गौहाटी हाईकोर्ट ने आईएएस अफसर तालो पोटोम की जमानत रद्द की, तत्काल गिरफ्तारी के आदेश

गौहाटी हाईकोर्ट की ईटानगर पीठ ने आईएएस अधिकारी तालो पोटोम को आत्महत्या के लिए उकसाने के एक हाई-प्रोफाइल मामले में मिली जमानत को रद्द कर दिया है और उन्हें तुरंत हिरासत में लेने का निर्देश दिया है। अदालत ने निचली अदालत के नवंबर 2025 के जमानत आदेश को ‘मनमाना’ और कानून के विपरीत करार देते हुए कहा कि आरोपी चाहें तो नई जमानत याचिका दाखिल कर सकते हैं।

न्यायमूर्ति यारेंजुंगला लोंगकुमेर की एकल पीठ ने शुक्रवार को पारित आदेश में कहा कि निचली अदालत ने मामले के महत्वपूर्ण तथ्यों और कानून के सिद्धांतों की अनदेखी की। अदालत ने कहा कि जमानत आदेश “बिना उचित सोच-विचार के” पारित किया गया और इसमें जांच के शुरुआती चरण में ही आरोपी को राहत देना गंभीर चूक है।

“निचली अदालत ने जमानत सुनवाई में ही एक तरह से ‘मिनी ट्रायल’ कर डाला और मृतक की मानसिक स्थिति को लेकर अटकलें लगाईं, जिनका कोई साक्ष्य रिकॉर्ड पर नहीं था,” हाईकोर्ट ने कहा।

यह मामला अक्टूबर 2025 में गोमचु येकर नामक युवक की आत्महत्या से जुड़ा है, जो लखी गांव स्थित अपने किराए के मकान में मृत पाए गए थे। मृतक के पिता टागोम येकर ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आईएएस अधिकारी तालो पोटोम को मिली जमानत रद्द करने की मांग की थी।

याचिकाकर्ता के अनुसार, उनके बेटे ने सुसाइड नोट्स में मानसिक प्रताड़ना, यौन शोषण और भ्रष्टाचार के दबाव जैसे गंभीर आरोप लगाए थे, जिनके पीछे आरोपी अधिकारी का हाथ बताया गया था।

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याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि आरोपी को गिरफ्तारी के महज सात दिन के भीतर जमानत दे दी गई, जबकि जांच प्रारंभिक अवस्था में थी और महत्वपूर्ण डिजिटल साक्ष्य — जैसे व्हाट्सऐप चैट्स और वॉयस मैसेज — अब भी फॉरेंसिक जांच में हैं।

विशेष जांच दल (SIT) ने अदालत को बताया कि मृतक द्वारा छोड़े गए सुसाइड नोट्स की हैंडराइटिंग मृतक की ही पाई गई है। साथ ही SIT ने यह भी कहा कि कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए अब तक आरोपी की कस्टोडियल पूछताछ नहीं हो सकी थी।

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हाईकोर्ट ने कहा कि इस अपराध ने समाज की सामूहिक अंतरात्मा को झकझोर दिया है और यह एक प्रभावशाली व्यक्ति से जुड़ा मामला है। ऐसे में जांच के शुरुआती चरण में जमानत देना जांच को प्रभावित कर सकता है।

अदालत ने जमानत आदेश रद्द करते हुए पोटोम की तत्काल गिरफ्तारी के निर्देश दिए, लेकिन उन्हें निचली अदालत में नए सिरे से जमानत याचिका दायर करने की छूट भी दी।

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