रमाण के रूप में व्हाट्सएप चैट, ग्रुप फोटोग्राफ और होटल स्टे का हवाला दिया गया। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि एफआईआर काफी देरी से दर्ज की गई, कोई इलेक्ट्रॉनिक या फॉरेंसिक साक्ष्य बरामद नहीं हुआ है, और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 47 के तहत गिरफ्तारी के आधारों की जानकारी न देकर संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन किया गया है।
अल्पकालिक जमानत की मांग करते हुए वकील ने बताया कि मई 2024 में आरोपी की पत्नी का कैंसर से निधन हो चुका है। उसकी दो नाबालिग बेटियां (12 वर्ष और 5 वर्ष) हैं, जिनमें से एक तंत्रिका संबंधी (न्यूरोलॉजिकल) बीमारी से पीड़ित है, और उसकी 71 वर्षीय वृद्ध व बीमार मां घर की देखरेख करने में असमर्थ हैं।
राज्य सरकार और शिकायतकर्ता की दलीलें: राज्य सरकार की ओर से पेश वकील ने नियमित जमानत का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि बीएनएसएस की धारा 180 और 183 के तहत दर्ज बयानों में पीड़िता ने लगातार बिना सहमति के शोषण की बात कही है। राज्य का तर्क था कि सामान्य व्हाट्सएप चैट या जान-पहचान को आपसी सहमति का निर्णायक सबूत नहीं माना जा सकता।
राज्य ने उजागर किया कि पीड़िता के पति ने खुद एक होटल में दूसरे व्यक्ति का पहचान पत्र देकर कमरे की व्यवस्था की थी, जहां अपराध हुआ। यह कदम सीधे तौर पर साजिश और सहभागिता को दर्शाता है। यह भी तर्क दिया गया कि नई एसआईटी द्वारा जांच जारी है और ऐसे समय में आरोपी को रिहा करने से सबूत मिटाने या गवाहों को डराने की संभावना बढ़ जाएगी।
पीड़िता के वकील ने बंद लिफाफे में आपत्तियां दर्ज कराते हुए आरोप लगाया कि ससुराल पक्ष द्वारा उस पर मामला वापस लेने का दबाव बनाया जा रहा है और उसे सुरक्षा का गंभीर खतरा है।
अदालत का विश्लेषण और मुख्य निष्कर्ष
मामले के रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए हाईकोर्ट ने माना कि यह मामला कई व्यावसायिक स्थानों पर कई लोगों द्वारा लगातार यौन शोषण और संगठित अपराध (सिंडिकेट क्राइम) से जुड़ा है।
सहमति और धमकी के बिंदु पर कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की:
“आपराधिक कानून में धमकी के जरिए ली गई ‘सहमति’ बलात्कार का अपराध बनाती है और पीड़िता के बयान के अनुसार इसे शादीशुदा महिला के यौन शोषण का सिंडिकेट अपराध कहा जा सकता है।”
एफआईआर दर्ज करने में हुई देरी के तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पीड़िता वर्षों से डर और दबाव के साये में जी रही थी। नियमित जमानत खारिज करने के कारणों पर विचार करते हुए अदालत ने कहा:
“ऐसी स्थिति में यदि आरोपी को जमानत पर रिहा किया जाता है, तो इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को नष्ट करने या साक्ष्य मिटाने के लिए होटल के कर्मचारियों पर दबाव बनाने का भारी जोखिम है।”
हालांकि, नियमित जमानत से इनकार करते हुए कोर्ट ने आरोपी की पत्नी की मृत्यु के बाद उसके नाबालिग बच्चों और वृद्ध मां की पारिवारिक स्थिति पर ध्यान दिया। कोर्ट ने माना कि कड़े कानूनी प्रावधानों के साथ-साथ मानवीय पहलू का संतुलन आवश्यक है:
“इस अदालत को कड़े कानूनी प्रतिबंधों और मानवीय दृष्टिकोण के बीच संतुलन बनाना होगा।”
पीठ ने आगे कहा:
“आरोपी यानी पिता के जेल में होने के कारण छोटे बच्चों को पैतृक देखभाल से वंचित नहीं किया जा सकता, और साथ ही वृद्ध मां को भी बुनियादी जरूरतों से वंचित नहीं रखा जा सकता। इसलिए यह अदालत इस स्तर पर आरोपी को सीमित अवधि के लिए अल्पकालिक जमानत (शॉर्ट-टर्म बेल) देने में पूर्ण मानवीय दृष्टिकोण अपनाती है, क्योंकि मामले में आगे की जांच अभी जारी है।”
अदालत का फैसला
हाईकोर्ट ने आरोपी की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी, लेकिन अल्पकालिक जमानत आवेदन स्वीकार कर लिया।
अदालत ने आरोपी को 1 लाख रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि की दो स्थानीय जमानतों पर रिहा होने की तिथि से छह सप्ताह के लिए अल्पकालिक जमानत दी है। इस दौरान आरोपी पर निम्नलिखित शर्तें लागू रहेंगी:
- छह सप्ताह की अवधि समाप्त होते ही आरोपी संबंधित अदालत में आत्मसमर्पण करेगा।
- आरोपी पीड़िता या उसके परिवार के सदस्यों से प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से संपर्क, पहुंच या उन्हें धमकाने का प्रयास नहीं करेगा।
- आरोपी पीड़िता के निवास या कार्यस्थल के आसपास नहीं जाएगा।
- आरोपी एसआईटी के साथ पूर्ण सहयोग करेगा, आवश्यकता पड़ने पर एसआईटी प्रमुख के समक्ष उपस्थित होगा और बिना अनुमति शहर नहीं छोड़ेगा।
- आरोपी एफआईआर में नामजद या जांच के दायरे में शामिल किसी भी अन्य व्यक्ति के संपर्क में नहीं आएगा।
- आरोपी अपना पासपोर्ट तत्काल एसआईटी प्रमुख के पास जमा कराएगा।
कोर्ट ने चेतावनी दी कि इनमें से किसी भी शर्त का उल्लंघन होने पर अल्पकालिक जमानत तुरंत रद्द कर दी जाएगी।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: कुशाग्र शर्मा उर्फ रोमी बनाम उत्तराखंड राज्य
वाद संख्या: प्रथम जमानत याचिका संख्या 1123/2026 में आईए संख्या 01/2026
पीठ: जस्टिस राकेश थपलियाल
निर्णय की तिथि: 06 अगस्त 2026

