ठोस कचरा प्रबंधन: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मुआवजा तय करने के लिए राष्ट्रीय दिशानिर्देश बनाने को कहा

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार को ठोस कचरा प्रबंधन नियम, 2026 के तहत प्रदूषण फैलाने वाले लोगों और संस्थानों से पर्यावरण मुआवजा वसूलने के लिए एक विस्तृत राष्ट्रीय नीति तैयार करने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मुआवजा केवल जुर्माना नहीं है, बल्कि पर्यावरण को पहुंचाए गए नुकसान की भरपाई करने के उद्देश्य से लिया जाना चाहिए।

पर्यावरण मंत्रालय से मांगी प्रगति रिपोर्ट

जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने अमरावती नगर निगम से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह आदेश जारी किया। अदालत ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को हलफनामा दायर कर यह बताने को कहा है कि इन नियमों को लागू करने और आवश्यक नियम जारी करने की दिशा में अब तक क्या प्रगति हुई है।

मुआवजा तय करने के तय होंगे कड़े पैमाने

एक हालिया फैसले का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि पर्यावरण मुआवजा तार्किकता और आनुपातिकता के सिद्धांत पर आधारित होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि यह राशि वैधानिक जुर्माने या फाइन का विकल्प नहीं हो सकती, बल्कि इसे जुर्माने के अतिरिक्त वसूला जाएगा। प्रदूषण फैलाने वाले पक्ष की आर्थिक देनदारी तब तक बनी रहेगी, जब तक कि पर्यावरण को पहुंचे नुकसान को पूरी तरह ठीक न कर लिया जाए। यह राज्य के संबंधित अधिकारियों का कर्तव्य है कि वे नुकसान का सही मूल्यांकन करें और पर्यावरण के पुनरुद्धार के लिए आवश्यक मुआवजा वसूलें।

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अदालत ने निर्देश दिया कि मुआवजा राशि तय करते समय अधिकारियों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह के नुकसान का आकलन करना होगा। इसके अलावा, यदि किसी गतिविधि से तुरंत नुकसान न हुआ हो लेकिन भविष्य में पर्यावरण को क्षति पहुंचने की आशंका हो, तब भी मुआवजे की देनदारी लागू होगी।

मूल्यांकन में शामिल होंगी ये बातें

मुआवजे की गणना करते समय संबंधित संस्था या व्यक्ति की वित्तीय क्षमता, नुकसान के मूल्यांकन में आई लागत, नागरिकों और पारिस्थितिकी तंत्र को हुई क्षति तथा पर्यावरण के पुनरुद्धार पर होने वाले कुल खर्च को ध्यान में रखना अनिवार्य होगा।

पारदर्शिता बनाए रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि सभी अदालतों और ट्रिब्यूनल को मुआवजा राशि तय करते समय उसके स्पष्ट कारण दर्ज करने होंगे। इसमें मूल्यांकन के लिए अपनाए गए मानकों, कारकों और लागू किए गए फॉर्मूले की पूरी जानकारी देनी होगी।

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कागजों पर न रहें नियामक संस्थाएं

ठोस कचरा प्रबंधन के लिए कड़े कानूनों के साथ-साथ मजबूत प्रशासनिक जवाबदेही और नियामकों की जरूरत पर बल देते हुए अदालत ने कहा कि संवैधानिक अदालतों और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की यह जिम्मेदारी है कि वे सुनिश्चित करें कि पर्यावरण कानूनों के तहत बनी संस्थाएं केवल कागजों पर न रहें, बल्कि वहां पर्याप्त कर्मचारी तैनात हों और वे प्रभावी ढंग से काम करें।

पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पिछले निर्देशों के तहत ठोस कचरा प्रबंधन नियम, 2026 के नियम 18 के तहत ‘केंद्रीय कार्यान्वयन समिति’ के गठन के केंद्र सरकार के कदम का स्वागत किया और इसे नियमों के प्रभावी अमल की दिशा में एक सकारात्मक प्रयास बताया।

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