भारत मे पहली बार स्नातक के बाद 40 छात्र जज बनने के लिए कर रहे नया कोर्स

महाराष्ट्र—– नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी एनएलयू नागपुर से 40 छात्रों का एक बैच जज बनने के लिए एक स्पेशल ट्रेनिंग ले रहा है, जो अपनी तरह का पहला कोर्स है।

न्यायिक निर्णय और इंसाफ में ओनर्स प्रोग्राम का पांच वर्ष तक का कोर्स पिछले वर्ष अक्टूबर में शुरू हुआ था। जिसका उद्देश्य गहन और विस्तृत प्रशिक्षण प्रदान करना है ताकि जिला न्यायालयों में प्रवेश स्तर के जजों के पदों के लिए छात्रों में विवेचनात्मक कानून सोच विकसित हो सके। 

जिला न्यायपालिका में जजों के चयन परीक्षाओ के माध्यम से किया जाता है। जिन्हें राज्य सरकारें या हाई कोर्ट संचालित कराते है। और अधीनस्थ कोर्ट पर प्रशानिक नियंत्रण ट्रांसफर को छोड़कर राज्य सरकारों का होता है। 

फिलहाल भारतवर्ष में लॉ ग्रेजुएट अपनी स्नातक पढ़ाई पूरी करने के उपरांत कानूनी प्रैक्टिस के नौबजव के बिना ही सिविल जज और न्यायिक मजिस्ट्रेट पद के लिए आवेदन कर सकते है। 

किन्तु अंडर ग्रेजुएट लॉ डिग्री एलएलबी के विपरीत ये कोर्स छात्रों को जज बनने की ट्रेनिंग देने के लिए तैयार किया गया है। जिसमे दस सेमेस्टर के दौरान,उन्हें आदेश और फैसले लिखने की ट्रेनिंग दी जाएगी,और प्रभाव कोर्ट प्रशासन सिखाया जाएगा। इसके अलावा यदि को छात्र जज नही बन पाता तो उसके पास किसी भी दूसरे लॉ स्नातक की तरह कानूनी प्रैक्टिस करने का विकल्प खुला रहता है। 

इस नए कोर्स में नियमित इंटर्नशिप प्रोग्राम भी होते है। जो न्यायपालिका से जुड़ी एजेंसियों और संस्थानों के साथ होते है जैसे पुलिस एजेंसियां,कानूनी सहायता सेवाएं ,मनावाधिकार संस्थाएं, और हाई कोर्ट एंव डिस्ट्रिक्ट जजों में संरक्षण छह माह की शागिर्दी भी होती है।

निजी वेबसाइट से वार्तालाप करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट के पूर्व जज और यूनिवर्सिटी कार्यकारी परिषद के सदस्य न्यायमूर्ति आरएस चौहान ने कहा कि कोर्स इस तरह से तैयार किया गया है कि सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएं आकर्षित हो और लोअर कोर्ट में न्याय वितरण प्रणाली में सुधार आये।

न्यायमूर्ति चौहान ने कहा कि किसी भी नागरिक के लिए लोअर कोर्ट न्यायिक पदानुक्रम में पहला संपर्क होती है,औऱ  फैसला सुनाने की खराब गुणवत्ता चिंता का एक विषय है। इसके अलावा प्रतिभा की कमी की वजह से बहुत से राज्यों को अधीनस्थ न्यायपालिका में रिक्तिया भरने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। इस कोर्स को पास करने वाले छात्रों में वो योग्यता कौशल और विशेषताएं होती है,जिनकी जज को जरूरत होती है। 

विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर विजेंदर कुमार ने कहा कि ये दुनिया भर में अपनी तरह का पहला कोर्स है।साथ ही कहा कि कुछ देशों में न्यायपालिका में मास्टर डिग्री कोर्स होते है लेकिन यह सर्वप्रथम अंडर ग्रेजुएट कोर्स है। दाखिल प्रक्रिया से लेकर कोर्स के ढांचे तक इस प्रोग्राम में अनोखे पैटर्न का अनुपालन किया जाता है। और ये कानून के नियमित पाठ्यक्रमों से भिन्न है। 

इस नए कोर्स को बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा तय नियमो के हिसाब से तय किया गया है। जो देश मे कानूनी शिक्षा और पेशे की शीर्ष नियामक संस्था है। 

कानून की शिक्षा ग्रहण करने के इछुक छात्र क्लेट को पास करते है वह इस कोर्स में शामिल होने के पात्र होते है।

दाखिला प्रक्रिया में तीन चरणों की एक कठिन चयन प्रणाली होती है,जिसमे एक साइकोमेट्रिक टेस्ट,ग्रुप डिस्कशन और पर्सनल इंटरव्यू होता है। 

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चयन प्रक्रिया का उद्देश्य यह पता लगाना था कि क्या उम्मीदवार में कुछ खास विशेषताएं है उदाहरण के तौर पर अभिव्यक्ति और स्पष्ट उच्चारण,न्याय की भावना, निर्णय लेने की क्षमता,धैर्य अन्य चीज़ों के अलावा पूर्वाग्रह से ऊपर उठने की सलाहियत आदि जो न्यायिक पद पर बैठने के जरूरी मानी जाती है। 

बॉम्बे हाई कोर्ट के मार्गदर्शन में पहले बैच के दाखिले और एक कमेटी को निगरानी में किये गए थे। जिनमे हाई कोर्ट के जज शामिल थे। कोर्स में शामिल होने वाले छात्रों में 50 प्रतिशत से ज्यादा लड़किया शामिल है। 

जस्टिस चौहान ने समझाते हुए कहा कि कोर्स का ढांचा इस तरह तैयार किया गया है कि छात्रों को एक समग्र परीक्षण दिया जा सके। मिशाल के तौर पर पहले साल में उन्होंने ऐसी गतिविधियों की जिनका उद्देश्य व्यक्तित्व के उन पहलुओं की पहचान करना था,जिनमे अधिकारियों की विशेष कोशिश की जरूरत होती है। जैसे संचार कौशल सामाजिक सांस्कृतिक पूर्वाग्रह इतियादी।

चौहान ने कहा उम्मीदवारों में तर्क कौशल बढ़ाने के लिए न्याय की परिकल्पना न्याय के सिध्दांत अपराध, विज्ञान,आहत शास्त्र और सजा के सिध्दांत जैसे विषयो के परचे शुरू किए गए है। जिससे कि वह सबूतों को समझ सके,और अंतिम निर्णय लिखने के उद्देश्य से उनका विश्लेषण कर सके। 

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